5 जनवरी 2026

चार जनवरी

 
              

                                     
               

                   
               

                     
               

                     
               

                   
               

                     
               

                                           
                


                   
               


चार जनवरी

मेरी उपस्थिति से
ऊबने वाली चीज़ों के पास विकल्प का अभाव
मुझे गुमान में रखती है कि मैं अच्छा कर रहा हूं- 
फ़िल्में देखता हूं
रोटी बना लेता हूं
पढ़ता हूं
जूते ढीले बांधता हूं
धूप में बैठकर मां के बारे में सोचता हूं
समय से सोकर, समय से उठता हूं
बोलने के क्रम में 
सोचने तक की सब्र से ख़ुद को भरना चाहता हूं
क्योंकि
फूलों और लोगों की भीड़ से लदी
घूम रही है अब भी धरती।
दुनिया की नज़र में आई मेरी
तमाम अच्छाइयों के बावजूद
मैं जी गया एक साल और
और मेरे प्रतीक्षा न करने पर भी
आने वाले कई और साल
जीता जाऊंगा ऐसे ही.. 
जैसे ठिठुरन के दिनों में चार जनवरी आ जाता है
जैसे फूल खिलते हैं,
जैसे दुनिया भर की माएं दुःख छिपाती हैं
जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती है, 
और उनकी अच्छाइयां भी उनके बुराइयों के आसमान तले..

🙂

1 जनवरी 2026

जूते अच्छे हैं.



                

साल की शुरुआत कारू की खातिरदारी से हुई। कल रात रोते हुए मेन गेट तक आ गया था। तो कल रात और आज दिनभर इसे अपने पास ही रख लिया। दिनभर धूप में छत पर मेरे आगे-पीछे करता रहा और शाम को जैसे ही इसको मेन गेट खुला दिखा, फटाक से अपने भाई बहनों के पास चला गया। ख़ुद ही आया था, ख़ुद ही लौट गया। यही होना चाहिए। चीज़ें, लोग, शऊर ये सब जबरदस्ती आए तो टिकती नहीं हैं। कारू को पेट भर खाना ज़रूर मिला पर सुकून तो उसे अपने भाई-बहन के साथ ही आएगा न। 

               


2026
 आ गया। साल ऐसे ही आते और बीत जाते हैं। जैसे हमें सूरज निकलते और डूबते दिखाई देता है। समय क्या है ? जावेद अख़्तर साब की एक नज़्म हैं- वक़्त क्या है ?

ये वक़्त क्या है
ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है

ये वक़्त क्या है ?

उनकी ही आवाज़ में पूरी नज़्म सुनिए


              

आसमान के एक तरफ़ से सूरज डूब रहा था और दूसरी ओर से चांद निकल गया था। इस हद तक समय की पाबंदी से बंधने के लिए हम इंसानों से क्या गिरवी रखा जा सकता है ? मालूम क्या ?

                        
               


आज इधर 12-15 दिनों के बाद सूर्यदेव के दर्शन हुए हैं। आज सबकी छतों पर कपड़े ही कपड़े दिख रहे थे। अब शायद मौसम साफ हो जाए और ठंड कम। शाम को सोचा कि कहीं तो घूम आया जाए। नए जूते लिये हैं तो आज ही पहन के देखा जाए। तो बाइक उठाया और गांधी मैदान चला गया। नए साल के पहले दिन को यादगार बनाने के लिए भीड़ जमा थी। बच्चे, मर्द, औरतें, लड़के-लड़कियां, रोज़ दौड़ने वाले, क्रिकेट खेलने वाले.. और छोटे-मोटे दुकानदार सब। मैं निपट अकेला, इस पार से उस पार इधर-उधर देखते हुए, चलते हुए गया और वापस आ गया। और लाख टके की ज्ञान से रूबरू हुआ कि "जूते अच्छे हैं, कंफर्टेबल हैं, हल्के हैं और ऐसे ही होने चाहिए।"

              


वापसी में शहर (मरीन ड्राइव) होते हुए लौटा। सोचा कुछ खा भी लेता हूं। पहली बार पापड़ी चाट खाया। अच्छा था। और मीठे में मालपुआ। दुकानदार को पैसे दिए और सलाह भी कि मालपूए गरम करके रखो भई।

               


तो शायद पहली बार, नए साल की शुरुआत अकेले रहते हुए हुई है। मम्मी-पापा गांव, भाई-बहन सब दिल्ली-मुम्बई. हां, आज बड़ी दीदी का भूटान से इंस्टाग्राम पर वीडियो कॉल आया था।

अभी शाम को रवि (बनारस वाला) ने काशीनाथ बाबा वाला एक वीडियो भेजा। उसमें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साब कबीर का एक गाना गा रहे हैं और क्या ही शानदार सुर-ताल में गा रहे हैं। मन शांत और ख़ुश हो गया एकदम से। 


नए साल पर रेजोल्यूशन लेने का चलन है। हालांकि कुछ भी करने के लिए नए साल का इंतज़ार क्यों करना। फिर भी..इस साल किताबों को और ज़्यादा वक़्त देना है, सेलफोन को कम। सुनना ज़्यादा है, बोलना कम, गुस्से पर तो हद कंट्रोल करना होगा।

अगले छह महीने में इन 13 किताबों को पढ़ जाना है। देखते हैं, हो पाता है या नहीं

                

..तो शुरू किया जाए

                 


🙂

7 दिसंबर 2025

गाड़ी खींचो रे...


हम जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं और जीवन हम में अनुभव समोते हुए हमसे आगे बढ़ रहा होता है। चलते-चलते कहीं किसी जगह मील का पत्थर (नौकरी, किसी अज़ीज़ से अलगाव, किसी से जुड़ाव, शादी, कभी कुछ, कभी कुछ..) लग जाता है पर हमारा चलना रुकता नहीं है। 


जिस पल हम जीवन से मिले अनुभवों की बारीकियों पर गौर करते हैं लगता है अब ये स्वभाव स्थाई रह जाने वाला है, जो चाहिए वो संतुष्टि का भाव मिल गया है पर समय बीतता है और हमें इस सबक से भी सामना होता है कि अरे ये तो क्षणिक था जो भी था। इंसान प्रेरणा के बल पर बहुत कुछ को स्थाई मानने लगता है। प्रेरणा की बत्ती गुल होने के बाद किया गया काम, सोचा गया जीवन ही कुल जमा कमाई होती है जो परत दर परत जमा होते-होते किसी दिन संतुष्टि का भाव लाता है फिर एक मील का पत्थर लगता है। जीवन ऐसे ही बढ़ता है और ख़त्म हो जाता है।

"हमें कैसे याद रखा जाएगा ? कोई याद भी रखेगा या नहीं ?" का मोह ही है जो दुनिया से जोड़े रखता है, विरक्ति की भाव को दूर भगाता रहता है। 

दादा को गुजरे 50 साल होने जा रहे। बामुश्किल, किसी जमीन या उनके द्वारा बनाए गांव वाले घर की बात आती है तो उनका ज़िक्र होता है। छत वाले कमरे में उनका पहना गया टंगे कोट को देखकर उनकी याद आती है। बीते समय की बात होती है तो पापा याद करते हैं कि "बाबू के टाइम पर...ऐसे... वैसे..." पर कभी-कभी ही...

मतलब कि 50 साल में ही आदमी को भूला दिया जाता है? वो भी तब जब दादा की वज़ह से ही हमारी यह पारिवारिक पीढ़ी सुख(?) भोग रही है। 50 साल तो बहुत ही कम समय है। नहीं ?

नज़रिए की बात है और नज़रिया समय के साथ बदलता है। सुबह आदमी कोई और होता है शाम को कुछ और बन जाता है। कभी-कभी तो आदमी की फितरत समय की भी मोहताज नहीं होती।

लाखों सेल्फ हेल्प किताबें और अब पॉडकास्ट का समन्दर, जीवन की गाड़ी कैसे आगे बढ़ेगी, सब कोई बांच रहा है। सब कोई सीख रहा है, सबकी गाड़ी अटकी पड़ी है। सब में आगे बढ़ने का दिखावा तो है ही।


...और जिनको जीवन ने इतना सोचने तक की सहूलियत नहीं दी है कि उनका जीवन कैसे बीत रहा है ? उनके लिए भी तो यही जीवन है, उनके मोह का क्या ? उन्हें भूल जाने वाले और बहुत जल्दी भूल जाने वालों की फेहरिस्त तो लंबी हो जाएगी। 


फ्रांसीसी लेखक आंद्रे जिद ने कहा था- "जो कुछ भी कहा जाना था, वो पहले ही कहा जा चुका है। लेकिन चूंकि कोई सुन नहीं रहा था, इसलिए हर बात को फ़िर से कहा जाना ज़रूरी है।"

...तो आप सुन रहे हैं ना ? हाहा.
                  
:)