27 जनवरी 2026

15 मिनट

[अक्टूबर 2020, दिल्ली]

अच्छा सुनो!

सर्दियाँ आ रही, नियम से रोज़ 15 मिनट धूप में बैठना

किशोर कुमार के गाने सुनना शुरू करना और पापोन के किसी गाने को ख़त्म करके ही उठना..या गाना नहीं तो कम से कम अपने प्रिय कवि/कवयित्री की कोई एक कविता बोल के पढ़ना, उसे याद कर लेना

...याद से याद आया, मुझे भूलना नहीं 🙈

और हाँ, मेरे जित्ता ट्विटर न करना नाही फोटू खचैक करना... रोना तो बिल्कुल नहीं। नहीं तो रोना आए तो याद करना कैसे तुम्हें घुमा के पीठ पर मैं मुक्के जड़ता था..हालाँकि तुम घूमी भी नहीं कभी..हाँ पर रोना नहीं

और और और जो गिनती के गाने मैंने बातए उन्हें तो कभी न सुनना, सपने में भी नहीं

बच्चों को देखकर ऐसे मुस्कुराना कि उन्हें पुरज़ोर यक़ीन हो जाए कि दुनिया बहुत ही ज़्यादा ख़ूबसूरत है। भाई का ध्यान रखना, उसकी चाय झूठी ना करना। भाई को अकेले कभी कभार ही छोड़ना..

मंदिर.. हाँ मंदिर चले जाना रोज़ नहीं तो गैप करके। ख़ूब पढ़ना और हो सके तो कॉफ़ी कम करके चाय पीना

तुम्हारे बताए गाने, फ़िल्म, किताब, जगहें भला मैं कैसे भूलूँगा, भूलने की हर कोशिश कामयाब नहीं होती और तुम, तुमसे जुड़ी हर एक बात हर एक पहलू शिद्दत से याद आने लगते हैं और एक बात बताऊँ, मैं इन सबको भूलना भी नहीं चाहता 🙈

तुम ऐसे गुज़री हो जैसे बर्फ़ की सिल्ली से हवा गुज़र के किसी बुखार से ग्रस्त रोगी के ज़हन से छू गई हो। तुम उतना ही ठहर गई हो मुझमें जितना गंगा के पानी में पहाड़ी औषधीय पौधों के गुण, तुम मेरे उतनी ही क़रीब हो गई हो जितना कि उत्तर दिशा से ध्रुव तारा। 

पर सबसे अच्छी बात ये हुई कि

..कि तुम मुझमें आई भी ठहरी भी और शायद जा भी चुकी हो पर मेरा वजूद ज्यों का त्यों हैं। और क्या चाहिए एक दीवाने को। तुम्हारे आने के पहले और अब तुम्हारी अनुपस्थिति के बाद के दोनों 'मैं' में जो अंतर व्याप्त है वो सोचता हूँ तो अलग ही एहसास से भर जाता हूँ, तुम्हारा बस होना ही ❤

हम इसी पीढ़ी के हैं बावजूद हमारा इश्क़(?) सदियों पुराना वाला। और इस एक बात पर यक़ीन करके हम दोनों ने ही दोनों का बहुत भला किया है। नहीं तो आज के इश्क़ का अंज़ाम रुका हुआ पंखा, तेज़ भागती बसें/रेलगाड़ियां और उफ़नती हुई दरिया तय करती हैं।
 
बताया ना, हम ज़रूर इसी पीढ़ी के हैं मगर..

मगर सच्चे लगते हैं ये धरती ये नदियाँ ये रैना और tummmmmmmmmmmmmmmmm ❤ फ़िर गाने में घुस गया मैं 😐 तो मैं कह रहा था कि.. देखो यहाँ भी केवल मैं ही कह रहा हूँ.. तुम्हें कभी मौका नहीं दिया मैंने बोलने को। मैं श्रापित हूँ यार, मेरी कहानियाँ मेरे मौत के साथ ही ख़त्म होगी

और ये मौत की बात हम क्यों करने लगे भला
तुम हर बारी मेरे अगली कहानी के फ़िर से शुरू होने के दरमियान "हाँ ह्म्म्म अच्छा भक्क ठीक है बाबा" कहती रही.. कभी कभी बोलने का मौका दिया पर वो इसलिए कि लिखते-लिखते बोलते-बोलते मैं थक जाता था इसलिए 🙈

7.83 ग्राम दुःख इस बात का है कि तुम जैसी शख़्सियत से जुड़ के, बातें करके भी मेरे से चुप नहीं रहा गया ये जानने के बावजूद कि 'सुनना' सभी कलाओं में सर्वोपरि है शायद! फ़िर भी मैं बड़बड़ाता गया और तुन ध्यान से सुनने में और माहिर हो गई। इसके लिए शुक्र अदा करना मेरा, जहाँ भी होना :)

चलो हो गए मेरे धूप में 15 मिनट :)

'लेकर हम दीवाना दिल' से शुरू किया था और पापोन का 'ये मोज़ेज़ा(चमत्कार) भी कभी, मोहब्बत दिखाए मुझे, के संग(पत्थर) तुझपे गिरे और जख़्म आए मुझे' गाना ख़त्म हो गया। 

नीचे चलता हूँ अब, पेट भरने का जुगाड़ करता हूँ :)


:)

श्राप


[जनवरी 2021, दिल्ली]

प्रिय _______!

कहाँ हो तुम ? ठीक हो ना... ये तो फॉर्मेलिटी है। ऊपरी तौर पर व्यक्त की गई मेरी खोखली चिंता। तुम जहाँ भी हो जैसी हो उस परिस्थिति को झेलो.. उसमें फँसने में तुमने भी तो कभी दिलचस्पी दिखाई थी, नहीं ? तो मन ख़ुश नहीं रहता होगा तो भी ख़ुद को धोखे में रखो और ख़ुश दिखो

तुम तुम हो मैं मैं हूँ। 20वीं सदी में हमें दुनिया के तमाम लोगों को छोड़कर एक दूजे से ही मोहब्बत हुई। हुई क्या ? तुम्हारा तुम जानो, मेरा मैं जानता हूँ। पता है ? मेरी जो चीज़ें पूरी तरह खो चुकी हैं, ये वे चीज़ें हैं जिन्हें मैंने जब खोया तो वे किसी और को मिली भी नहीं थीं..

गुज़र रहे लम्हों की तस्वीर आगे जाकर पीछे देखने पर ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। तो देखो, याद करो.. हमने प्यार ही किया था क्या ? मैं कविता-कहानी के लिए कच्चे माल की तलाश में था तुम अपने पहले प्रेम को भूल जाने के भरसक प्रयास में थी। तुम अपने पहले प्रेमी को भूल नहीं पाई इसलिए मुझे

ढेर सारा कच्चा माल मिल गया। तुम पर पहले प्रेम की बातें, छुअन, मलाल ये सब हावी नहीं होता तो मैं भी प्यार कर लेता, कच्चा माल कहीं और ढूंढ़ता। पर सबकुछ का तय है ना.. हम कुछ नहीं करते हैं.. हमें आगे जाकर चाय पीते हुए, सूरज को डूबते हुए, मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ते हुए पीछे देखते हैं

और मैं मुस्कुराता हूँ कि मैं सफ़ल रहा तुम असफ़ल। पर तुम्हें भूलना क्यों नहीं आता है ? माना पहला प्रेम क़तई भूलने की चीज़ नहीं मगर मन के गहरे अतल में तो छुपा ही सकती हो, ये हुनर सीखो.. नहीं तो तुम्हारा अंत शायद अख़बार के तीसरे पन्ने के किसी कोने में छपी उस ख़बर में

ख़बर में हो जिसे कोई नहीं पढ़ता। यही सच्चाई है। हम सच नहीं स्वीकार करते और चमत्कार होने की उम्मीद लिये ऐसी लड़ाई में कूद जाते हैं जहाँ हार तय है। हार मान लेना हर बार डरपोक होने की कसौटी नहीं होती, पागल लड़की!

पता है ? अगर हम 15 मिनट बिना हिले-डुले बैठे या लेटे रहें तो सो जायेंगे

पढ़ती हो कि नहीं ? पढ़ा करो.. जब किसी और का सुख पढ़ोगी तो दुनिया पर और भरोसा कर पाओगी, उस दुनिया पर जिसमें मेरे जैसे लोग नहीं रहते। किसी का दुःख पढ़ोगी तो तुम्हारा दुःख कम प्रतीत होगा। पढ़ा करो.. व्यस्त रखो ख़ुद को... जो बेड़ियाँ हमें बहुत कसकर जकड़ती है ना ये वहीं बेड़ियाँ हैं

जिन्हें हमने कभी तोड़ दिया होता है। निराशा लाज़मी है। इसे स्वीकार करो। लाज़मी से याद आया आज कैफ़ी आज़मी साब का जन्मदिन भी है। इनके बारे में जानो, इनकी 'औरत' नज़्म पढ़ो। आज सकरात भी है। हमारे इधर 'खिचड़ी' कहते हैं इसे। आज सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश कर जायेंगे, सब अच्छा होगा अब

सब अच्छा होना चाहिए... मेरे पास शब्दों में देने लायक ही उम्मीद है कि अपने दुर्भाग्य के बारे में कभी निरीहता से मत देखो, क्योंकि तुम्हारे दुर्भाग्य के लिए थोड़े-थोड़े से सभी ज़िम्मेदार हैं।

चलो अब ख़त्म करता हूँ, ख़ुश रहो और मुझे थोड़ा-थोड़ा भूलती रहो

चाय ठंडी हो रही है। प्लूटो को भी चाय पीनी है मगर उसे देता नहीं हूँ तबतक जबतक कि उसकी इंतज़ार और व्याकुलता से भरी आँखों को देखकर मुझे किसी कविता-कहानी के लिए कोई कच्चा माल न मिल जाए। आज दिल्ली में घना कुहरा है, आज मुझे बहुत कुछ पढ़ना भी है, बहुत सारी फ़िल्में भी देखनी है :)


:)

5 जनवरी 2026

चार जनवरी

 
              

                                     
               

                   
               

                     
               

                     
               

                   
               

                     
               

                                           
                


                   
               


चार जनवरी

मेरी उपस्थिति से
ऊबने वाली चीज़ों के पास विकल्प का अभाव
मुझे गुमान में रखती है कि मैं अच्छा कर रहा हूं- 
फ़िल्में देखता हूं
रोटी बना लेता हूं
पढ़ता हूं
जूते ढीले बांधता हूं
धूप में बैठकर मां के बारे में सोचता हूं
समय से सोकर, समय से उठता हूं
बोलने के क्रम में 
सोचने तक की सब्र से ख़ुद को भरना चाहता हूं
क्योंकि
फूलों और लोगों की भीड़ से लदी
घूम रही है अब भी धरती।
दुनिया की नज़र में आई मेरी
तमाम अच्छाइयों के बावजूद
मैं जी गया एक साल और
और मेरे प्रतीक्षा न करने पर भी
आने वाले कई और साल
जीता जाऊंगा ऐसे ही.. 
जैसे ठिठुरन के दिनों में चार जनवरी आ जाता है
जैसे फूल खिलते हैं,
जैसे दुनिया भर की माएं दुःख छिपाती हैं
जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती है, 
और उनकी अच्छाइयां भी उनके बुराइयों के आसमान तले..

🙂

1 जनवरी 2026

जूते अच्छे हैं.



                

साल की शुरुआत कारू की खातिरदारी से हुई। कल रात रोते हुए मेन गेट तक आ गया था। तो कल रात और आज दिनभर इसे अपने पास ही रख लिया। दिनभर धूप में छत पर मेरे आगे-पीछे करता रहा और शाम को जैसे ही इसको मेन गेट खुला दिखा, फटाक से अपने भाई बहनों के पास चला गया। ख़ुद ही आया था, ख़ुद ही लौट गया। यही होना चाहिए। चीज़ें, लोग, शऊर ये सब जबरदस्ती आए तो टिकती नहीं हैं। कारू को पेट भर खाना ज़रूर मिला पर सुकून तो उसे अपने भाई-बहन के साथ ही आएगा न। 

               


2026
 आ गया। साल ऐसे ही आते और बीत जाते हैं। जैसे हमें सूरज निकलते और डूबते दिखाई देता है। समय क्या है ? जावेद अख़्तर साब की एक नज़्म हैं- वक़्त क्या है ?

ये वक़्त क्या है
ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है

ये वक़्त क्या है ?

उनकी ही आवाज़ में पूरी नज़्म सुनिए


              

आसमान के एक तरफ़ से सूरज डूब रहा था और दूसरी ओर से चांद निकल गया था। इस हद तक समय की पाबंदी से बंधने के लिए हम इंसानों से क्या गिरवी रखा जा सकता है ? मालूम क्या ?

                        
               


आज इधर 12-15 दिनों के बाद सूर्यदेव के दर्शन हुए हैं। आज सबकी छतों पर कपड़े ही कपड़े दिख रहे थे। अब शायद मौसम साफ हो जाए और ठंड कम। शाम को सोचा कि कहीं तो घूम आया जाए। नए जूते लिये हैं तो आज ही पहन के देखा जाए। तो बाइक उठाया और गांधी मैदान चला गया। नए साल के पहले दिन को यादगार बनाने के लिए भीड़ जमा थी। बच्चे, मर्द, औरतें, लड़के-लड़कियां, रोज़ दौड़ने वाले, क्रिकेट खेलने वाले.. और छोटे-मोटे दुकानदार सब। मैं निपट अकेला, इस पार से उस पार इधर-उधर देखते हुए, चलते हुए गया और वापस आ गया। और लाख टके की ज्ञान से रूबरू हुआ कि "जूते अच्छे हैं, कंफर्टेबल हैं, हल्के हैं और ऐसे ही होने चाहिए।"

              


वापसी में शहर (मरीन ड्राइव) होते हुए लौटा। सोचा कुछ खा भी लेता हूं। पहली बार पापड़ी चाट खाया। अच्छा था। और मीठे में मालपुआ। दुकानदार को पैसे दिए और सलाह भी कि मालपूए गरम करके रखो भई।

               


तो शायद पहली बार, नए साल की शुरुआत अकेले रहते हुए हुई है। मम्मी-पापा गांव, भाई-बहन सब दिल्ली-मुम्बई. हां, आज बड़ी दीदी का भूटान से इंस्टाग्राम पर वीडियो कॉल आया था।

अभी शाम को रवि (बनारस वाला) ने काशीनाथ बाबा वाला एक वीडियो भेजा। उसमें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साब कबीर का एक गाना गा रहे हैं और क्या ही शानदार सुर-ताल में गा रहे हैं। मन शांत और ख़ुश हो गया एकदम से। 


नए साल पर रेजोल्यूशन लेने का चलन है। हालांकि कुछ भी करने के लिए नए साल का इंतज़ार क्यों करना। फिर भी..इस साल किताबों को और ज़्यादा वक़्त देना है, सेलफोन को कम। सुनना ज़्यादा है, बोलना कम, गुस्से पर तो हद कंट्रोल करना होगा।

अगले छह महीने में इन 13 किताबों को पढ़ जाना है। देखते हैं, हो पाता है या नहीं

                

..तो शुरू किया जाए

                 


🙂