22 दिसंबर 2014

3 तारीख,1000 ₹ और पनीर की सब्जी

लड़के को लड़की से इश्क़ था पर लड़का कभी बोल नहीं पाया नहीं तो 28 तारीख को लड़की फ़ोन करके लड़के को अपनी शादी के लिए बुलाती भी नहीं।लड़का जानता कि अगर दिल के राज लड़की के सामने खोल दिए तो लड़की उसका साथ छोड़ देती।
3 साल से वे साथ में रहे थे। हर एक पल को ऐसे बिताया था जैसे दो प्रेमी इश्क़ को जीते हैं महसूस करते हैं।पर उनके बीच कुछ नहीं...कुछ भी नहीं था,ये बात लड़की सोचती और लड़का कभी बोल नहीं पाया था और न ही बोलना चाहता था।3 साल में वे सदियों को जी गये।बिछड़ जाने के बाद एक दुसरे के साथ बिताये पल को आगे आने वाली ज़िन्दगी में बचे वक़्त में जी भर याद कर सकें,इतनी यादें थी उनके पास...दिल में कैद।

बेशक ये इश्क़ नहीं था। बस वो साथ होते तो मुस्कुराने के लिए कोई वजह नहीं न ही कोई बंदिशें...वे चिल्ला-चिल्ला के बात करते...एक दुसरे के कंधों पर बारी बारी सोते...न कोई हद न किसी की परवाह...न वक़्त की न आने वाले कल की न जमाने की...उन्हें बस एक दुसरे का साथ चाहिए था,कब तक का साथ ? इस बात से दोनों बेखबर।
दोनों के दोस्त भी अजीब थे। उनकी दुनिया ही अजीब थी...उनके कारनामे और कुछ नाजायज़ करके वक़्त के मुंह पर थोप देना,उनके इस दोस्ती के लिए जायज़ था। वे दोनों अपने दोस्तों का गवाह मान के इस्लामी तौर-तरीके से कईं बार खुले छत पर निकाह भी फरमाया था "कबूल है...कबूल है...कबूल है..." ऐसा ।वे पास के राधे-कृष्ण की मंदिर में उनकी प्रतिमा के बिना किसी वचन के सात फेरे भी लिए थे,पंडित जी को दक्षिणा के साथ मिठाई भी खिलाया था,सुखी-संम्पन जीवन के लिए हँसते हुए आशीर्वाद भी लिया था। उनके अजब-गजब कारनामे देख वक़्त और उनकी बनाई झूठी दुनिया देख हैरान होती और उन्हें रत्ती भर का फर्क नहीं।

बात इतनी सी थी कि उनके बीच इश्क़ जैसा कुछ भी नहीं था न ही आने वाले कल में होता।लड़की ने बातों-बातों में एक बार कह भी दिया था कि उसे किसी से भी इश्क़ नहीं हो सकता।वो नहीं चाहती थी कि किसी के दिल टूटने की वजह वह बने...कोई रोए और बिना खिड़की वाले कमरे में खुद को कैद करके केवल साँस लेने भर जितनी ज़िन्दगी जीए।और लड़के को लड़की से इश्क़ था। लड़के ने अपने आने वाले कल लड़की के साथ सोचे थे पर उसे आज में भी लड़की के साथ रहना था इसलिए दिल की बात को होंठों तक नहीं लाया। लड़की अगर देखना चाहती तो लड़के के आँख में देख सकती थी पर लड़की ने कभी कोशिश ही नहीं की। वक़्त गुजरता गया और उनके दोस्ती की हिस्से में अलग होने का मुकाम आया। समाज की नज़र में लड़की बड़ी हो गई थी इसलिए उसके पिता जी के दिमाग में समाज की बातें घुसपैठ कर गई और उन्होंने अपनी बेटी को गाँव बुला लिया।

दोनों ख़ुशी-ख़ुशी अलग हुए। स्टेशन पर लड़का छोड़ने आया था। लड़की अंजान थी कि घर किस वजह से जा रही है पर खुश थी कि घर जाने वाली है।लड़का भी शायद खुश था,वह स्टेशन पर लड़की से आखिरी बार गले मिलना चाहता था पर लड़की को इस बात से कोई मतलब नहीं।वह वैसे ही अलग हो रही थी जैसे वो ट्यूशन के बाद लड़के को बाय बोलते हुए अपने फ्लैट की तरफ चली जाती। लड़की बिना गले मिले ट्रेन के साथ चली गयी और बहुत कुछ स्टेशन पर छोड़ दिया जिसे केवल लड़का देख सकता था,महसूस कर सकता था। लड़के ने वो सबकुछ उठाया,उससे चला नहीं जा रहा था..बहुत भारी-भारी चीझें छोडकर लड़की चली गई थी।

जाने से पहले दोनों में समझौता हुआ कि लड़का केवल महीने की 2 तारीख को लड़की से फ़ोन पर बात करेगा वो भी तब जब लड़की चाहेगी। लड़की नहीं चाहती थी कि उसके पिता जी को कुछ पता चले और वे समाज के अंतहीन और बेतुके बातों में खुद को उलझा ले।
लड़की के जाने के बाद लड़के की ज़िन्दगी वैसे ही सरकती रही बस रफ़्तार में कमी आ गई और मुस्कुराने के लिए लड़का वजह की तलाश में रहता। ग़ज़लें सुनता और कब सोता उसे खबर नहीं।हर महीने के शुरू होते ही लड़का 2 दिन तक खुद को कमरे में बंद कर लेता फिर 2 तारीख भी गुजर जाती और बंद कमरे में क्या बात होती ये लड़का ही जानता था। धीरे-धीरे उसके दोस्त कम हो गये और वह लोगों से मिलना भी बहुत कम कर दिया।

अक्टूबर की 28 तारीख। लड़की ने फ़ोन किया था और लड़के को लगा कि महीनों बाद फोन आया है थोड़ा आश्चर्य भी हुआ था कि 2 तारीख आने में अभी 5 दिन है।
लड़की ने पूछा कौन?
लड़का क्या बताता कि कौन है?लड़की को पता था कौन है?पर आदत थी उसकी,शुक्र है अभी तक नहीं बदली।
"आवाज भारी हो गई है अभी भी जुकाम रहता है तुम्हें"लड़का हल्के कानों से सुनता रहा उसे,मन भारी लेके
"अगले वीक गाँव आओगे न?"लड़का सहम गया था।
सोचने लगा,सुनकर ये सवाल आखिरी बार गया था तबसे एक 'मैं' वहीँ रह गया था। लड़की बोलती रही,"3 को शादी है मेरी,तुम न आये तो जा नहीं पाऊँगी,आखिरी बार आ जाना"
लड़का-"कहा था आखिरी बार,जब मैं आखिर बार 'मैं' रहूँगा तब देखने आऊंगा,उससे पहले तुम्हारा हर आखिरी मेरा प्रारंभ होगा,बस मुझसे आना नहीं होगा"

हर महीने की तरह लड़के के लिए 3 तारीख गुजर गई।

लड़के को कटघरे में लाकर पूछा गया कि 3 तारीख को लड़की के गाँव क्यों नहीं गये?
लड़का हँसते हुए बोलता है "एक तो उनके गाँव आने-जाने का 1000₹ बैठ जाता है और ऊपर से शादी में पनीर की सब्जी भी नहीं थी,क्या करता जाकर?" कटघरे में लाने वाला सोचता रहा कि सही में लड़का गाँव जाकर क्या करता। पर लड़के ने पैसे और पनीर वाली बात कहते हुए नज़रें नहीं मिलाई थी पूछने वाले से...

1000₹ और पनीर की सब्जी...

                                                       
                                                                                                                                                                               -मन

15 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के - चर्चा मंच पर ।।

    उत्तर देंहटाएं
  2. उत्तर
    1. स्वागत है 'मन के कोने से...' धन्यवाद :)

      हटाएं
  3. अच्छी लगी कहानी ...थोड़े से सुधार के बाद इसे रिकार्ड करना चाहती हूँ .... आपका मेल आई डी देंगे?

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत मर्मस्पर्शी है। युवा मन का बढ़िया चित्रण है। हालाँकि ऐसी भावनाये जीवन में बहुत मायने नहीं रखती है। परंतु युवा अवदथ में यही जिंदगी लगने लगती है।

    उत्तर देंहटाएं
  5. आज मधुरिमा में आपका ब्लॉग पढ़ा। पूरा अंक आज लोगों के अनुभवों पर है लेकिन इस क़दर छुआ आपकी बातों ने कि मैंने उसके बाद कोई और ब्लॉग नहीं पढ़ा, तुरंत आपका ब्लॉग खोला ये देखने के लिए कि कौन है ये। अभी आपके और ब्लॉग पढूंगा बाद में शायद मधुरिमा भी पढ़ लूँ :p

    उत्तर देंहटाएं
  6. मेरी जिंदगी की आइना है ये कहानी
    उस ने कहा था में फ़ोन करू तब ही फ़ोन करना
    डेढ़ साल हो गया , उस के फ़ोन का इंतजार ख़तम नहीं हुवा
    उस ने शादी में बुलाया था , में ने कहा था की में नहीं आ पाउँगा
    कैसे जाता ?

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. ज़िन्दगी के सभी फलसफ़ों पर हमारा वश नहीं हो सकता है...कोई और दूसरी कहानी आपके इंतज़ार में है आगे ! :)

      हटाएं

आपका कुछ भी लिखना,अच्छा लगता है इसीलिए...
कैसे भी लिखिए,किसी भी भाषा में लिखिए- अब पढ़ लिए हैं,लिखना तो पड़ेगा...:)