चार जनवरी
मेरी उपस्थिति से
ऊबने वाली चीज़ों के पास विकल्प का अभाव
मुझे गुमान में रखती है कि मैं अच्छा कर रहा हूं-
फ़िल्में देखता हूं
रोटी बना लेता हूं
पढ़ता हूं
जूते ढीले बांधता हूं
धूप में बैठकर मां के बारे में सोचता हूं
समय से सोकर, समय से उठता हूं
बोलने के क्रम में
सोचने तक की सब्र से ख़ुद को भरना चाहता हूं
क्योंकि
फूलों और लोगों की भीड़ से लदी
घूम रही है अब भी धरती।
दुनिया की नज़र में आई मेरी
तमाम अच्छाइयों के बावजूद
मैं जी गया एक साल और
और मेरे प्रतीक्षा न करने पर भी
आने वाले कई और साल
जीता जाऊंगा ऐसे ही..
जैसे ठिठुरन के दिनों में चार जनवरी आ जाता है
जैसे फूल खिलते हैं,
जैसे दुनिया भर की माएं दुःख छिपाती हैं
जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती है,
और उनकी अच्छाइयां भी उनके बुराइयों के आसमान तले..
🙂
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