जीवनी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जीवनी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

मंगलवार, सितंबर 23, 2014

राष्ट्रकवि दिनकर~अपने समय का सूर्य हूँ मैं...

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की आज 106वीं जयंती हैं।



उन्हें अलविदा कहे हुए 40 साल से अधिक का वक़्त बीत चूका है मगर उनकी रचनाएं आज भी उनके 'चाहने वालों' की जुबां पर बनी हुई हैं।इनका जन्म बिहार के बेगुसराय(तत्कालीन मुंगेर)जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। यह गाँव मिथिला-भूमि का एक तीर्थ स्थल भी माना जाता है जो दो नदियों से घिरा हुआ है। गंगा नदी पर निर्मित राजेंद्र सेतु का उत्तरी किनारा सिमरिया गाँव के साथ लगता है।


रामधारी सिंह पिता बाबु राव सिंह व माता मनरूप देवी की दूसरी संतान थे। किसान परिवार से सम्बंधित दिनकर अभी एक साल के थे तब पिता जी अलविदा कह गये,माँ आर्थिक हालात से जूझते हुए बेटों को पाला और पढाया।कम उम्र में ही विवाह हुआ और इनकी हमसफ़र ने पढाई तथा साहित्य साधना में पूरा सहयोग दिया।

दिनकर कहते हैं
                     
               "मैं न तो सुख में जन्मा था,न सुख में पलकर बढ़ा हूँ किन्तु मुझे साहित्य का काम करना है और यह विश्वास मेरे भीतर छुटपन से ही पैदा हो गया था। इसलिए ग्रेजुएट होकर जब मैं परिवार में रोटी अर्जित करने में लग गया तब भी,मेरी साहित्य की साधना चलती रही"


'युवक' पत्र जिसे रामवृक्ष बेनीपुरी निकालते थे में दिनकर की रचनाएं प्रकाशित हुई 'अमिताभ' नाम से। 1928 में मैट्रिक पास की,1930 में गाँधी जी के 'नमक सत्याग्रह' में भागीदारी की किन्तु अपने पारिवारिक जीवन के दायित्वों के कारण बीए करने के लिए पढाई जारी रखनी पड़ी। बीए पास करने के बाद उन्होंने 55₹ मासिक पर एक स्कूल में हेडमास्टर की नौकरी शुरू की पर एक जमींदार द्वारा संचालित इस स्कूल में अंग्रेजीयत का बोलबाला और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के रहते उसे छोड़ 1934 में सब रजिस्ट्रार की नौकरी हासिल की और 1943 तक इस पद पर रहें। आज़ादी के बाद उन्हें प्रचार विभाग का डीप्टी-डायरेक्टर बना दिया गया। नौकरी से ऊबे हुए दिनकर ने 1950 में इस्तीफा दे दिया,इसके बाद बिहार सरकार ने मुज्जफरपुर के पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया। 1952 में इस पद को त्याग कर राज्यसभा के सदस्य बने,इसके बाद भागलपुर विश्वविद्यालय में उप कुलपति रहे।

1965 से 1971 तक भारत सरकार के हिंदी सलाहकार रहें।



1928 में 'प्रण-भंग' उनकी पहली प्रकाशित रचना मानी जाती है जो अब मौजूद नहीं है।

1959 में उन्हें पद्मभूषण मिला। उनके काव्य संग्रह 'उर्वशी' के लिए 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये।

'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।उनकी रचनाओं को कईं विदेशी भाषाओं में अनुदित होने का गौरव प्राप्त है, उनकी 'संस्कृति के चार अध्याय' को जापानी भाषा में अनुवाद किया गया है।

उनकी प्रमुख कृति है 'उर्वशी' 'रश्मिरथी' 'संस्कृति के चार अध्याय' 'चक्रव्यूह' 'हुंकार' 'आत्मजयी' 'कुरुक्षेत्र' 'वाजश्रवा' 'परशुराम की प्रतीक्षा'

"कलम आज उनकी जय बोल" "आशा का दीपक" "हिमालय" "चाँद का कुरता" "नेता" दिनकर साहब की ये पांच छंद-कविता में उनके साहित्य के पांच रंग को आसानी से देखा जा सकता है।

हरिवंश राय बच्चन ने कभी उनके लिए कहा था -

        "दिनकर जी को एक नहीं गद्य-पद्य-भाषा-हिंदी सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए"


('महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय' जो की महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित है। इस विश्वविद्यालय का अभिक्रम www.hindisamay.com ~ 'हिन्दी साहित्य सबके लिए' पर आप राष्ट्रकवि दिनकर को पढ़ सकते हैं)


'आज भी अछूता है दिनकर का गाँव'

पत्रकार सुरेश चौहान लिखते हैं ~

              
          "दिनकर का यह गाँव(सिमरिया),जहाँ दसवीं पास करने के बाद लड़के व लड़कियों को जिला मुख्यालय की ओर टकटकी लगाना पड़ता है। जहाँ प्रसव के लिए निजी अस्पतालों पर ही निर्भर होना पड़ता है। जहाँ बिजली के लिए लोगों को बरौनी थर्मल के राख से चेहरा और फेफड़ा काला होता जा रहा है। जहाँ रह-रह कर कल-कल करती गंगा उफान और दहाड़ मारती हो। जहाँ हर वक़्त किसानों की जमीन पर ईंट चिमनियों के धुएं दूर आसमान तक बाजारवाद का पोषक बन मंडरा रहे हों। ऐसी स्थिति में आज भी सिमरिया के लोगों के समक्ष यह जटिल प्रश्न है कि आखिर कैसे होगा आदर्श ग्राम सिमरिया"


दिनकर की जयंती हो या पुण्यतिथि हर बार राष्ट्रकवि के आशियाने को राष्ट्रिय स्मारक के रूप में सजाने-सँवारने के कवायद की घोषणा की जाती रही हैं और यह घोषणा विगत तीन दशक से की जा रही है। घोषणाओं का यह सिलसिला 1 नवम्बर 1986 से चल पड़ा।
      
       "तुमने दिया राष्ट्र को जीवन,राष्ट्र तुम्हें क्या देगा।
      अपनी आग तेज रखने को,नाम तुम्हारा लेगा।।

ये पंक्तियाँ दिनकर ने महात्मा गाँधी जी के लिए लिखी थी पर आज के समय में दिनकर पर ही ये पंक्तियाँ चरितार्थ हो रही है। दिनकर ने जिस समाज और राष्ट्र की कल्पना अपनी कविताओं में उकेरने की कोशिश की थी'वो वक़्त की परत में दबती जा रही है या यूँ कहें कि आज के पीढ़ी को उनकी साहित्य साधना केवल पढ़कर उन्हें याद कर उनके जन्मतिथि या पुण्यतिथि पर कोई कार्यक्रम आयोजित कर पल्ला झाड़ लेना चाहती हो !



रामधारी सिंह दिनकर ने "मंदिर और राजभवन" नाम से लगभग दो पन्नो में एक लेख लिखा है। उसके कुछ अंश ~
           
मंदिर है उपासना का स्थल, जहाँ मनुष्य अपने-आपको ढूंढ़ता है।
राजभवन है दंड-विधान का आवास, जहाँ मनुष्यों को शांत रहने का पाठ पढाया जाता है।

मंदिर कहता है,"आओं,हमारी गोद में आते समय आवरण की क्या आवश्यकता?पारस और लोहे के बीच कागज का एक टुकड़ा भी नहीं रहना चाहिए;अन्यथा लोहा ही रह जायेगा।"

और राजभवन कहता है,"हम और तुम समान नहीं हैं। हम प्रताप की पोशाक पहने हुए हैं तुम अधीनता की चादर लपेटे आओं क्योंकि हम शासक हैं और तुम शासित,हम तुम्हें गोद में नहीं बिठा सकते,अधिक से अधिक अपनी कुर्सी के पास स्थान दे सकते हैं"

मंदिर कहता है,"लोग संसार में लिप्त है,वासना के रोगों से पीड़ित हैं,हम उन्हें संसार से विरक्त करेंगे जिससे दंड विधान की जरुरत ही नहीं रह जाय।"

राजभवन कहता है,"लोग संसार में अनुरक्त है और जबतक वे अनुरक्त हैं तब तक उनपर पहरा देने के लिए एक सत्ता की जरुरत है। वह सत्ता हम हैं।"
    
    मंदिर कहता है "हम मनुष्य को सुधारेंगे"
    राजभवन कहता है "हम मनुष्यों पर शासित करेंगे"

गाँधी जी अहिंसा सिखाते-सिखाते स्वयं हिंसा के शिकार हो गये।मंदिर गिर गया और राजभवन का दंड-विधान अपनी जन्मपत्री में अपना भविष्य देख रहा है।
गाँधी जी के मृत्यु के साथ संसार की एक पुरातन समस्या,मनुष्य-जाति का एक प्राचीन प्रश्न फिर अपनी विकरालता के साथ हमारे सामने आया है"

_______________________

आज के समय में राजभवन भी जरुरी है और मंदिर भी !
2 अक्टूबर आने ही वाला है !

बलिदान एवं वीरता का राग अलापने वाले,अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध क्रांति का भीषण शंखनाद करने वाले तथा कर्तव्य एवं प्रेरणा का दिव्यलोक वितरित करने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर 24 अप्रैल 1974 को अलविदा कह गयें !
      
      "कहाँ सिमरिया घाट,कहाँ दिल्ली का दूर नगर है
      मानचित्र पर ढूंढों कविवर कहाँ तुम्हारा घर है...

बिहार की मिट्टी की सोंधी गंध में प्रस्फुटित हो-दिल्ली तक खुशबुओं को बिखरने वाले लब्ध प्रतिष्ठ कवि दिनकर अपने भव्य व्यक्तित्व,सादा जीवन एवं उच्चादर्स के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।

दिनकर ने एक जगह स्वयं के बारे में लिखा है 

"मर्त्य मानव की विजय का तुर्य हूँ मैं,उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं"

आज वहीँ सूर्य,वहीँ दिनकर,बिहार सरकार,साहित्य अकादमी और साहित्यिक संस्थाओं,गंगा को बचाने वाले लोग,रिफायनरी प्रशासन की उदासीनता का दंश झेल रहे हैं। आखिर क्यों कोई दिनकर के लिए करे-धरे?दिनकर तो राष्ट्र के लिए जिया।एक राष्ट्र उन्हें क्या दे सकता है?जब-जब सत्ता के लोगों को दिनकर की जरुरत पढ़ती है,वे दिनकर का नाम लेते रहते हैं...दिनकर को और क्या चाहिए...

उनका गाँव(?)सिमरिया उनकी जयंती के मौके पर हर साल उनकी याद में कार्यक्रम आयोजित करता है।इस बार भी वहां दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन है।

राष्ट्रकवि दिनकर~"अपने समय का सूर्य हूँ मैं..."

                         
                                                                                                                                                               - मन

*साभार~अख़बार

सोमवार, अगस्त 27, 2012

एक महान गायक की याद में....

मुकेश चंद्र माथुर 
एक दिन बिक जायेगा,माटी के मोल....
जग में रह जायेगें प्यारे तेरे बोल....

जी आज है,हिन्दी फिल्म जगत के उस महान गायक की पुण्यतिथि जो अपनी अलग तरह की आवाज के लिए याद किए जाते हैं और याद किये
जाते रहेंगे | हम बात कर रहे हैं,फिल्म जगत में शो मैन राज कपूर की आवाज बनने वाले गायक मुकेश की,जिन्हें गायकी में फिल्म फेअर का सबसे पहला अवार्ड मिला था |
उनका पूरा नाम 'मुकेश चंद्र माथुर' था,लोकप्रिय तौर पर मुकेश | वो भी यहीं चाहते थे कि उन्हें 'मुकेश' कहकर बुलाया जाए |

22जुलाई 1923 को लुधियाना के एक कायस्थ परिवार में इनका जन्म हुआ |
पिता जोरावर चंद्र माथुर जो कि पेशे से एक इंजीनीयर थे और माता  चाँद रानी |10 बच्चों में मुकेश उनकी 6ठी संतान थे |उन्होंने दसवीं तक पढाई की और बाद में दिल्ली में सात महीने तक एक सरकारी नौकरी भी किया |

एक म्यूजिक टीचर जो उनकी बहन 'सुन्दर प्यारी' को गाना सिखाने आते थे,पर साथ-साथ मुकेश भी पास वाले कमरे में सीखते थे | मुकेश की आवाज की खूबी,दूर के रिश्तेदार- 'मोतीलाल' ने तब पहचाना जब उन्होंने मुकेश को अपनी बहन की शादी में गाते सुना | मोतीलाल उन्हें मुंबई ले आए,रहने का इंतजाम भी किया,,रियाज के लिए टीचर भी रखा,फिर जो दौर शुरू हुआ,वो आज ही के दिन 1976 में रुका |

मुंबई जाने के बाद 1941 में सबसे पहले उन्होंने "निर्दोष" नामक फिल्म में अभिनेता के तौर पर काम किया | बतौर गायक उन्होंने 1945 में आई फिल्म "पहली नज़र" से शुरू किया | गाना था-"दिल जलता है तो जलने दे"
इस गाने पर मोतीलाल ने अदाकारी की | मुकेश, K.L सहगल साहब को अपना आदर्श मानते थे,और इस गाने में उनकी झलक,मुकेश के आवाज के ऊपर साफ दिखाई दे रही थी | यह गाना जब K.L सहगल साहब ने सुना तो दंग रह गए,उनका कहना था कि "ये गाना मैंने कब गाया" |
इनके समकालीन गायक थे-मो. रफ़ी,मन्ना डे,तलत महमूद,किशोर कुमार | ये सब के सब एक से बढ़कर एक थे ,पर मुकेश जाने गए अपनी आवाज के भोलेपन से,मासूमियत से |

शुरू में मुकेश, अभिनेता दिलीप कुमार की आवाज बने,और मो.रफ़ी राज कुमार की | लेकिन बाद में म्यूजिक डायरेक्टर नौसाद साहब के साथ गाना गाने के बाद वे राज कपूर के नज़र में आए और फिर आगे से राज कपूर के लिए वे गाने लगे और मो. रफ़ी दिलीप कुमार के लिए |

उन्हें चार बार फिल्म फेअर का अवार्ड भी मिल चूका है | सबसे पहला मिला-गाना "सब कुछ सिखा हमने " फिल्म अनाड़ी(1959),फिर "सबसे बड़ा नादान वहीँ है" फिल्म पहचान(1970)से ,"जय बोलो बेईमान की"फिल्म बेईमान(1972)से ,"कभी-कभी मेरे दिल में "फिल्म कभी-कभी(1976) से के लिए |
उनके गाए हुए नौ गाने फिल्म फेअर अवार्ड के लिए नामांकित भी हुआ | 1974 में आई फिल्म 'रजनीगंधा' में उनके गाए गीत "कई बार यूँ भी देखा है" के लिए उन्हें बेस्ट मेल प्लेबैक सिंगर का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला |
उन्हें तीन बार Bengal film journalists association awards भी मिल चूका है |
उन्होंने लगभग 1200 गाने को अपनी आवाज देकर संगीत-प्रेमियों को गुनगुनाने का मौका दिया | उन्होंने राज कपूर के 34 फिल्मों में 118 गाने,मनोज कुमार के 21 फिल्मों में 48 गाने,दिलीप कुमार के 6 फिल्मों में 19 गाने,देवानंद के 2 फिल्मों में 3 गाने,अमिताभ बच्चन के 4 फिल्मों में 10 गाने और राजेश खन्ना के 7 फिल्मों में 8 गाने गाए | वे 48 गजल,23 भजन,14 लोरी,109 गैर फ़िल्मी,92 फ़िल्मी और 115 गाने ऐसे भी गाए जो रिलीज नही हुए | उनके द्वारा गाई गई तुलसी रामायण ,आज भी लोगों के जेहन में ताज़ा हैं |

सबसे ज्यादा गाना उन्होंने राज कपूर के लिए गाए और उनकी आवाज राज कपूर की आवाज से बिल्कुल मिल जाती थी |
राज कपूर की फिल्म बरसात के बाद इनकी एक टीम बन गई थी जिसमें गीतकार "शैलेन्द्र" तथा "हसरत जयपुरी",गायक "मुकेश" और संगीतकार "शंकर-जयकिशन" शामिल थे | ये सभी एक दूसरे के अच्छे दोस्त भी थे और लगभग 18 वर्ष,एक लंबे अरसे तक एक साथ मिलकर काम करते रहें |
मुकेश,राज कपूर,शैलेन्द्र,हसरत जयपुरी,शंकर-जयकिशन
मुकेश ने अपने जीवन साथी के रूप में सरल त्रिवेदी रायचंद को चुना (1946 में) | उनके पांच बच्चे हैं-रीता,नितिन,नालिनी(स्वर्गवास),मोहनीश और नम्रता |
उनके स्वर्गवास के कुछ साल पहले यह अफवाह उड़ी थी कि वे तलाक ले चुके हैं,पर 22 जुलाई 1976  को (U.S.A  जाने के चार दिन पहले) उन्होंने अपनी शादी की 30वीं सालगिरह मनाया |
मुकेश और सरल त्रिवेदी रायचंद
उनके गाए कुछ तराने....जिसके लिए वे हमेशा संगीत प्रेमियों के दिल में घर बनाकर रहेंगे |

  • मेरा जूता हैं जापानी -(श्री 420) 
  • सावन का महीना,पवन करें शोर -(मिलन)
  • कहीं दूर जब दिन ढल जाए -(आनंद)
  • मै ना भूलूँगा -(रोटी,कपड़ा और मकान)
  • चाँद सी महबूबा,हो मेरी -(हिमालय की गोद में)
  • दोस्त,दोस्त ना रहा -(संगम)
  • दम भर जो उधर मुँह फेरे -(आवारा)
  • मैंने तेरे लिए है सात रंग के -(आनंद)
  • मै तो दीवाना -(मिलन)
  • ये मेरा दीवानापन है -(यहूदी)
  • आवारा हूँ -(आवारा)
  • जाने कहाँ गए वो दिन -(मेरा नाम जोकर)
  • हम तुमसे मोहब्बत करके सनम -(आवारा)
  • एक प्यार का नगमा -(शोर)
वे U.S.A के डिट्रोय्ट शहर में लाइव कन्सर्ट के लिए गए थे जब ह्रदय गति रुकने से उनकी मृत्यु हो गई ,53 साल के उम्र में वे इस दुनिया को अलविदा कह गए | बाकी का कन्सर्ट लता मंगेस्कर जी ने पूरा किया |
उनकी मृत्यु की खबर सुनते ही राज कपूर ने कहा था कि "मैंने अपनी आवाज खो दिया"
मो.रफ़ी साहब उस समय नौसाद के साथ कोई गाना रिकॉर्ड कर रहे थे,उन्होंने कहा था कि "एक बहुत अच्छा गायक,एक बहुत अच्छा इंसान,एक प्यारा साथी चला गया"
संगीतकार अनिल विश्वाश ने कहा था कि "मैंने अपने बेटों में से एक बेटे को खो दिया" 
उनका आखिरी रिकॉर्ड किया हुआ गाना था,फिल्म 'सत्यम,शिवम,सुन्दरम' का "चंचल,शीतल.कोमल"
"कभी-कभी मेरे दिल में " इस गाने के लिए उन्हें मरणोपरांत फिल्म फेअर का अवार्ड मिला था | इनके मृत्यु के बाद,इनके बोल से सजी फिल्म थी-धर्मवीर,अमर-अकबर-एंथोनी,चांदी-सोना,खेल-खिलाडी के दरिंदा,सत्यम-शिवम-सुन्दरम आदि |

कुछ यादें  जिन्हें बस महसूस किया जा सकता है-


राज कपूर और मुकेश 

मुकेश,इन्द्रा गाँधी से ऑटोग्राफ लेते हुए 


मुकेश,राज कपूर से अवार्ड लेते हुए
एक समारोह में
एक कन्सर्ट में ,कोलकत्ता 
मुकेश,राज कपूर एवं लता जी 
मुकेश और राज कपूर जी











राज कपूर एवं मुकेश जी
मुकेश,उनके बेटे नितिन एवं लता जी 
महेंद्र कपूर एवं मुकेश जी


28 अगस्त 1976 को अखबार
में उनकी मौत की खबर
अंतिम यात्रा की तैयारी


राज कपूर उदास मुद्रा में
मुखाग्नि देते हुए नितिन,साथ में राज कपूर जी

2003 में जारी डाक टिकट 
आज वे हमारे बीच नहीं है,पर उनकी आवाज अपने वक्त की बेमिशाल आवाज थी,आज भी है और कल भी रहेगी |
आज की पीढ़ी(कुछ को छोड़कर)भले उन्हें नही सुने,पर उनकी आवाज उनके देहांत के करीब 37 साल बाद भी उनके सुनने वाले के दिल में बसी हुई है,एक सुकून देती है |
"ओ जाने वाले लौट के आजा" गाने को सुनकर आज भी उनके चाहने वाले,उनकी राह देख रहे है...पर जाने वाले कभी वापस नही आते...यादों में रह जाते हैं... मन के किसी कोने में सिमटकर...



                                                                    (साभार-विकिपीडिया और मुकेश जी के official वेबसाइट से )

रविवार, अगस्त 26, 2012

चाँदनी रातों को याद आऐगें...

वे फिर से चले गए...उसी के पास...जहाँ सबसे पहले उन्होंने ही अपनी 
उपस्थिति दर्ज करवायी थी...
नील आर्मस्ट्रांग
चाँद पर पहला कदम रखने वाले नील आर्मस्ट्रांग,इस दुनिया को अलविदा कह गए | एक अमेरिकी नौसेना के पायलट,जो बाद में अपनी मेहनत के बल-बूते से नासा के अभियान से जुड़े और वह गौरव हासिल किया जिसके कारण आज पूरी दुनिया उनको याद कर रही है, भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित कर रही हैं |
हाल ही में उन्होंने 5 अगस्त को अपना 82वाँ जन्मदिन मनाया था और कुछ दिन पहले ही उनकी बाईपास सर्जरी हुई थी |




चाँद की सतह पर

इनका पहला मिशन 1966 में जेमिनी-8 नामक अंतरिक्षयान से शुरू हुआ था और दूसरा मिशन था 1969 में अपोलो-11,जिसके द्वारा वे और उनके दो वैज्ञानिक साथी (एडलिन एल्ड्रिन और माइकल कॉलिंस ) के साथ सर्वप्रथम 20 जुलाई 1969 को चाँद की सैर की थी पर चाँद की सतह पर पहला कदम रखने का गौरव मिला था नील आर्मस्ट्रांग को | वे उस समय 38 साल के थे |तीन घंटे चाँद पर चहलकदमी के बाद उन्होंने रेडियो के जरिए ,यह संदेश पृथ्वी पर भेजा था कि "यह मनुष्य के लिए छोटा सा कदम है लेकिन मानवता के लिए बहुत बड़ा कदम है "
अपने दल के दूसरे साथियोँ सहित उन्हें अमेरीका का सर्वोच्च नागरिक
सम्मान "काँग्रेशनल मेडल" से भी नवाजा जा चूका हैं |      

चाँद पर उनका पद्चिन्ह 

उनके परिवार ने एक बयान में कहा है कि "हमें एक बहुत अच्छे 
इंसान के निधन पर दुःख है लेकिन हमें उनकी शानदार जिंदगी पर 
गर्व है और आशा है कि यह दुनियाभर के युवाओं में मेहनत करके 
अपने सपने साकार करने के लिए उदाहरण साबित होगा"                                


  सबसे पहले गए थे चाँद पर...                    
  कल फिर चल दिए उसी तरफ...                                                
  हमारी यादों में रह गए...
  धरती को सूना कर.......!!!


हाल ही की तस्वीर 





वे बस हमारी यादों में रह जाएँगे,पर जब-जब हमारी नज़रे चाँदनी रातों को चाँद पर पड़ेगी ...मन का कोई कोना बस उनके लिए ही सोचेगा और कोशिश करेगा कि चाँद के दाग में कहीं उनका पद्चिन्ह दिख जाए |
और हमसब यह वादा करते हैं कि जब भी हम चाँद की तरफ देखेंगे,हमारी पलकें कुछ पल के लिए उनकी याद में झुक जाएँगी | 


उनकी याद में