[जनवरी 2021, दिल्ली]
कहाँ हो तुम ? ठीक हो ना... ये तो फॉर्मेलिटी है। ऊपरी तौर पर व्यक्त की गई मेरी खोखली चिंता। तुम जहाँ भी हो जैसी हो उस परिस्थिति को झेलो.. उसमें फँसने में तुमने भी तो कभी दिलचस्पी दिखाई थी, नहीं ? तो मन ख़ुश नहीं रहता होगा तो भी ख़ुद को धोखे में रखो और ख़ुश दिखो
तुम तुम हो मैं मैं हूँ। 20वीं सदी में हमें दुनिया के तमाम लोगों को छोड़कर एक दूजे से ही मोहब्बत हुई। हुई क्या ? तुम्हारा तुम जानो, मेरा मैं जानता हूँ। पता है ? मेरी जो चीज़ें पूरी तरह खो चुकी हैं, ये वे चीज़ें हैं जिन्हें मैंने जब खोया तो वे किसी और को मिली भी नहीं थीं..
गुज़र रहे लम्हों की तस्वीर आगे जाकर पीछे देखने पर ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। तो देखो, याद करो.. हमने प्यार ही किया था क्या ? मैं कविता-कहानी के लिए कच्चे माल की तलाश में था तुम अपने पहले प्रेम को भूल जाने के भरसक प्रयास में थी। तुम अपने पहले प्रेमी को भूल नहीं पाई इसलिए मुझे
ढेर सारा कच्चा माल मिल गया। तुम पर पहले प्रेम की बातें, छुअन, मलाल ये सब हावी नहीं होता तो मैं भी प्यार कर लेता, कच्चा माल कहीं और ढूंढ़ता। पर सबकुछ का तय है ना.. हम कुछ नहीं करते हैं.. हमें आगे जाकर चाय पीते हुए, सूरज को डूबते हुए, मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ते हुए पीछे देखते हैं
और मैं मुस्कुराता हूँ कि मैं सफ़ल रहा तुम असफ़ल। पर तुम्हें भूलना क्यों नहीं आता है ? माना पहला प्रेम क़तई भूलने की चीज़ नहीं मगर मन के गहरे अतल में तो छुपा ही सकती हो, ये हुनर सीखो.. नहीं तो तुम्हारा अंत शायद अख़बार के तीसरे पन्ने के किसी कोने में छपी उस ख़बर में
ख़बर में हो जिसे कोई नहीं पढ़ता। यही सच्चाई है। हम सच नहीं स्वीकार करते और चमत्कार होने की उम्मीद लिये ऐसी लड़ाई में कूद जाते हैं जहाँ हार तय है। हार मान लेना हर बार डरपोक होने की कसौटी नहीं होती, पागल लड़की!
पता है ? अगर हम 15 मिनट बिना हिले-डुले बैठे या लेटे रहें तो सो जायेंगे
पढ़ती हो कि नहीं ? पढ़ा करो.. जब किसी और का सुख पढ़ोगी तो दुनिया पर और भरोसा कर पाओगी, उस दुनिया पर जिसमें मेरे जैसे लोग नहीं रहते। किसी का दुःख पढ़ोगी तो तुम्हारा दुःख कम प्रतीत होगा। पढ़ा करो.. व्यस्त रखो ख़ुद को... जो बेड़ियाँ हमें बहुत कसकर जकड़ती है ना ये वहीं बेड़ियाँ हैं
जिन्हें हमने कभी तोड़ दिया होता है। निराशा लाज़मी है। इसे स्वीकार करो। लाज़मी से याद आया आज कैफ़ी आज़मी साब का जन्मदिन भी है। इनके बारे में जानो, इनकी 'औरत' नज़्म पढ़ो। आज सकरात भी है। हमारे इधर 'खिचड़ी' कहते हैं इसे। आज सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश कर जायेंगे, सब अच्छा होगा अब
सब अच्छा होना चाहिए... मेरे पास शब्दों में देने लायक ही उम्मीद है कि अपने दुर्भाग्य के बारे में कभी निरीहता से मत देखो, क्योंकि तुम्हारे दुर्भाग्य के लिए थोड़े-थोड़े से सभी ज़िम्मेदार हैं।
चलो अब ख़त्म करता हूँ, ख़ुश रहो और मुझे थोड़ा-थोड़ा भूलती रहो
चाय ठंडी हो रही है। प्लूटो को भी चाय पीनी है मगर उसे देता नहीं हूँ तबतक जबतक कि उसकी इंतज़ार और व्याकुलता से भरी आँखों को देखकर मुझे किसी कविता-कहानी के लिए कोई कच्चा माल न मिल जाए। आज दिल्ली में घना कुहरा है, आज मुझे बहुत कुछ पढ़ना भी है, बहुत सारी फ़िल्में भी देखनी है :)
:)
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