रेनर मारिया रिल्के लिखते हैं जब कि
"अपने हृदय की हर उस बात के प्रति धैर्य रखें जो अभी अनसुलझी है। उन अनकहे सवालों से ही प्रेम करने की कोशिश करें, ठीक वैसे ही जैसे वे कोई 'बंद कमरे' हों या किसी 'विदेशी भाषा' में लिखी गई रहस्यमयी किताबें।
अभी जवाबों की तलाश न करें। वे आपको अभी मिल भी नहीं सकते, क्योंकि अभी आप उन्हें 'जी' नहीं पाएंगे। और असल बात तो सब कुछ जीने की ही है।इस वक्त, आप बस उन सवालों को जीएं। शायद भविष्य के किसी अनजाने दिन, आपको पता भी न चले और आप धीरे-धीरे खुद को उन जवाबों के भीतर सांस लेते हुए पाएंगे।"
तो रेनर मारिया रिल्के (1875–1926) केवल एक कवि नहीं, बल्कि आधुनिक साहित्य के सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे। इनकी माँ ने अपनी एक बेटी को खो दिया था। उस दुख में उन्होंने रिल्के के बचपन के शुरुआती पांच वर्षों तक उन्हें एक लड़की की तरह पाला। उन्हें लड़कियों के कपड़े पहनाए जाते थे।
रिल्के का मानना था कि सच्ची रचनात्मकता केवल 'एकांत' (Solitude) में ही जन्म ले सकती है। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अकेले यात्रा करते हुए या मित्रों के महलों और किलों में रहकर बिताया।
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ज्ञान केवल शब्दों में नहीं होता, कुछ सच्चाइयाँ केवल अनुभव के माध्यम से ही समझ आती हैं। नहीं ? हमारे आपके मानने से क्या होता है ? मेरे मानने से लेकिन सबकुछ होता है। मेरी दुनिया में मेरा सबकुछ है, मेरे ईश्वर भी।
नवम्बर 2020 में लिखी हुई मेरी एक कविता जैसा कुछ मिला ट्विटर पर.. पढ़ना चाहेंगे.. नहीं ? Hehe.. नहीं पढ़ने का ऑप्शन है आपके पास ?
कविता में 'कविता' उतनी ही रहे
उदास लड़की में खिलखिलाने की संभावना उतनी ही रहे
जीवन से मायूसी उतनी ही दूर रहे
सिरहाने से किसी पसंदीदा किताब की वफ़ा उतनी ही रहे
ख़रगोश में बिल्ली से और बिल्ली में कुत्ते से बच जाने की हुनर उतनी ही रहे..
..जितनी कि सर्दियों की चाय में अदरक रहती है।
फिजिकल मैप में नीले रंग की ज़रूरत
रसोई में खिड़की की ज़रूरत
गर्मी में शाम और सर्दी में दोपहर की ज़रूरत
उदास तन्हा खाली आसमान में चाँद की ज़रूरत
दिल्ली में चाँदनी चौक की ज़रूरत
अफ़्रीका में टिम्बकटू की ज़रूरत..
...जितने ज़रूरी मसले ही जीवन की आपाधापी में खो जाते हैं!
दो लड़कियाँ झाँकती हैं परदे के किनारे से
सड़क के उस पार जाते नौजवान लड़के को जैसे
जैसे मंदिर के जलते दिए की लौ देखते हुए
बच्चे की कान में मस्जिद से उठती अजान की आवाज समा जाती है
जैसे माँ में बची रहती है 'माँ', चाहूँगा मैं भी
कि तुम्हारी हँसी में भी उतना ही 'तुम्हारापन' बचा रहे
एक लड़की जब मिली मुझसे तो वो लड़ रही थी अपने स्वप्नों के लिए
जबकि 29 साल की उम्र में लड़कियाँ क्या करती हैं किसे नहीं पता ?
तब जाना मैंने कि दुनिया में कुछ चीज़ें बहुत पवित्र होती हैं
मसलन नदियों का बहना, फूलों का खिलना, हवा का चलना
चाय का कप में जा टिकना और स्वप्न के लिए लड़ना.
पिता जब मुझे टाफियाँ देते थे और बहुत सोचकर कुछ पैसे भी
तब माँ ओझल होकर देख रही होती थीं
पिता की आँख में उमड़ आए संकोच भरे प्यार को.
"तुमने ही बिगाड़ा है इसे" की जब उलाहना देते हुए
पिता, पृथ्वी रूपी माँ के लिए गर्मी के सूरज जैसा बनें तब
मुझे स्वाद मिला उन टाफियों के
हम्ममम...
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तो
रेनर मारिया रिल्के हैरानी की बात यह है कि दुनिया को जीवन जीने का तरीका सिखाने वाले का अपना कोई स्थायी घर नहीं था। वे पूरी ज़िंदगी एक बंजारे की तरह रहे। वे यूरोप के अलग-अलग शहरों-पेरिस, म्यूनिख, वेनिस और स्विट्जरलैंड के किलों में अतिथि बनकर रहे।
रिल्के की मृत्यु की कहानी भी उनकी कविताओं जैसी ही अजीब और दुखद है। कहा जाता है कि एक बार एक महिला मित्र के लिए गुलाब चुनते समय उनके हाथ में एक काँटा चुभ गया। उस मामूली घाव से उन्हें संक्रमण हो गया, जो बाद में 'ल्यूकेमिया' के रूप में सामने आया और उनकी मृत्यु का कारण बना। उनके चाहने वाले कहते हैं कि रिल्के को उनके पसंदीदा फूल 'गुलाब' ने ही ले लिया।
अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने ख़ुद अपनी समाधि के लिए ये पंक्तियाँ लिखी थीं, जो आज भी उनकी कब्र पर पर लिखी हुई है-
Rose, oh reiner Widerspruch, Lust, Niemandes Schlaf zu sein unter so viel Lidern.
(गुलाब, ओ शुद्ध अंतर्विरोध, इतनी सारी पलकों के नीचे किसी की नींद न होने का आनंद।)
हम्ममम....
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गर्मी आ गई है तो मेरा ज़्यादातर महीने गंजा रहना तय है। कुछ दिन पहले ही गंजा होने का सोचा था, किसी ने मना किया तो मान गया.. फिर भी मन में था कि नहीं नहीं Mantuuu गंजा हो जा.. कोई और क्या कह रहा इससे तुझे क्या मतलब ?
कल बाल कटवाने गया तब तक डिसाइड नहीं था कि गंजा होना है या बाल कटवाना है.
कुर्सी पर बैठे बैठे कानों तक टीवी पर चल रही फ़िल्म की आवाज़ आई, अल्लू अर्जुन-पूजा हेगड़े की कोई फ़िल्म चल रही थी, पिता बोलता है कि कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते आप कितना भी सजा के रखो उसे, एकदिन आयेगा जब उसे खाली करना होगा.
तो मैंने सोचा कि Mantuuuye गंजा मत हो.. ऐसे ही दौड़ दौड़ के इतना पतला कर लिया है ख़ुद को कि दिन भर में 2-3 लोग टोक दे रहे कि तबियत ख़राब हो गई थी क्या। गंजे सिर में तू 15 से भी कम का लगेगा..मत हो और बारिश हुई है ठंड बढ़ी है.. सर पर फसल रहने दे.. ये सब ख़ुद को मनाया जा रहा था कि गंजा होना या ना होना तेरा ही फैसला है किसी के कहने से तू रुक नहीं गया है 🫣
मेरे लिए दुनिया का सबसे वाहियात काम बाल कटवाना है और
मेरे मन का न होने पर किसी और कहा मानना
पर इस बार मेरा ही मन हुआ कि गंजा होना टाल मंटू..
अब क्या पता मेरा मन हुआ या मेरा मन बनाया गया.. जो भी.
तो रेनर मारिया रिल्के साब ये बताओ कि
शुरू के 5 साल लड़की बन के बिताए इसका असर तुम्हारे बाकी के 46 साल के जीवन पर कितना पड़ा ? कैसे पड़ा ? क्यों पड़ा ? पड़ा या तुमने पड़ने दिया ?
इसका जवाब शायद न मिले पर इनके कब्र पर जाना होगा एक बार..
वही वही वही... कहां ? स्विट्जरलैंड के वैलिस कैंटन में स्थित रारोन नामक एक छोटे से गांव में जाना होगा Mantuuu. Ok. चले जाएंगे, कोई बड़ी बात नहीं है ये.
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🙂.
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