नोट :
पिछले दिनों गूगल फोटोज के किसी अनजाने बेनाम गुम फ़ोल्डर में ये डिजिटल डायरी मिली जो अगस्त सितंबर 2020 की है. पहले लॉकडाउन में जब ख़तौली (मुज़फ्फरनगर, मेरठ) में फंसे थे और वापस सही सलामत बच के गांव लौटे थे तब की.
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24 अगस्त 2020, 22:04 :)
नेटफ्लिक्स पर "ज़िन्दगी गुलज़ार है" पाकिस्तानी सीरीज़ शुरू किया है...अच्छी लग रही है. उसमें लड़का डिजिटल डायरी मेंटेन करता है और लड़की हाथ से डायरी लिखती है. मैं भी हाथ से डायरी लिखता हूँ पर इसमें देख के लगा कि डिजिटल कोशिश भी करते हैं. तो आज से शुरू किया है. :)
4-5 दिन से फुटबॉल खेलने जा रहे हैं पैर के अँगूठे पर चोट लगी है और ये भी ध्यान आया है कि फुटबॉल खेलने से पहले नाखून काट लेने चाहिए. ख़ुद के भी नाखून काट लेने चाहिए, दूसरों के कटवा देने चाहिए 😂
आज माँ ने खेलने जाने से मना किया था कि रेस्ट करो. अँगूठे को आराम दो, मैंने कह दिया ठीक, आज नहीं खेलूँगा. घर से सोच के निकला कि नहर की तरफ़ चला जाऊँगा पर जब गया तो पैर अपने आप ग्राउंड की तरफ़ घूम गएँ. खेल लिया पर सावधानी से. 2 गोल हुए हमारी टीम की तरफ़ से, दोनों मैंने ही किएँ. पास सही मिल जाये तो गोल करना कोई बड़ी बात नहीं ख़ासकर यहाँ गाँव के खिलाडियों के बीच जिनमें ज़्यादातरों के लिए फुटबॉल का बस इतना मतलब है कि पैर से बॉल लगना चाहिए भले रोता हुआ फुटबॉल कहीं जाए।
माँ जानती है कि मुझे पानी की ज़रूरत कब होती है कब कोई फल खाने की और कब चाय की ज़रूरत होती है. बिना माँगे-बोले टेबल पर रख जाती हैं. माँ को यकीन रहता है कि मैं लैपटॉप या मोबाइल पर या किताबों के साथ कुछ काम का ही कर रहा होऊँगा पर पापा को 5 ग्राम कम यकीन होता है, कमरे में आकर समझाते हैं कि चलने वाली मशीन को भी आराम दिया जाता है. इतना कहकर वो चले जाते हैं. मैं माँ की तरफ़ देखता हूँ माँ मेरी तरफ़.
दिल्ली के मेरे अच्छे दिनों की एक दोस्त से आज कॉल पर बात हुई. उन्होंने कहा कि वो जितनी देर तक दोपहर का खाना खायेंगी उतनी देर तक ही बात करेंगी मेरे से, मैंने हामी भर दी और सोचा कि 10-15 मिनट बात होगी पर मुझे इसका कोई आईडिया नहीं था कि वो मोहतरमा 1 घंटे 14 मिनट तक अपने खाने को खींच के ले जायेंगी. 😂
दिल्ली जाने का हो रहा है सितंबर के दूसरे सप्ताह तक. किराए कमरे को भी देख आना ज़रूरी है. रुकना तो गाज़ियाबाद उत्कर्ष के ही है. एग्जाम दे दूँ फिर सोचना होगा कि दिल्ली में रुकना ठीक रहेगा या गाँव ही वापस लौट आऊँ- माँ के पास, माँ के यकीन के पास, फुटबॉल के पास, नहर के पास, पोखर के पास, धान से पटे पड़े हरे खेतों के पास, गाँव के चाँद-सूरज, बादलों, पीपल के पास, उस कमरे के टेबल के पास जहाँ मेरे पिछले 3 महीने करीने से दर्ज़ हुए हैं. पर ये सब दिल्ली जाके ही पता चलेगा...दिल्ली जा के ही :)
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26 अगस्त 2020, 22:19 :)
गाँव-समाज के लोगों से जुड़ना कितना ज़रूरी होता है, अब समझ आ रहा है. शुरू से ही गाँव में रहना नहीं हुआ. गिनती के लोगों से जान-पहचान वो भी केवल "कैसे हो, ठीक हूँ" तक सीमित. पर अब लम्बे अरसे तक रहते हुए बहाना कहिए इसे या नियति कि गाँव के लोगों से जुड़ने का, उन्हें जानने का, अपनी मंशा बताने का अवसर लॉकडाउन की वजह से मिला.
आज अंजना मैम ने ट्विटर पर अमृता प्रीतम का एक ख़त शेयर किया जो इमरोज़ के नाम से 1960 में अमृता प्रीतम ने लिखा था। मेरे पास अमृता प्रीतम और इमरोज़ के 'ख़तों का सफ़रनामा' किताब है जिसमें उनके बीच लिखे ख़तों का संग्रह है। मैंने उस ख़त की फ़ोटो लेकर ट्विटर पर मैम के ट्वीट के साथ शेयर किया। मैम ख़ुश हुईं और किताब का नाम पूछा, मैंने किताब का नाम बताया और कहा कि ये किताब आपको मैं गिफ़्ट कर सकता हूँ। मैम कहती हैं ये तो बढ़िया होगा. तो इनके जन्मदिन के पहले ये किताब उन्हें भेज दूँगा :)
फ़िर हमारी कॉल पर भी बात हुई। मैम का पहला सवाल ही यही था कॉल पर कि तुम तो बहुत छोटे लगते हो, उम्र बताओ अपनी ? मैंने कहा छोटा ही हूँ लगता भी हूँ। 20 का लगता हूँ पर हूँ 26 साल का। मैम कहती हैं अभी तो बहुत छोटे हो। फ़िर किताब को लेकर बातें हुईं। किन-किन को मैंने पढ़ा है ? कौन-कौन सी किताबें हैं मेरे पास ? नए में कौन अच्छा लिखता है ? मैम अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कम शब्दों में ही बताने की कोशिश कीं और मैंने समझने की। अपने बारे में बताया, उनका जाना। और फ़िर मैम ही तय की कि जो किताबें उनके पास हैं वो मुझे भेज देंगी और जो मेरे पास हैं वो मैं उन्हें भेज दिया करूँगा और इस तरह किताबें शेयर होंगी हमारे बीच 🏃
मैम, जयपुर की है। मोतिहारी से कभी मुझे भगा दिया गया तो मैं भाग के जयपुर या अजमेर ही जाऊँगा। प्री देने के बाद जयपुर जाना ही था, अब जल्दी से जयपुर जाना है, अक्टूबर में ही :)
मंटो का लिखा हमें आईना तो दिखाता ही है रास्ते भी बतलाता है कि इधर चले जाओ या उधर मत जाओ, बाकी जाने वाले की मर्जी है.
'दो गढ़े' नामक निबंध में मंटो फ़रमाते है-
"मैं कुछ भी हूँ, बहरहाल मुझे इतना यक़ीन है कि मैं इंसान हूँ- इसका सबूत यह है कि मुझमें बुराइयाँ भी हैं और अच्छाइयाँ भी। मैं सच बोलता हूँ, लेकिन बाज़ औक़ात झूठ भी बोलता हूँ। नमाज़ नहीं पढ़ता, लेकिन सज्दे मैंने कई दफ़ा किए हैं।"
'ज़िन्दगी गुलज़ार है' के पांचवें एपिसोड में पति से अलग थलग-पड़ चुकी तीन होनहार बेटियों की माँ अपनी बड़ी बेटी से कहती हैं- "नाउम्मीदी गुनाह है।"
फुटबॉल के ग्राउंड में ही किसी लड़के का ये लव लेटर मिला था, फटा हुआ. ये किताब जिसे भेजी है उसके पास ये लेटर चला गया 🥲
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28 अगस्त 2020, 22:02 :)
आज से 14000 साल पहले तक अमेरिकी महाद्वीप में लम्बे घुमावदार दाँतों वाली बिल्लियाँ धरती पर 300 लाख सालों तक वजूद में रहकर विलुप्त हो गईं और न जाने ऐसे ही कितने ही जीव जंतु और प्रजातियाँ। हम मनुष्य इनपर गहरे शोध करके इतिहास की किताबों में इन बातों को दर्ज करके इनके बारे में पढ़ते हैं किसी को बताते हैं या ऐसे ही डायरी में दर्ज़ करते हैं। ये तय है कि हम मनुष्य भी जब कुछ हज़ार साल ही यहाँ रहकर विलुप्त हो जाएँगे तो कोई और किसी अलग दुनिया में, अलग टाइम ज़ोन में, हम सबका किसी न किसी तरीक़े से कहीं ज़िक्र कर रहा होगा।
आज ट्विटर पर पढ़ा- "In 1704, Sir Isaac Newton predicted the world would end in 2060." न्यूटन ने किस आधार पर कहा होगा ? ऐसे तो नहीं ही कह दिया होगा, अब जो भी हो। पता है, हम मनुष्य सबसे ज्यादा सुकवार हैं, सुकवार मतलब सबसे ज़्यादा असुरक्षित। पृथ्वी पर अरबों सालों के बाद अनुकूलतम परिस्थितियों का जमावड़ा होता गया तब कहीं जाके हमारा अस्तित्व सामने आया। अब आगे उन परिस्थितियों में कुछ भी बदलाव हो तो सबसे पहले हम मनुष्य विलुप्त हो जाएँगे धरती से, हो ही रहे हैं। जीवाणु ही हैं जो कि सबसे पहले आए और सबसे बाद तक टिके रहेंगे।
कल दूर के एक क़रीबी ने मैसेज किया कि उसे 'छपाक' फ़िल्म कहाँ मिलेगी? मैंने ढूँढा नहीं मिली बाद में हॉटस्टार पर दिख गयी। मैंने भी ये फ़िल्म नहीं देखी थी तो देख ली और मेघना गुलज़ार की फ़िल्म होने के नाते इसे इतने दिन तक अनदेखा रखा भी नहीं जा सकता था। हम लड़के लोग लाख कविता कहानी लिख ले, पर ये अंदाज़ा लगाना भी मुमकिन नहीं है कि इस देश की लड़कियाँ किन परिस्थितियों में जीती हुई आ रही हैं। और न जाने कितनी ही जी रही हैं उन्हीं परिस्थितियों में, नहीं लगा सकते हम लड़के लोग अंदाज़ा, हाँ, दावा कर सकते हैं कि हमें एहसास है और लिख सकते हैं एक से बढ़कर एक बेहतरीन कविता और कहानी!
माँ आज ज़्यादा काम करके थक गई थीं, तो आज रोटी बनाने की ज़िम्मेदारी मेरी। लगभग 7-8 महीने बाद बनाई होगी और मजाल कि कोई कह दे कि 7-8 महीने बाद रोटी बनाने में हाथ आज़माया। पापा तुलना करते हुए कहते हैं- "तुम तो रवि से भी बढ़िया रोटी बना लेते हो।"
आज फुटबॉल में हमारी टीम 2-1 से हार गई। मैच 2-2 से ड्रा पर ख़त्म होता पर विपक्षी टीम के गोलकीपर की चालाकी से 2-1 पर ही खेल ख़त्म हुआ।
निदा फ़ाज़ली फ़िराक़ साहब के लिए लिखते हैं- "ग़ालिब और मीर के बाद अगर कोई तीसरा नाम लिया जा सकता है, वह उर्दू शायरी में फ़िराक़ का नाम होगा।" उन्होंने वही लिखा जो भोगा और जिया और निराला के शहर इलाहाबाद के इतिहास में दर्ज़ होने से पहले कह गएँ- "आने वाली नस्लें तुम पर रश्क (गर्व) करेंगी हम अस्रो (समकालीन) जब उनको यह ख़्याल आएगा, तुमने फ़िराक़ को देखा था।"
29 अगस्त 2020 :)
बीते हुए समय का अभी के समय पर कितना ज़ोरदार ये एक तमाचा है कि अब ख़त नहीं लिखे जाते। वैसे तो आदत में शुमार है कि जब किसी से पहली दफ़ा मिलता हूँ तो उस मिलने वाले शख्स को एक किताब गिफ़्ट करता हूँ। अब से सोचा है कि ज़रूरतमंद और शौकीन लोगों को उनके कहने पर बाई पोस्ट किताबें भेज दिया करूँगा। दिल्ली जाकर इसपर अमल करता हूँ।
गुलज़ार साहब को क्यों लिखना पड़ा -
किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें...
...मगर वो जो किताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रक्के
किताबें माँगने, गिरने-उठाने के बहाने
रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा?
वो 'शायद' अब नहीं होंगे...
गुलज़ार साहब के इस 'शायद' को खारिज कर देने के मकसद से पिछले दिनों ट्विटर के एक दोस्त को सत्या व्यास की '84' और अनुराधा बेनीवाल की 'आज़ादी मेरा ब्रांड' भेजी है। अनुराधा जी इस किताब की अगली कड़ी लिख रही हैं, सोच रहा हूँ वो छपे तब तक 'आज़ादी मेरा ब्रांड' की तीसरी दफ़ा पढ़ लूँ। बाकी, अनुराधा जी से वर्ल्ड बुक फेयर-2019 में चेस में हराने का वादा किया था। देखना है कि लंदन जाके हराऊँ उन्हें या दिल्ली में... देखते हैं। :)
इस एक बात को आप बेशक मान लीजिए कि एक अच्छा फुटबॉलर गणित में कभी कमज़ोर नहीं हो सकता। मैं खुद के 10th और 12th में आए गणित के मार्क्स को देखकर खुद ही खुद को आज सर्टिफिकेट दे रहा हूँ कि "मन्टू, तू एक अच्छा फुटबॉलर है।" हाहाहा
आज 1-1 से मैच ड्रॉ हो गया, आज का खेल बढ़िया हुआ!
अगस्त बीतने को है और माँ की नज़र में भादो। सितंबर को अगस्त से भी ज़्यादा ख़ुशनुमा बनाना है। 'एक' का साथ चाहिए होगा और उसका साथ मिलेगा ही, इसका यक़ीन है मुझे और उम्मीद भी... "Sunflower" :)
कृपया धीरे चलिए...
या
चलना आहिस्ते इश्क़ नया है...
या
जीवन गुलज़ार है...
या
मेस्सी महान गणितज्ञ है...
29 अगस्त 2020, 22:10 :)
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1 सितंबर 2020, 22:33 :)
ख़ुशनुमा अगस्त बेशुमार यादें देकर बीत गया, सितंबर शुरू हो गया है, कुछ दिनों में अक्टूबर आ जाना है, फ़िर सर्दियाँ ही सर्दियाँ और चाय ही चाय फ़िर नया साल और फ़िर 2021 को भी बीत जाना है। औरों का तो पता नहीं पर मैं ऐसा सोचता हूँ जैसे कि जब 2011 में था तो सोचा कि जो सपने देखे हैं वो 2015 तक इतना क़ाबिल हो गया रहूँगा कि उन सपनों को हक़ीक़त में जी रहा होऊँ कहीं। ऐसे ही 2015 में सोचा कि 2019 तक मैं ख़ुद को कहाँ देखता हूँ, वैसे ही आज सोचा है और माँ से उसी सिलसिले में बात भी हुई कि 2022 के जून-जुलाई में मैं ख़ुद को कहाँ देख रहा हूँ। 2022 के जून-जुलाई में, देखते हैं :)
आज माँ को गुलज़ार की फ़िल्म "अँगूर" दिखाई। मेरी पसंदीदा फ़िल्म है इसलिए भी और इसलिए भी कि फ़िल्म में मुख्य किरदार निभा रहे पति-पत्नी, संजीव कुमार-मौसमी चटर्जी का नाम अशोक और सुधा है। माँ का नाम सुधा है और पापा जी का नाम अशोक। मैंने कहा- देख माँ, इसमें पत्नी का नाम सुधा है और उनके पति का नाम अशोक जैसे आपके पति का नाम अशोक है। माँ कहती हैं- "अच्छा, बउओं एक दिन तोहरो आई" मतलब एक दिन मेरी पत्नी भी आयेगी 😂😂 🙈
आज फुटबॉल में कम ही खेलने वाले पहुँचे। 7-7 खिलाड़ियों से मैच हुआ, इस वजह से ख़ूब दौड़ना पड़ गया। मैच जब 0-0 से बेनतीजा रहा तब ग्राउंड से ही फ़ोन लगा के माँ को चाय के लिए मना करके कहा कि आज चाय नहीं आज नीबू-चीनी-पानी घोल के इंतज़ार करो आँगन में। घर आके जब नीबू-चीनी-पानी पी रहा था तब माँ कहती हैं- "देखबऊ, देखबऊ के अपना मेहरारु के फ़ोन करके आर्डर देत बाड़े कि ना" मतलब देखूँगी कि पत्नी को ऐसे फ़ोन पर आर्डर देता है कि नहीं 😂
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ लिखते हैं- "एक ज़माना हुआ जब ग़ालिब ने लिखा था कि जो आँख क़तरे में दज़ला(इराक़ की एक नदी) नहीं देख सकती, दीद-ए-बीना(देखने वाली दृष्टि) नहीं बच्चों का खेल है।
एक बूँद में नदी तक देख लेने की क़ाबिलियत और उससे आगे जाके उसी बूँद में समंदर को देख लेने की भी क़ाबिलियत। ये बात लिख के समझने में आसान है, मुद्दा महसूस करने का है जैसे ग़ालिब ने किया होगा और ग़ालिब के जैसे बहुतों ने।
आज प्रबोध अंकल जी से बात हुई। जयपुर में भी आज दिनभर बादल उमड़ते रहें जैसे यहाँ गाँव में। रात को हल्की बारिश हुई थी 11-12 बजे के बीच, हल्की ही हुई थी तेज़ होती तो चाय बना लेता 😂 अंकल जी की नई का विमोचन है, दिल्ली रह रहा होता तो जाता ही। उनकी अगली किताब के कुछ पन्नों पर मैं दर्ज़ होने वाला हूँ 🏃 अंकल जी कहते हैं "जल्दी से आओ जयपुर, तुम्हारी अगली किताब छपने का रास्ता क्लियर हो।"
...देखते हैं, क्या कुछ है आगे :)
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कोरोना का भयावह समय के बावजूद
मेरा 2020 और 2021 सबसे अच्छे साल रहे अब तक के जीवन के..
ख़ूब पढ़ा, ख़ूब घूमा, मां के साथ ख़ूब समय बिताया
ख़ूब सिनेमा देखा, ख़ूब प्यार किया, ख़ूब कविता लिखा
ख़ूब खेला, ख़ूब सोया.. ख़ूब खाया.. जो मन में आया किया..
अच्छा ये पढ़ते हुए आप सोचे कि नहीं एक बार कि ये 'ख़ूब' का मतलब क्या होता है.. haha.. एक ही शब्द या काम को बार बार कहना या दोहराना या करना, उसे थोड़े देर के लिए अर्थहीन बना देता है. थोड़ी देर के लिए ही सही, हम मनुष्यों में से बहुत से अर्थहीन हो चुके हैं, मालूम क्या ?
ख़ैर
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