15 फ़रवरी 2026

O'Romeo झूमियों !

देखिए भई, मेरे पसंदीदा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज शामिल हैं तो उनकी फ़िल्मों में रह गई कमियों पर ध्यान न जाना बहुत हद तक लाज़िमी है। पूर्वाग्रही (prejudice) माइंड ऐसे ही काम करता है। तो तो कहना यही है कि तभी आगे पढ़िए/देखिए.. नहीं तो और करने को कितना कुछ काम होगा ही जीवन में आपके, वो कीजिए :)


तो पहली बात तो मोतिहारी शहर की कर लेते हैं। कि छोटे से शहर में ये फ़िल्म रिलीज कैसे हुई ? मुझे ध्यान है जब 2014 में हैदर फिल्म आई थी तब मैंने सोचा था कि इसे देखने मुज़फ्फरपुर (यहां से 80km दूर) चला जाऊँ, नहीं जा पाया और अफ़सोस अब तक है कि हैदर जैसी फ़िल्म थिएटर में न देख पाया, ख़ैर।

संजय कॉम्प्लेक्स, पिछले कुछ साल पहले ही ओपन हुआ है और पहली फ़िल्म मैंने इसमें जवान देखी थी। और अंदर बाहर से देखकर लगता ही नहीं कि मोतिहारी शहर में ऐसा कुछ एक्जिस्ट कर सकता है वो भी तब जब ज़्यादा  पैसे के टिकट न लगते हों। पर अच्छी बात है। है ये यहां और ठीक है, हम जैसे फ़िल्मी कीड़ों के लिए। डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम है भाई और क्या चाहिए ?

                            

अब तक इसमें जवान, आर्टिकल 370, कांतारा 2, तेरे इश्क़ में, धुरंधर और अब ओ रोमियो देख चुका हूँ।
          

         


        

मैं हूँ.. शाम को ऐसे दिखा.... haha और दोपहर में ऐसे- 

         


       


      

           

फ़िल्म पर क्या ही बात करें, अच्छी है फ़िल्म... समय है, मूड कर रहा तो देख आइए।

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, जो कि विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों में होती है। 

एक चीज़ जो खटकी कि सुपारी देकर मरवाने वाले पेशे में मारने वाला इंसान इतना अंदर घुस नहीं जाता टारगेट के और इतनी हिंसा केवल दिखाने के लिए दिखाई गई है। मारने वाला चुपके से मार के जान हथेली पर रख पतली गली से निकल लेता है, ढिंढोरा नहीं पीटता लेकिन वही ना, फ़िल्म है भई।

कुछ सीन्स वाक़ई अच्छे उतर आए हैं पर्दे पर। जब तृप्ति डिमरी रात में नाव पर बैठी तेरे ही लिए गुनगुनाती है या फ़िर क्लाइमेक्स से पहले शाहिद और तृप्ति का साथ में लिपटकर गन शॉट वाला सीन।

और पान की दुकान गाने की शुरुआत भी

और आशिक़ बने शाहिद के सामने जब एक मोहतरमा उन्हें प्लीज करने की कोशिश करती है तब शाहिद का ज़ोर ज़ोर से रो देने वाला सीन.

अविनाश तिवारी के कैरेक्टर को स्पेन में ही रखा है, उसे इंडिया लाया जाता तो फ़िल्म आधे घंटे और खींच जाती। तब उस केस में सीट के पीछे बैठा एक बंदा गरिया ही देता फ़िल्म बनाने वाले को।

जिस मैसेज को देने के लिए तमन्ना भाटिया जी फ़िल्म में हैं, वो मक़सद अच्छे से पूरा हुआ है। ज़्यादातर बारी अमूर्त बातें, कमर्शियल सिनेमा के लिए नहीं होती हैं। विशाल भारद्वाज ये चीज़ समझते होंगे पर अपनी फ़िल्म में इससे बचते हुए दिखते नहीं हैं। अब यहां ये मुद्दा उठ सकता है कि फ़िल्म को निर्देशक अपने मन के लिए बना रहा है या दर्शकों के लिए ? अपने मन के लिए बना रहा है तब तो वो कुछ भी बनाए, दिखाए, फ़िर उसे ये उम्मीद छोड़ देनी होगी कि वीकेंड पर कितनी कमाई हुई और कितने करोड़ के क्लब में शामिल हुई या नहीं।

            
          


           
इंटरवल हो गया है। फर्स्ट हाफ ok ok है। 


अब जो चीज़ मुझे जमी फ़िल्म में उसपर आते हैं.. 
ये दोनों शॉट देखिए
                
                

ये काठमांडू का दृश्य है। और लगा जैसे कि अभी मैं थियेटर से निकलूं और चल दूं काठमांडू घूमने 😆

कुल मिलाकर- विशाल भारद्वाज के फिल्मोग्राफी और संगीत के मुरीद हैं तो देखी जा सकती है फ़िल्म। शाहिद और तृप्ति डिमरी साथ में अच्छे लग रहे। ...और 'पान की दुकान' गाने में दिशा पटानी भी जँच रहीं। सेकंड हाफ ज़्यादा अच्छा है। सारे गाने सुनने लायक हैं।

गुलज़ार साब, विशाल भारद्वाज की जोड़ी के लिए 🫡

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hmmmmmm..🐢।             14 फ़रवरी 2026 🫂

...दीवाने मोहब्बत के हैं जो है उनको पहला सलाम !

😊


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