हाँ, तो मोतिहारी थे तो धुरंधर का पहला पार्ट देखने गए थे सैफ़ भाई के साथ। और अच्छा अनुभव रहा था. सैफ़ भाई के साथ देखने चले तो गए फ़िल्म पर जब फिल्म का थीम ध्यान आया तो मेरे अंदर का पूर्वाग्रही मन जाग गया, सोचने लगा कि यार सैफ भाई को साथ में लेके कम से कम ये फिल्म देखने नहीं जाना था.. ख़ैर गए हम दोनों और सैफ़ को फ़िल्म अच्छी लगी, कुछेक जगह जहां सरकार के फैसलों को सही बताया गया है उन्हें छोड़कर. पाकिस्तान वाले मुद्दे पर सैफ़ का कुछ भी कमेंट नहीं आया क्योंकि शायद ऐसा कुछ पाकिस्तान या इस्लाम को लेके उल्टा सीधा टॉपिक कमेंट के लिए फ़िल्म में था भी नहीं. और मैंने सैफ़ को कह भी दिया था कि भाई सच जो है वो है, उससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए.
खैर..
ख़ासकर इतनी लंबी फ़िल्म पहला पार्ट (3 घंटे 34 मिनट) होने के बावजूद दूसरे हाफ में बोर न होना फ़िल्म की काबिलियत बताती है क्योंकि लंबी फ़िल्म में सेकंड हाफ ही मायने रखता है। ख़ैर, फ़िल्म ने क्या जादू किया ये अलग से बताने की ज़रूरत नहीं.
और अब आज, धुरंधर 2.
और इसका दूसरा पार्ट जो 3 घंटे 49 मिनट की है और अच्छी है क्योंकि क्योंकि क्योंकि.. जाओ ख़ुद देखो और जान जाओ..
सुबह दीप्तांशु भईया का ट्वीट आया कि
"धुरंधर-2 देखनी थी, पर वक़्त से चार घंटे कैसे चुराया जाए?"
मैंने कहा
"वही वही.. ट्विटर के लिए मेरे पास 12 घंटे हैं 🫣
पर धुरंधर 2 के लिए टाइम नहीं निकाल पा रहा."
भईया कहते हैं- "Shiddat lao..ho jayega"
तो शिद्दत लाया गया और आज ही देख लेने का सोचा गया,
शिद्दत फ़िल्म भी अच्छी है, मंटू शिद्दत फ़िल्म की बात यहां नहीं करनी है.. ओके ओके.
सबसे पहले इस पूरे सिनेरियो के कर्ता धर्ता आदित्य धर की बात करते हैं. यह कहानी है उस लड़के की, जिसका जुनून क्रिकेट (बॉलिंग) था।
1983 में दिल्ली में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे आदित्य धर और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय में काम करती थीं।
क्रिकेट के लिए दीवाने आदित्य धर को जब अंडर 19 क्रिकेट वर्ल्ड कप के लिए टीम में नहीं चुना गया तब इन्होंने फ़िल्म लाइन में जाना चुना. और देख लो सफ़र अब..
"काबुल एक्सप्रेस" फ़िल्म 2006, वही जॉन अब्राहम वाली, के गाने पता है किसने लिखे हैं ? आदित्य धर ही. इनकी पहली शॉर्ट फिल्म "बूंद" जिसके स्क्रिप्ट और डायलॉग धर साब लिखे, को राष्ट्रीय अवार्ड मिला।
प्रियदर्शन निर्देशित अजय देवगन-अक्षय खन्ना की फिल्म 'आक्रोश' (2010) के डायलॉग भी आदित्य धर ने लिखे।
प्रियदर्शन कहते हैं, "भाषा पर आदित्य की पकड़ शानदार थी और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी."
और फ़िल्म के डायलॉग सुनिए तो आप प्रियदर्शन की बात से 100% एग्री करेंगे.
अब सबसे बड़े ट्विस्ट पर आते हैं जहां से आदित्य धर की लाइफ 180° शिफ्ट हो गई.
करन जौहर की कोई फ़िल्म डायरेक्ट करने वाले थे आदित्य, उसमें हीरो होना था फ़वाद ख़ान को.. फ़िल्म शुरू होने से पहले उरी की घटना हो गई और फ़िल्म हमेशा के लिए बंद हो गई.. यही से उरी फ़िल्म के लिए आदित्य धर दिलोजान से जुट गए.. और देखिए उरी फ़िल्म का कमाल. अगर उरी फ़िल्म नहीं देखे हैं तो देखिए भई..
फ़िर आर्टिकल 370, बारामूला को आदित्य धर ने ही लिखा है
और और और अब धुरंधर 🫡
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फ़िल्म अच्छी है..थिएटर में जाके अनुभव कीजिए. पहला पार्ट नेटफ्लिक्स पर आ ही गया है तो न देखने वाले पहला पार्ट देख लीजिए.. और दूसरे पार्ट के लिए पहले तो समय निकालिए इसके लिए.. थिएटर में ही देखिए.
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अब उस मुद्दे पर आते हैं जो इस फिल्म को लेकर या आदित्य धर के लिए उछाला जाता है कि प्रोपेगेंडा फैलाते हैं.. सरकार का पक्ष, सिनेमाई लिबर्टी के साथ कुछ मुद्दों को बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं।
आदित्य धर इसको लेकर कहते हैं -
"जो लोग इसे प्रोपेगेंडा कहते हैं, उनकी मुझे कोई परवाह नहीं. सच कहूं तो मुझे वास्तव में उनकी चिंता नहीं है. क्योंकि असली बात यह है कि मैं जानता हूं यह कहां से आ रहा है, और भारतीय दर्शक बहुत ही समझदार हैं. जब वे फ़िल्म देखते हैं, उन्हें आसानी से समझ में आ जाता है कि कौन सी फ़िल्म प्रोपेगेंडा है और कौन सी फ़िल्म की नीयत सही है. और मेरी फ़िल्म के साथ, जब तक मैं निर्माता या निर्देशक रहूंगा, उसकी नीयत इरादा हमेशा सही रहेगा. जिस दिन मेरी नीयत ठीक नहीं होगी मैं फ़िल्में बनाना बंद कर दूंगा."
बाकी मुझे भी ये लगता है कि ये आरोप बहुत हद तक निराधार है। अमेरिका और ब्रिटेन वाले दशकों से अपने देश के जासूसों की कहानी दिखाते चले आ रहे हैं उनके लिए तो कभी किसी ने नहीं कहा होगा कि ये सरकार का पक्ष दिखा रहे या प्रोपेगेंडा फैला रहे.
छोटे भाई (आदित्य राज), दिल्ली विश्वविद्यालय से PhD कर रहा, उसके रिसर्च का टॉपिक है - हिन्दी सिनेमा में ऐतिहासिक चरित्रों के चित्रांकन में निर्देशकीय सृजनात्मकता.
...तो सिनेमा पूरी तरह से निर्देशक का माध्यम है, इसे ऐसे समझिए कि जिस तरह मां शुरू से अपने बच्चे को पाल पोसकर उसे बड़ा करती है वैसा है एक निर्देशक भी अपनी फ़िल्मों के साथ बर्ताव करता है। उसे इतनी छूट मिलनी चाहिए कि वो जो चाह रहा है उसे वो पर्दे पर बेहिचक दिखा सके.. और इस प्रोसेस में हम दर्शक को इतना भरोसा करना होगा कि वो निर्देशक भी इंसान है, उसके अंदर भी इंसानियत है. नहीं है ऐसा ?
26 मार्च 2026. ❣️.
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कल, 6 दिसंबर 2020 को ट्विटर पर मेरा लिखा एक थ्रेड मिला..आज कल रामनवमी भी है तो कृपया पढ़ा जाए इसे -
"ये सबसे बड़ी दिक्कत है। ख़ासकर नार्थ इंडिया में जिस किसी को पनीर की सब्जी खाने को भी न मिलता हो पर वो एंड्रॉइड फोन और 1.5gb लेकर घूम रहा। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का कोर मेम्बरशिप लेकर घूम रहा है। जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके वो जान सकता था कि उसके और उसके बच्चे के लिए दाल खाना कितना ज़रूरी हो सकता है वो बन्दा उसी एंड्रॉयड फ़ोन से ये जानता है कि किसके फ्रिज में किसका माँस रखा है। किसने किधर लव जिहाद किया है और मथुरा के किस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। और हर दरगाह में शिव मंदिर होता ही है, जिसे इन ख़ास तबकों ने नेस्तनाबूद कर दिया है.
इनका सनातन धर्म संकट में आ गया है और ये दो कौड़ी के लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए अब हथियार उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे लोग हमारे बीच में ही हैं। मैं अपनी कहता हूँ मेरे नाना जी और दोनों मामा जी सेम ऐसे ही हो गए हैं 2014 के बाद से। मेरे पापा हो सकते थे पर मैंने और छोटे भाई ने उनके उठते हर एक ऐसे विचार को तर्क के साथ खारिज़ किया है। ऐसे लोग ग़लत नहीं हैं, ग़लत कुछ लोग हैं जो इन्हें ग़ुमराह कर रहे कि भाई जय श्री राम नहीं बोला तो रातों को नींद नहीं आएगी और वो सामने वाला नादान जय श्री राम बोलने लगता है जबकि उसको दाल खाना चाहिए, उसके बच्चे की संगति कैसी है ये देखनी चाहिए।
जय श्री राम बोलना ग़लत नहीं है। मेरी सुबह की शुरुआत श्री राम के भजन से ही होती है। राम मेरे जीवन में उतने तक ही हैं जितने से मेरे अंदर का रावण डरा रहे। धर्म नितांत, ख़ुद के बेडरूम के जैसे व्यक्तिगत मामला है। मेरा बेटा कल को इस्लाम/ईसाई क़बूल कर लेगा तो एक पिता के नाते मुझे शिकायत होगी मगर एक नागरिक की हैसियत से मुझे उसके विचार और धार्मिक झुकाव की इज़्ज़त करनी चाहिए।
धर्म को अपने घर तक ही रखिए और ये भरोसा रखिए कि आपका धर्म इत्ता कमज़ोर नहीं कि कोई आकर उसे दबा देगा या उसकी जड़ें हिला देगा। सबसे ज़रूरी बात कि ऐसे धार्मिक अँधे लोग जो हमारे आस पास थोक मात्रा में कुकुरमुत्ते माफ़िक़ उग आए हैं। इनको बिल्कुल साइड कीजिए अपने जीवन से.. धार्मिक विश्वास और धार्मिक अंधता में इन गदहों को ज़रा सा भी फ़र्क़ नहीं मालूम। यही ट्विटर पर पल रहे ढेर सारे, कितने तो पढ़ेंगे इसे और मन में दलील देंगे कि मन्टू पागल फ़िर शुरू है। इस टाइप के लोगों का इलाज बहुत ही आसान है। बस सब्र करना होगा। इन सब नमूनों के जो बच्चे होंगे या जो बच्चे इनके बड़े हो रहे हैं वो सब भी जवान होके इन्हीं के बताए नक्शेकदम पर चलेंगे तब बुढ़ापे में इन नमूनों को एहसास होगा कि जय श्री राम से ज़्यादा दाल खिलाना ज़रूरी था।
धर्म को बढ़ावा देना, उपासना करना क़तई ग़लत नहीं है पर किसी दूसरे धर्म की कमियाँ गिनाकर.. दूसरे धर्म से अंतर करके आप अपने मन में अपने धर्म के लिए जो इमारत खड़ी कर रहे हैं उसको लुढ़कने में 2 sec भी नहीं लगने.. बाकी तो समझदार पूरी दुनिया है ही.. है कि नहीं ?"
इसी थ्रेड के नीचे तब की एक मुस्लिम लड़की दोस्त का रिप्लाई आया हुआ है- अगर ऐसी पोस्ट हम लिखेंगे तो कमेंट आएगा "तुम्हें कोई दिक्कत है तो निकल जाओ पाकिस्तान"
तो तो तो...
इसका फ़िल्म से कुछ लेना देना है क्या Mantuuu? हां.. फ़िल्म में एक जगह रणवीर की पत्नी को पता चल जाता कि हम्ज़ा(रणवीर) हिंदुस्तानी है तब वह अपनी पत्नी से कहता है कि हमें तुम्हारे मुल्क से कोई दुश्मनी नहीं है हमें दिक्कत है इसमें रहने वाले दहशतगर्दों से.. जो भारत को नहीं देखना चाहते.
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रणवीर की एक्टिंग 🖤
जमील वाला ट्विस्ट 🤝
अर्जुन रामपाल का पिता, जहांगीर 😆
फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ✨
बैकग्राउंड म्यूजिक 💯
पुराने गाने को नए अंदाज में 🌻
और सबसे बढ़कर आदित्य धर 🫡
[मंटू, धर साब की इतनी तारीफ़ मत कर, अभी वो रिटायर नहीं हुए हैं, आगे जाके अभी उनके भी कुछ ग़लत कर देने की गुंजाइश है]
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तो अब अपनी बात कर लूं ? तो ऊपर किसकी बात कर रहा था बे ?
Ok.
ख़ैर.. दीप्तांशु भईया की बात से ही इस पोस्ट को ख़त्म किया जाए.
आज दीप्तांशु भईया ट्विटर पर लिखे भी कि
मरना तो इस जहां में कोई हादसा नहीं,
इस दौर-ए-नागवार में जीना कमाल है! ~ ग़ुलाम हसन.
तो वही.. मर जाना कोई बड़ी बात नहीं है Mantuuu..
मरने से पहले ऐसे ही जीते रहो.. तब बात बने... अभी दोपहर तक आए हो जीवन में, शाम तक ध्यान रखना, घर लौट भी जाना है. बिना जाने कि अगले ही दिन क्या होने वाला है जो भी आए, जो भी न आए... उसको भरपूर जियो.. क्योंकि असल बात जीने की ही है. असल बात जीवन जीने की है.
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