गुरुवार, मार्च 26, 2026

धुरंधर, हौंसला, ईंधन, बलिदान. धर साहब.

हाँ, तो मोतिहारी थे तो धुरंधर का पहला पार्ट देखने गए थे सैफ़ भाई के साथ। और अच्छा अनुभव रहा था. सैफ़ भाई के साथ देखने चले तो गए फ़िल्म पर जब फिल्म का थीम ध्यान आया तो मेरे अंदर का पूर्वाग्रही मन जाग गया, सोचने लगा कि यार सैफ भाई को साथ में लेके कम से कम ये फिल्म देखने नहीं जाना था.. ख़ैर गए हम दोनों और सैफ़ को फ़िल्म अच्छी लगी, कुछेक जगह जहां सरकार के फैसलों को सही बताया गया है उन्हें छोड़कर. पाकिस्तान वाले मुद्दे पर सैफ़ का कुछ भी कमेंट नहीं आया क्योंकि शायद ऐसा कुछ पाकिस्तान या इस्लाम को लेके उल्टा सीधा टॉपिक कमेंट के लिए फ़िल्म में था भी नहीं. और मैंने सैफ़ को कह भी दिया था कि भाई सच जो है वो है, उससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए.

खैर..

ख़ासकर इतनी लंबी फ़िल्म पहला पार्ट (3 घंटे 34 मिनट) होने के बावजूद दूसरे हाफ में बोर न होना फ़िल्म की काबिलियत बताती है क्योंकि लंबी फ़िल्म में सेकंड हाफ ही मायने रखता है। ख़ैर, फ़िल्म ने क्या जादू किया ये अलग से बताने की ज़रूरत नहीं.

धुरंधर पार्ट 1.

और अब आज, धुरंधर 2.

और इसका दूसरा पार्ट जो 3 घंटे 49 मिनट की है और अच्छी है क्योंकि क्योंकि क्योंकि.. जाओ ख़ुद देखो और जान जाओ..

सुबह दीप्तांशु भईया का ट्वीट आया कि 
"धुरंधर-2 देखनी थी, पर वक़्त से चार घंटे कैसे चुराया जाए?"
मैंने कहा
"वही वही.. ट्विटर के लिए मेरे पास 12 घंटे हैं 🫣
पर धुरंधर 2 के लिए टाइम नहीं निकाल पा रहा."
भईया कहते हैं- "Shiddat lao..ho jayega"

तो शिद्दत लाया गया और आज ही देख लेने का सोचा गया, 
शिद्दत फ़िल्म भी अच्छी है, मंटू शिद्दत फ़िल्म की बात यहां नहीं करनी है.. ओके ओके.



सबसे पहले इस पूरे सिनेरियो के कर्ता धर्ता आदित्य धर की बात करते हैं. यह कहानी है उस लड़के की, जिसका जुनून क्रिकेट (बॉलिंग) था।

1983 में दिल्ली में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे आदित्य धर और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय में काम करती थीं।

क्रिकेट के लिए दीवाने आदित्य धर को जब अंडर 19 क्रिकेट वर्ल्ड कप के लिए टीम में नहीं चुना गया तब इन्होंने फ़िल्म लाइन में जाना चुना. और देख लो सफ़र अब..

"काबुल एक्सप्रेस" फ़िल्म 2006, वही जॉन अब्राहम वाली, के गाने पता है किसने लिखे हैं ? आदित्य धर ही. इनकी पहली शॉर्ट फिल्म "बूंद" जिसके स्क्रिप्ट और डायलॉग धर साब लिखे, को राष्ट्रीय अवार्ड मिला।

प्रियदर्शन निर्देशित अजय देवगन-अक्षय खन्ना की फिल्म 'आक्रोश' (2010) के डायलॉग भी आदित्य धर ने लिखे।

प्रियदर्शन कहते हैं, "भाषा पर आदित्य की पकड़ शानदार थी और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी."

और फ़िल्म के डायलॉग सुनिए तो आप प्रियदर्शन की बात से 100% एग्री करेंगे.

अब सबसे बड़े ट्विस्ट पर आते हैं जहां से आदित्य धर की लाइफ 180° शिफ्ट हो गई.

करन जौहर की कोई फ़िल्म डायरेक्ट करने वाले थे आदित्य, उसमें हीरो होना था फ़वाद ख़ान को.. फ़िल्म शुरू होने से पहले उरी की घटना हो गई और फ़िल्म हमेशा के लिए बंद हो गई.. यही से उरी फ़िल्म के लिए आदित्य धर दिलोजान से जुट गए.. और देखिए उरी फ़िल्म का कमाल. अगर उरी फ़िल्म नहीं देखे हैं तो देखिए भई..

फ़िर आर्टिकल 370, बारामूला को आदित्य धर ने ही लिखा है 
 और और और अब धुरंधर 🫡


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फ़िल्म अच्छी है..थिएटर में जाके अनुभव कीजिए. पहला पार्ट नेटफ्लिक्स पर आ ही गया है तो न देखने वाले पहला पार्ट देख लीजिए.. और दूसरे पार्ट के लिए पहले तो समय निकालिए इसके लिए.. थिएटर में ही देखिए.



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अब उस मुद्दे पर आते हैं जो इस फिल्म को लेकर या आदित्य धर के लिए उछाला जाता है कि प्रोपेगेंडा फैलाते हैं.. सरकार का पक्ष, सिनेमाई लिबर्टी के साथ कुछ मुद्दों को बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं।

आदित्य धर इसको लेकर कहते हैं - 

"जो लोग इसे प्रोपेगेंडा कहते हैं, उनकी मुझे कोई परवाह नहीं. सच कहूं तो मुझे वास्तव में उनकी चिंता नहीं है. क्योंकि असली बात यह है कि मैं जानता हूं यह कहां से आ रहा है, और भारतीय दर्शक बहुत ही समझदार हैं. जब वे फ़िल्म देखते हैं, उन्हें आसानी से समझ में आ जाता है कि कौन सी फ़िल्म प्रोपेगेंडा है और कौन सी फ़िल्म की नीयत सही है. और मेरी फ़िल्म के साथ, जब तक मैं निर्माता या निर्देशक रहूंगा, उसकी नीयत इरादा हमेशा सही रहेगा. जिस दिन मेरी नीयत ठीक नहीं होगी मैं फ़िल्में बनाना बंद कर दूंगा."

बाकी मुझे भी ये लगता है कि ये आरोप बहुत हद तक निराधार है। अमेरिका और ब्रिटेन वाले दशकों से अपने देश के जासूसों की कहानी दिखाते चले आ रहे हैं उनके लिए तो कभी किसी ने नहीं कहा होगा कि ये सरकार का पक्ष दिखा रहे या प्रोपेगेंडा फैला रहे.


छोटे भाई (आदित्य राज), दिल्ली विश्वविद्यालय से PhD कर रहा, उसके रिसर्च का टॉपिक है - हिन्दी सिनेमा में ऐतिहासिक चरित्रों के चित्रांकन में निर्देशकीय सृजनात्मकता.

...तो सिनेमा पूरी तरह से निर्देशक का माध्यम है, इसे ऐसे समझिए कि जिस तरह मां शुरू से अपने बच्चे को पाल पोसकर उसे बड़ा करती है वैसा है एक निर्देशक भी अपनी फ़िल्मों के साथ बर्ताव करता है। उसे इतनी छूट मिलनी चाहिए कि वो जो चाह रहा है उसे वो पर्दे पर बेहिचक दिखा सके.. और इस प्रोसेस में हम दर्शक को इतना भरोसा करना होगा कि वो निर्देशक भी इंसान है, उसके अंदर भी इंसानियत है. नहीं है ऐसा ?

🫡🫡

26 मार्च 2026. ❣️.

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कल, 6 दिसंबर 2020 को ट्विटर पर मेरा लिखा एक थ्रेड मिला..आज कल रामनवमी भी है तो कृपया पढ़ा जाए इसे -

"ये सबसे बड़ी दिक्कत है। ख़ासकर नार्थ इंडिया में जिस किसी को पनीर की सब्जी खाने को भी न मिलता हो पर वो एंड्रॉइड फोन और 1.5gb लेकर घूम रहा। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का कोर मेम्बरशिप लेकर घूम रहा है। जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके वो जान सकता था कि उसके और उसके बच्चे के लिए दाल खाना कितना ज़रूरी हो सकता है वो बन्दा उसी एंड्रॉयड फ़ोन से ये जानता है कि किसके फ्रिज में किसका माँस रखा है। किसने किधर लव जिहाद किया है और मथुरा के किस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। और हर दरगाह में शिव मंदिर होता ही है, जिसे इन ख़ास तबकों ने नेस्तनाबूद कर दिया है.

इनका सनातन धर्म संकट में आ गया है और ये दो कौड़ी के लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए अब हथियार उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे लोग हमारे बीच में ही हैं। मैं अपनी कहता हूँ मेरे नाना जी और दोनों मामा जी सेम ऐसे ही हो गए हैं 2014 के बाद से। मेरे पापा हो सकते थे पर मैंने और छोटे भाई ने उनके उठते हर एक ऐसे विचार को तर्क के साथ खारिज़ किया है। ऐसे लोग ग़लत नहीं हैं, ग़लत कुछ लोग हैं जो इन्हें ग़ुमराह कर रहे कि भाई जय श्री राम नहीं बोला तो रातों को नींद नहीं आएगी और वो सामने वाला नादान जय श्री राम बोलने लगता है जबकि उसको दाल खाना चाहिए, उसके बच्चे की संगति कैसी है ये देखनी चाहिए।

जय श्री राम बोलना ग़लत नहीं है। मेरी सुबह की शुरुआत श्री राम के भजन से ही होती है। राम मेरे जीवन में उतने तक ही हैं जितने से मेरे अंदर का रावण डरा रहे। धर्म नितांत, ख़ुद के बेडरूम के जैसे व्यक्तिगत मामला है। मेरा बेटा कल को इस्लाम/ईसाई क़बूल कर लेगा तो एक पिता के नाते मुझे शिकायत होगी मगर एक नागरिक की हैसियत से मुझे उसके विचार और धार्मिक झुकाव की इज़्ज़त करनी चाहिए।

धर्म को अपने घर तक ही रखिए और ये भरोसा रखिए कि आपका धर्म इत्ता कमज़ोर नहीं कि कोई आकर उसे दबा देगा या उसकी जड़ें हिला देगा। सबसे ज़रूरी बात कि ऐसे धार्मिक अँधे लोग जो हमारे आस पास थोक मात्रा में कुकुरमुत्ते माफ़िक़ उग आए हैं। इनको बिल्कुल साइड कीजिए अपने जीवन से.. धार्मिक विश्वास और धार्मिक अंधता में इन गदहों को ज़रा सा भी फ़र्क़ नहीं मालूम। यही ट्विटर पर पल रहे ढेर सारे, कितने तो पढ़ेंगे इसे और मन में दलील देंगे कि मन्टू पागल फ़िर शुरू है। इस टाइप के लोगों का इलाज बहुत ही आसान है। बस सब्र करना होगा। इन सब नमूनों के जो बच्चे होंगे या जो बच्चे इनके बड़े हो रहे हैं वो सब भी जवान होके इन्हीं के बताए नक्शेकदम पर चलेंगे तब बुढ़ापे में इन नमूनों को एहसास होगा कि जय श्री राम से ज़्यादा दाल खिलाना ज़रूरी था।

धर्म को बढ़ावा देना, उपासना करना क़तई ग़लत नहीं है पर किसी दूसरे धर्म की कमियाँ गिनाकर.. दूसरे धर्म से अंतर करके आप अपने मन में अपने धर्म के लिए जो इमारत खड़ी कर रहे हैं उसको लुढ़कने में 2 sec भी नहीं लगने.. बाकी तो समझदार पूरी दुनिया है ही.. है कि नहीं ?"

इसी थ्रेड के नीचे तब की एक मुस्लिम लड़की दोस्त का रिप्लाई आया हुआ है- अगर ऐसी पोस्ट हम लिखेंगे तो कमेंट आएगा "तुम्हें कोई दिक्कत है तो निकल जाओ पाकिस्तान" 



तो तो तो...

इसका फ़िल्म से कुछ लेना देना है क्या Mantuuu? हां.. फ़िल्म में एक जगह रणवीर की पत्नी को पता चल जाता कि हम्ज़ा(रणवीर) हिंदुस्तानी है तब वह अपनी पत्नी से कहता है कि हमें तुम्हारे मुल्क से कोई दुश्मनी नहीं है हमें दिक्कत है इसमें रहने वाले दहशतगर्दों से.. जो भारत को नहीं देखना चाहते.


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रणवीर की एक्टिंग 🖤
जमील वाला ट्विस्ट 🤝
अर्जुन रामपाल का पिता, जहांगीर 😆
फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ✨
बैकग्राउंड म्यूजिक 💯
पुराने गाने को नए अंदाज में 🌻

और सबसे बढ़कर आदित्य धर 🫡

[मंटू, धर साब की इतनी तारीफ़ मत कर, अभी वो रिटायर नहीं हुए हैं, आगे जाके अभी उनके भी कुछ ग़लत कर देने की गुंजाइश है]

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तो अब अपनी बात कर लूं ? तो ऊपर किसकी बात कर रहा था बे ?
Ok.

ख़ैर.. दीप्तांशु भईया की बात से ही इस पोस्ट को ख़त्म किया जाए.

आज दीप्तांशु भईया ट्विटर पर लिखे भी कि

मरना तो इस जहां में कोई हादसा नहीं, 
इस दौर-ए-नागवार में जीना कमाल है! ~ ग़ुलाम हसन.

तो वही.. मर जाना कोई बड़ी बात नहीं है Mantuuu..
मरने से पहले ऐसे ही जीते रहो.. तब बात बने... अभी दोपहर तक आए हो जीवन में, शाम तक ध्यान रखना, घर लौट भी जाना है. बिना जाने कि अगले ही दिन क्या होने वाला है जो भी आए, जो भी न आए... उसको भरपूर जियो.. क्योंकि असल बात जीने की ही है. असल बात जीवन जीने की है.

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सोमवार, मार्च 23, 2026

मारिया रिल्के, गुलाब और गांव रारोन.

रेनर मारिया रिल्के लिखते हैं जब कि

"अपने हृदय की हर उस बात के प्रति धैर्य रखें जो अभी अनसुलझी है। उन अनकहे सवालों से ही प्रेम करने की कोशिश करें, ठीक वैसे ही जैसे वे कोई 'बंद कमरे' हों या किसी 'विदेशी भाषा' में लिखी गई रहस्यमयी किताबें।
अभी जवाबों की तलाश न करें। वे आपको अभी मिल भी नहीं सकते, क्योंकि अभी आप उन्हें 'जी' नहीं पाएंगे। और असल बात तो सब कुछ जीने की ही है।इस वक्त, आप बस उन सवालों को जीएं। शायद भविष्य के किसी अनजाने दिन, आपको पता भी न चले और आप धीरे-धीरे खुद को उन जवाबों के भीतर सांस लेते हुए पाएंगे।"

तो रेनर मारिया रिल्के (1875–1926) केवल एक कवि नहीं, बल्कि आधुनिक साहित्य के सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे। इनकी माँ ने अपनी एक बेटी को खो दिया था। उस दुख में उन्होंने रिल्के के बचपन के शुरुआती पांच वर्षों तक उन्हें एक लड़की की तरह पाला। उन्हें लड़कियों के कपड़े पहनाए जाते थे।

रिल्के का मानना था कि सच्ची रचनात्मकता केवल 'एकांत' (Solitude) में ही जन्म ले सकती है। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अकेले यात्रा करते हुए या मित्रों के महलों और किलों में रहकर बिताया। 
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ज्ञान केवल शब्दों में नहीं होता, कुछ सच्चाइयाँ केवल अनुभव के माध्यम से ही समझ आती हैं। नहीं ? हमारे आपके मानने से क्या होता है ? मेरे मानने से लेकिन सबकुछ होता है। मेरी दुनिया में मेरा सबकुछ है, मेरे ईश्वर भी।

नवम्बर 2020 में लिखी हुई मेरी एक कविता जैसा कुछ मिला ट्विटर पर.. पढ़ना चाहेंगे.. नहीं ? Hehe.. नहीं पढ़ने का ऑप्शन है आपके पास ?


कविता में 'कविता' उतनी ही रहे
उदास लड़की में खिलखिलाने की संभावना उतनी ही रहे
जीवन से मायूसी उतनी ही दूर रहे
सिरहाने से किसी पसंदीदा किताब की वफ़ा उतनी ही रहे
ख़रगोश में बिल्ली से और बिल्ली में कुत्ते से बच जाने की हुनर उतनी ही रहे..
..जितनी कि सर्दियों की चाय में अदरक रहती है।
फिजिकल मैप में नीले रंग की ज़रूरत
रसोई में खिड़की की ज़रूरत
गर्मी में शाम और सर्दी में दोपहर की ज़रूरत
उदास तन्हा खाली आसमान में चाँद की ज़रूरत
दिल्ली में चाँदनी चौक की ज़रूरत
अफ़्रीका में टिम्बकटू की ज़रूरत..
...जितने ज़रूरी मसले ही जीवन की आपाधापी में खो जाते हैं!
दो लड़कियाँ झाँकती हैं परदे के किनारे से
सड़क के उस पार जाते नौजवान लड़के को जैसे
जैसे मंदिर के जलते दिए की लौ देखते हुए
बच्चे की कान में मस्जिद से उठती अजान की आवाज समा जाती है
जैसे माँ में बची रहती है 'माँ', चाहूँगा मैं भी 
कि तुम्हारी हँसी में भी उतना ही 'तुम्हारापन' बचा रहे
एक लड़की जब मिली मुझसे तो वो लड़ रही थी अपने स्वप्नों के लिए
जबकि 29 साल की उम्र में लड़कियाँ क्या करती हैं किसे नहीं पता ?
तब जाना मैंने कि दुनिया में कुछ चीज़ें बहुत पवित्र होती हैं
मसलन नदियों का बहना, फूलों का खिलना, हवा का चलना
चाय का कप में जा टिकना और स्वप्न के लिए लड़ना.
पिता जब मुझे टाफियाँ देते थे और बहुत सोचकर कुछ पैसे भी
तब माँ ओझल होकर देख रही होती थीं
पिता की आँख में उमड़ आए संकोच भरे प्यार को.
"तुमने ही बिगाड़ा है इसे" की जब उलाहना देते हुए
पिता, पृथ्वी रूपी माँ के लिए गर्मी के सूरज जैसा बनें तब
मुझे स्वाद मिला उन टाफियों के

हम्ममम...

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तो
रेनर मारिया रिल्के हैरानी की बात यह है कि दुनिया को जीवन जीने का तरीका सिखाने वाले का अपना कोई स्थायी घर नहीं था। वे पूरी ज़िंदगी एक बंजारे की तरह रहे। वे यूरोप के अलग-अलग शहरों-पेरिस, म्यूनिख, वेनिस और स्विट्जरलैंड के किलों में अतिथि बनकर रहे।

रिल्के की मृत्यु की कहानी भी उनकी कविताओं जैसी ही अजीब और दुखद है। कहा जाता है कि एक बार एक महिला मित्र के लिए गुलाब चुनते समय उनके हाथ में एक काँटा चुभ गया। उस मामूली घाव से उन्हें संक्रमण हो गया, जो बाद में 'ल्यूकेमिया' के रूप में सामने आया और उनकी मृत्यु का कारण बना। उनके चाहने वाले कहते हैं कि रिल्के को उनके पसंदीदा फूल 'गुलाब' ने ही ले लिया।

अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने ख़ुद अपनी समाधि के लिए ये पंक्तियाँ लिखी थीं, जो आज भी उनकी कब्र पर पर लिखी हुई है-

Rose, oh reiner Widerspruch, Lust, Niemandes Schlaf zu sein unter so viel Lidern.
(गुलाब, ओ शुद्ध अंतर्विरोध, इतनी सारी पलकों के नीचे किसी की नींद न होने का आनंद।)


हम्ममम....
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गर्मी आ गई है तो मेरा ज़्यादातर महीने गंजा रहना तय है। कुछ दिन पहले ही गंजा होने का सोचा था, किसी ने मना किया तो मान गया.. फिर भी मन में था कि नहीं नहीं Mantuuu गंजा हो जा.. कोई और क्या कह रहा इससे तुझे क्या मतलब ?
कल बाल कटवाने गया तब तक डिसाइड नहीं था कि गंजा होना है या बाल कटवाना है.

कुर्सी पर बैठे बैठे कानों तक टीवी पर चल रही फ़िल्म की आवाज़ आई, अल्लू अर्जुन-पूजा हेगड़े की कोई फ़िल्म चल रही थी, पिता बोलता है कि कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते आप कितना भी सजा के रखो उसे, एकदिन आयेगा जब उसे खाली करना होगा.

तो मैंने सोचा कि Mantuuuye गंजा मत हो.. ऐसे ही दौड़ दौड़ के इतना पतला कर लिया है ख़ुद को कि दिन भर में 2-3 लोग टोक दे रहे कि तबियत ख़राब हो गई थी क्या। गंजे सिर में तू 15 से भी कम का लगेगा..मत हो और बारिश हुई है ठंड बढ़ी है.. सर पर फसल रहने दे.. ये सब ख़ुद को मनाया जा रहा था कि गंजा होना या ना होना तेरा ही फैसला है किसी के कहने से तू रुक नहीं गया है 🫣



मेरे लिए दुनिया का सबसे वाहियात काम बाल कटवाना है और 
मेरे मन का न होने पर किसी और कहा मानना
पर इस बार मेरा ही मन हुआ कि गंजा होना टाल मंटू..
अब क्या पता मेरा मन हुआ या मेरा मन बनाया गया.. जो भी.


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तो रेनर मारिया रिल्के साब ये बताओ कि

शुरू के 5 साल लड़की बन के बिताए इसका असर तुम्हारे बाकी के 46 साल के जीवन पर कितना पड़ा ? कैसे पड़ा ? क्यों पड़ा ? पड़ा या तुमने पड़ने दिया ?

इसका जवाब शायद न मिले पर इनके कब्र पर जाना होगा एक बार..
वही वही वही... कहां ? स्विट्जरलैंड के वैलिस कैंटन में स्थित रारोन नामक एक छोटे से गांव में जाना होगा Mantuuu. Ok. चले जाएंगे, कोई बड़ी बात नहीं है ये.

   

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🙂.

रविवार, फ़रवरी 15, 2026

O'Romeo झूमियों !

देखिए भई, मेरे पसंदीदा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज शामिल हैं तो उनकी फ़िल्मों में रह गई कमियों पर ध्यान न जाना बहुत हद तक लाज़िमी है। पूर्वाग्रही (prejudice) माइंड ऐसे ही काम करता है। तो तो कहना यही है कि तभी आगे पढ़िए/देखिए.. नहीं तो और करने को कितना कुछ काम होगा ही जीवन में आपके, वो कीजिए :)


तो पहली बात तो मोतिहारी शहर की कर लेते हैं। कि छोटे से शहर में ये फ़िल्म रिलीज कैसे हुई ? मुझे ध्यान है जब 2014 में हैदर फिल्म (विशाल भारद्वाज की अबतक की सबसे पसंदीदा मेरी फ़िल्म) आई थी तब मैंने सोचा था कि इसे देखने मुज़फ्फरपुर (यहां से 80km दूर) चला जाऊँ, नहीं जा पाया और अफ़सोस अब तक है कि हैदर जैसी फ़िल्म थिएटर में न देख पाया, ख़ैर।

संजय कॉम्प्लेक्स, पिछले कुछ साल पहले ही ओपन हुआ है और पहली फ़िल्म मैंने इसमें जवान देखी थी। और अंदर बाहर से देखकर लगता ही नहीं कि मोतिहारी शहर में ऐसा कुछ एक्जिस्ट कर सकता है वो भी तब जब ज़्यादा  पैसे के टिकट न लगते हों। पर अच्छी बात है। है ये यहां और ठीक है, हम जैसे फ़िल्मी कीड़ों के लिए। डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम है भाई और क्या चाहिए ?

                            

अब तक इसमें जवान, आर्टिकल 370, कांतारा 2, तेरे इश्क़ में, धुरंधर और अब ओ रोमियो देख चुका हूँ।
          

         


        

मैं हूँ.. शाम को ऐसे दिखा.... haha और दोपहर में ऐसे- 

         


       


      

           

फ़िल्म पर क्या ही बात करें, अच्छी है फ़िल्म... समय है, मूड कर रहा तो देख आइए।

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, जो कि विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों में होती है। 

एक चीज़ जो खटकी कि सुपारी देकर मरवाने वाले पेशे में मारने वाला इंसान इतना अंदर घुस नहीं जाता टारगेट के और इतनी हिंसा केवल दिखाने के लिए दिखाई गई है। मारने वाला चुपके से मार के जान हथेली पर रख पतली गली से निकल लेता है, ढिंढोरा नहीं पीटता लेकिन वही ना, फ़िल्म है भई।

कुछ सीन्स वाक़ई अच्छे उतर आए हैं पर्दे पर। जब तृप्ति डिमरी रात में नाव पर बैठी तेरे ही लिए गुनगुनाती है या फ़िर क्लाइमेक्स से पहले शाहिद और तृप्ति का साथ में लिपटकर गन शॉट वाला सीन।

और पान की दुकान गाने की शुरुआत भी

और आशिक़ बने शाहिद के सामने जब एक मोहतरमा उन्हें प्लीज करने की कोशिश करती है तब शाहिद का ज़ोर ज़ोर से रो देने वाला सीन.

अविनाश तिवारी के कैरेक्टर को स्पेन में ही रखा है, उसे इंडिया लाया जाता तो फ़िल्म आधे घंटे और खींच जाती। तब उस केस में सीट के पीछे बैठा एक बंदा गरिया ही देता फ़िल्म बनाने वाले को। इरफ़ान साहब होते तो शायद विशाल उन्हें ये अविनाश वाला रोल देते उन्हें। 

"इश्क़ का फीवर" गाने में तृप्ति और शाहिद के चेहरे का क्लोजअप शॉट 💕

जिस मैसेज को देने के लिए तमन्ना भाटिया जी फ़िल्म में हैं, वो मक़सद अच्छे से पूरा हुआ है। ज़्यादातर बारी अमूर्त बातें, कमर्शियल सिनेमा के लिए नहीं होती हैं। विशाल भारद्वाज ये चीज़ समझते होंगे पर अपनी फ़िल्म में इससे बचते हुए दिखते नहीं हैं। अब यहां ये मुद्दा उठ सकता है कि फ़िल्म को निर्देशक अपने मन के लिए बना रहा है या दर्शकों के लिए ? अपने मन के लिए बना रहा है तब तो वो कुछ भी बनाए, दिखाए, फ़िर उसे ये उम्मीद छोड़ देनी होगी कि वीकेंड पर कितनी कमाई हुई और कितने करोड़ के क्लब में शामिल हुई या नहीं।

            
          


           
इंटरवल हो गया है। फर्स्ट हाफ ok ok है। 


अब जो चीज़ मुझे जमी फ़िल्म में उसपर आते हैं.. 
ये दोनों शॉट देखिए
                
                

ये काठमांडू का दृश्य है। और लगा जैसे कि अभी मैं थियेटर से निकलूं और चल दूं काठमांडू घूमने 😆

कुल मिलाकर- विशाल भारद्वाज के फिल्मोग्राफी और संगीत के मुरीद हैं तो देखी जा सकती है फ़िल्म। शाहिद और तृप्ति डिमरी साथ में अच्छे लग रहे। ...और 'पान की दुकान' गाने में दिशा पटानी भी जँच रहीं। सेकंड हाफ ज़्यादा अच्छा है। सारे गाने सुनने लायक हैं।

गुलज़ार साब, विशाल भारद्वाज की जोड़ी के लिए 🫡

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hmmmmmm..🐢।             14 फ़रवरी 2026 🫂

...दीवाने मोहब्बत के हैं जो है उनको पहला सलाम !

😊


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मंगलवार, जनवरी 27, 2026

15 मिनट

[अक्टूबर 2020, दिल्ली]

अच्छा सुनो!

सर्दियाँ आ रही, नियम से रोज़ 15 मिनट धूप में बैठना

किशोर कुमार के गाने सुनना शुरू करना और पापोन के किसी गाने को ख़त्म करके ही उठना..या गाना नहीं तो कम से कम अपने प्रिय कवि/कवयित्री की कोई एक कविता बोल के पढ़ना, उसे याद कर लेना

...याद से याद आया, मुझे भूलना नहीं 🙈

और हाँ, मेरे जित्ता ट्विटर न करना नाही फोटू खचैक करना... रोना तो बिल्कुल नहीं। नहीं तो रोना आए तो याद करना कैसे तुम्हें घुमा के पीठ पर मैं मुक्के जड़ता था..हालाँकि तुम घूमी भी नहीं कभी..हाँ पर रोना नहीं

और और और जो गिनती के गाने मैंने बातए उन्हें तो कभी न सुनना, सपने में भी नहीं

बच्चों को देखकर ऐसे मुस्कुराना कि उन्हें पुरज़ोर यक़ीन हो जाए कि दुनिया बहुत ही ज़्यादा ख़ूबसूरत है। भाई का ध्यान रखना, उसकी चाय झूठी ना करना। भाई को अकेले कभी कभार ही छोड़ना..

मंदिर.. हाँ मंदिर चले जाना रोज़ नहीं तो गैप करके। ख़ूब पढ़ना और हो सके तो कॉफ़ी कम करके चाय पीना

तुम्हारे बताए गाने, फ़िल्म, किताब, जगहें भला मैं कैसे भूलूँगा, भूलने की हर कोशिश कामयाब नहीं होती और तुम, तुमसे जुड़ी हर एक बात हर एक पहलू शिद्दत से याद आने लगते हैं और एक बात बताऊँ, मैं इन सबको भूलना भी नहीं चाहता 🙈

तुम ऐसे गुज़री हो जैसे बर्फ़ की सिल्ली से हवा गुज़र के किसी बुखार से ग्रस्त रोगी के ज़हन से छू गई हो। तुम उतना ही ठहर गई हो मुझमें जितना गंगा के पानी में पहाड़ी औषधीय पौधों के गुण, तुम मेरे उतनी ही क़रीब हो गई हो जितना कि उत्तर दिशा से ध्रुव तारा। 

पर सबसे अच्छी बात ये हुई कि

..कि तुम मुझमें आई भी ठहरी भी और शायद जा भी चुकी हो पर मेरा वजूद ज्यों का त्यों हैं। और क्या चाहिए एक दीवाने को। तुम्हारे आने के पहले और अब तुम्हारी अनुपस्थिति के बाद के दोनों 'मैं' में जो अंतर व्याप्त है वो सोचता हूँ तो अलग ही एहसास से भर जाता हूँ, तुम्हारा बस होना ही ❤

हम इसी पीढ़ी के हैं बावजूद हमारा इश्क़(?) सदियों पुराना वाला। और इस एक बात पर यक़ीन करके हम दोनों ने ही दोनों का बहुत भला किया है। नहीं तो आज के इश्क़ का अंज़ाम रुका हुआ पंखा, तेज़ भागती बसें/रेलगाड़ियां और उफ़नती हुई दरिया तय करती हैं।
 
बताया ना, हम ज़रूर इसी पीढ़ी के हैं मगर..

मगर सच्चे लगते हैं ये धरती ये नदियाँ ये रैना और tummmmmmmmmmmmmmmmm ❤ फ़िर गाने में घुस गया मैं 😐 तो मैं कह रहा था कि.. देखो यहाँ भी केवल मैं ही कह रहा हूँ.. तुम्हें कभी मौका नहीं दिया मैंने बोलने को। मैं श्रापित हूँ यार, मेरी कहानियाँ मेरे मौत के साथ ही ख़त्म होगी

और ये मौत की बात हम क्यों करने लगे भला
तुम हर बारी मेरे अगली कहानी के फ़िर से शुरू होने के दरमियान "हाँ ह्म्म्म अच्छा भक्क ठीक है बाबा" कहती रही.. कभी कभी बोलने का मौका दिया पर वो इसलिए कि लिखते-लिखते बोलते-बोलते मैं थक जाता था इसलिए 🙈

7.83 ग्राम दुःख इस बात का है कि तुम जैसी शख़्सियत से जुड़ के, बातें करके भी मेरे से चुप नहीं रहा गया ये जानने के बावजूद कि 'सुनना' सभी कलाओं में सर्वोपरि है शायद! फ़िर भी मैं बड़बड़ाता गया और तुन ध्यान से सुनने में और माहिर हो गई। इसके लिए शुक्र अदा करना मेरा, जहाँ भी होना :)

चलो हो गए मेरे धूप में 15 मिनट :)

'लेकर हम दीवाना दिल' से शुरू किया था और पापोन का 'ये मोज़ेज़ा(चमत्कार) भी कभी, मोहब्बत दिखाए मुझे, के संग(पत्थर) तुझपे गिरे और जख़्म आए मुझे' गाना ख़त्म हो गया। 

नीचे चलता हूँ अब, पेट भरने का जुगाड़ करता हूँ :)


:)

श्राप


[जनवरी 2021, दिल्ली]

प्रिय _______!

कहाँ हो तुम ? ठीक हो ना... ये तो फॉर्मेलिटी है। ऊपरी तौर पर व्यक्त की गई मेरी खोखली चिंता। तुम जहाँ भी हो जैसी हो उस परिस्थिति को झेलो.. उसमें फँसने में तुमने भी तो कभी दिलचस्पी दिखाई थी, नहीं ? तो मन ख़ुश नहीं रहता होगा तो भी ख़ुद को धोखे में रखो और ख़ुश दिखो

तुम तुम हो मैं मैं हूँ। 20वीं सदी में हमें दुनिया के तमाम लोगों को छोड़कर एक दूजे से ही मोहब्बत हुई। हुई क्या ? तुम्हारा तुम जानो, मेरा मैं जानता हूँ। पता है ? मेरी जो चीज़ें पूरी तरह खो चुकी हैं, ये वे चीज़ें हैं जिन्हें मैंने जब खोया तो वे किसी और को मिली भी नहीं थीं..

गुज़र रहे लम्हों की तस्वीर आगे जाकर पीछे देखने पर ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। तो देखो, याद करो.. हमने प्यार ही किया था क्या ? मैं कविता-कहानी के लिए कच्चे माल की तलाश में था तुम अपने पहले प्रेम को भूल जाने के भरसक प्रयास में थी। तुम अपने पहले प्रेमी को भूल नहीं पाई इसलिए मुझे

ढेर सारा कच्चा माल मिल गया। तुम पर पहले प्रेम की बातें, छुअन, मलाल ये सब हावी नहीं होता तो मैं भी प्यार कर लेता, कच्चा माल कहीं और ढूंढ़ता। पर सबकुछ का तय है ना.. हम कुछ नहीं करते हैं.. हमें आगे जाकर चाय पीते हुए, सूरज को डूबते हुए, मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ते हुए पीछे देखते हैं

और मैं मुस्कुराता हूँ कि मैं सफ़ल रहा तुम असफ़ल। पर तुम्हें भूलना क्यों नहीं आता है ? माना पहला प्रेम क़तई भूलने की चीज़ नहीं मगर मन के गहरे अतल में तो छुपा ही सकती हो, ये हुनर सीखो.. नहीं तो तुम्हारा अंत शायद अख़बार के तीसरे पन्ने के किसी कोने में छपी उस ख़बर में

ख़बर में हो जिसे कोई नहीं पढ़ता। यही सच्चाई है। हम सच नहीं स्वीकार करते और चमत्कार होने की उम्मीद लिये ऐसी लड़ाई में कूद जाते हैं जहाँ हार तय है। हार मान लेना हर बार डरपोक होने की कसौटी नहीं होती, पागल लड़की!

पता है ? अगर हम 15 मिनट बिना हिले-डुले बैठे या लेटे रहें तो सो जायेंगे

पढ़ती हो कि नहीं ? पढ़ा करो.. जब किसी और का सुख पढ़ोगी तो दुनिया पर और भरोसा कर पाओगी, उस दुनिया पर जिसमें मेरे जैसे लोग नहीं रहते। किसी का दुःख पढ़ोगी तो तुम्हारा दुःख कम प्रतीत होगा। पढ़ा करो.. व्यस्त रखो ख़ुद को... जो बेड़ियाँ हमें बहुत कसकर जकड़ती है ना ये वहीं बेड़ियाँ हैं

जिन्हें हमने कभी तोड़ दिया होता है। निराशा लाज़मी है। इसे स्वीकार करो। लाज़मी से याद आया आज कैफ़ी आज़मी साब का जन्मदिन भी है। इनके बारे में जानो, इनकी 'औरत' नज़्म पढ़ो। आज सकरात भी है। हमारे इधर 'खिचड़ी' कहते हैं इसे। आज सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश कर जायेंगे, सब अच्छा होगा अब

सब अच्छा होना चाहिए... मेरे पास शब्दों में देने लायक ही उम्मीद है कि अपने दुर्भाग्य के बारे में कभी निरीहता से मत देखो, क्योंकि तुम्हारे दुर्भाग्य के लिए थोड़े-थोड़े से सभी ज़िम्मेदार हैं।

चलो अब ख़त्म करता हूँ, ख़ुश रहो और मुझे थोड़ा-थोड़ा भूलती रहो

चाय ठंडी हो रही है। प्लूटो को भी चाय पीनी है मगर उसे देता नहीं हूँ तबतक जबतक कि उसकी इंतज़ार और व्याकुलता से भरी आँखों को देखकर मुझे किसी कविता-कहानी के लिए कोई कच्चा माल न मिल जाए। आज दिल्ली में घना कुहरा है, आज मुझे बहुत कुछ पढ़ना भी है, बहुत सारी फ़िल्में भी देखनी है :)


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