गुरुवार, अप्रैल 02, 2026

2020, गांव, फुटबॉल, मां.

नोट : 

पिछले दिनों गूगल फोटोज के किसी अनजाने बेनाम गुम फ़ोल्डर में ये डिजिटल डायरी मिली जो अगस्त सितंबर 2020 की है. पहले लॉकडाउन में जब ख़तौली (मुज़फ्फरनगर, मेरठ) में फंसे थे और वापस सही सलामत बच के गांव लौटे थे तब की.

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24 अगस्त 2020, 22:04 :)

नेटफ्लिक्स पर "ज़िन्दगी गुलज़ार है" पाकिस्तानी सीरीज़ शुरू किया है...अच्छी लग रही है. उसमें लड़का डिजिटल डायरी मेंटेन करता है और लड़की हाथ से डायरी लिखती है. मैं भी हाथ से डायरी लिखता हूँ पर इसमें देख के लगा कि डिजिटल कोशिश भी करते हैं. तो आज से शुरू किया है. :)

4-5 दिन से फुटबॉल खेलने जा रहे हैं पैर के अँगूठे पर चोट लगी है और ये भी ध्यान आया है कि फुटबॉल खेलने से पहले नाखून काट लेने चाहिए. ख़ुद के भी नाखून काट लेने चाहिए, दूसरों के कटवा देने चाहिए 😂

आज माँ ने खेलने जाने से मना किया था कि रेस्ट करो. अँगूठे को आराम दो, मैंने कह दिया ठीक, आज नहीं खेलूँगा. घर से सोच के निकला कि नहर की तरफ़ चला जाऊँगा पर जब गया तो पैर अपने आप ग्राउंड की तरफ़ घूम गएँ. खेल लिया पर सावधानी से. 2 गोल हुए हमारी टीम की तरफ़ से, दोनों मैंने ही किएँ. पास सही मिल जाये तो गोल करना कोई बड़ी बात नहीं ख़ासकर यहाँ गाँव के खिलाडियों के बीच जिनमें ज़्यादातरों के लिए फुटबॉल का बस इतना मतलब है कि पैर से बॉल लगना चाहिए भले रोता हुआ फुटबॉल कहीं जाए।

माँ जानती है कि मुझे पानी की ज़रूरत कब होती है कब कोई फल खाने की और कब चाय की ज़रूरत होती है. बिना माँगे-बोले टेबल पर रख जाती हैं. माँ को यकीन रहता है कि मैं लैपटॉप या मोबाइल पर या किताबों के साथ कुछ काम का ही कर रहा होऊँगा पर पापा को 5 ग्राम कम यकीन होता है, कमरे में आकर समझाते हैं कि चलने वाली मशीन को भी आराम दिया जाता है. इतना कहकर वो चले जाते हैं. मैं माँ की तरफ़ देखता हूँ माँ मेरी तरफ़.

दिल्ली के मेरे अच्छे दिनों की एक दोस्त से आज कॉल पर बात हुई. उन्होंने कहा कि वो जितनी देर तक दोपहर का खाना खायेंगी उतनी देर तक ही बात करेंगी मेरे से, मैंने हामी भर दी और सोचा कि 10-15 मिनट बात होगी पर मुझे इसका कोई आईडिया नहीं था कि वो मोहतरमा 1 घंटे 14 मिनट तक अपने खाने को खींच के ले जायेंगी. 😂

दिल्ली जाने का हो रहा है सितंबर के दूसरे सप्ताह तक. किराए कमरे को भी देख आना ज़रूरी है. रुकना तो गाज़ियाबाद उत्कर्ष के ही है. एग्जाम दे दूँ फिर सोचना होगा कि दिल्ली में रुकना ठीक रहेगा या गाँव ही वापस लौट आऊँ- माँ के पास, माँ के यकीन के पास, फुटबॉल के पास, नहर के पास, पोखर के पास, धान से पटे पड़े हरे खेतों के पास, गाँव के चाँद-सूरज, बादलों, पीपल के पास, उस कमरे के टेबल के पास जहाँ मेरे पिछले 3 महीने करीने से दर्ज़ हुए हैं. पर ये सब दिल्ली जाके ही पता चलेगा...दिल्ली जा के ही :)
              

मां 

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26 अगस्त 2020, 22:19 :)


गाँव-समाज के लोगों से जुड़ना कितना ज़रूरी होता है, अब समझ आ रहा है. शुरू से ही गाँव में रहना नहीं हुआ. गिनती के लोगों से जान-पहचान वो भी केवल "कैसे हो, ठीक हूँ" तक सीमित. पर अब लम्बे अरसे तक रहते हुए बहाना कहिए इसे या नियति कि गाँव के लोगों से जुड़ने का, उन्हें जानने का, अपनी मंशा बताने का अवसर लॉकडाउन की वजह से मिला.

आज अंजना मैम ने ट्विटर पर अमृता प्रीतम का एक ख़त शेयर किया जो इमरोज़ के नाम से 1960 में अमृता प्रीतम ने लिखा था। मेरे पास अमृता प्रीतम और इमरोज़ के 'ख़तों का सफ़रनामा' किताब है जिसमें उनके बीच लिखे ख़तों का संग्रह है। मैंने उस ख़त की फ़ोटो लेकर ट्विटर पर मैम के ट्वीट के साथ शेयर किया। मैम ख़ुश हुईं और किताब का नाम पूछा, मैंने किताब का नाम बताया और कहा कि ये किताब आपको मैं गिफ़्ट कर सकता हूँ। मैम कहती हैं ये तो बढ़िया होगा. तो इनके जन्मदिन के पहले ये किताब उन्हें भेज दूँगा :)
फ़िर हमारी कॉल पर भी बात हुई। मैम का पहला सवाल ही यही था कॉल पर कि तुम तो बहुत छोटे लगते हो, उम्र बताओ अपनी ? मैंने कहा छोटा ही हूँ लगता भी हूँ। 20 का लगता हूँ पर हूँ 26 साल का। मैम कहती हैं अभी तो बहुत छोटे हो। फ़िर किताब को लेकर बातें हुईं। किन-किन को मैंने पढ़ा है ? कौन-कौन सी किताबें हैं मेरे पास ? नए में कौन अच्छा लिखता है ? मैम अपनी रचना प्रक्रिया के बारे में कम शब्दों में ही बताने की कोशिश कीं और मैंने समझने की। अपने बारे में बताया, उनका जाना। और फ़िर मैम ही तय की कि जो किताबें उनके पास हैं वो मुझे भेज देंगी और जो मेरे पास हैं वो मैं उन्हें भेज दिया करूँगा और इस तरह किताबें शेयर होंगी हमारे बीच 🏃
मैम, जयपुर की है। मोतिहारी से कभी मुझे भगा दिया गया तो मैं भाग के जयपुर या अजमेर ही जाऊँगा। प्री देने के बाद जयपुर जाना ही था, अब जल्दी से जयपुर जाना है, अक्टूबर में ही :)


मंटो का लिखा हमें आईना तो दिखाता ही है रास्ते भी बतलाता है कि इधर चले जाओ या उधर मत जाओ, बाकी जाने वाले की मर्जी है.
'दो गढ़े' नामक निबंध में मंटो फ़रमाते है-
"मैं कुछ भी हूँ, बहरहाल मुझे इतना यक़ीन है कि मैं इंसान हूँ- इसका सबूत यह है कि मुझमें बुराइयाँ भी हैं और अच्छाइयाँ भी। मैं सच बोलता हूँ, लेकिन बाज़ औक़ात झूठ भी बोलता हूँ। नमाज़ नहीं पढ़ता, लेकिन सज्दे मैंने कई दफ़ा किए हैं।"
'ज़िन्दगी गुलज़ार है' के पांचवें एपिसोड में पति से अलग थलग-पड़ चुकी तीन होनहार बेटियों की माँ अपनी बड़ी बेटी से कहती हैं- "नाउम्मीदी गुनाह है।"

                  

क़सफ़ यार... 🫂

फुटबॉल के ग्राउंड में ही किसी लड़के का ये लव लेटर मिला था, फटा हुआ. ये किताब जिसे भेजी है उसके पास ये लेटर चला गया 🥲

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28 अगस्त 2020, 22:02 :)


आज से 14000 साल पहले तक अमेरिकी महाद्वीप में लम्बे घुमावदार दाँतों वाली बिल्लियाँ धरती पर 300 लाख सालों तक वजूद में रहकर विलुप्त हो गईं और न जाने ऐसे ही कितने ही जीव जंतु और प्रजातियाँ। हम मनुष्य इनपर गहरे शोध करके इतिहास की किताबों में इन बातों को दर्ज करके इनके बारे में पढ़ते हैं किसी को बताते हैं या ऐसे ही डायरी में दर्ज़ करते हैं। ये तय है कि हम मनुष्य भी जब कुछ हज़ार साल ही यहाँ रहकर विलुप्त हो जाएँगे तो कोई और किसी अलग दुनिया में, अलग टाइम ज़ोन में, हम सबका किसी न किसी तरीक़े से कहीं ज़िक्र कर रहा होगा।

 आज ट्विटर पर पढ़ा- "In 1704, Sir Isaac Newton predicted the world would end in 2060." न्यूटन ने किस आधार पर कहा होगा ? ऐसे तो नहीं ही कह दिया होगा, अब जो भी हो। पता है, हम मनुष्य सबसे ज्यादा सुकवार हैं, सुकवार मतलब सबसे ज़्यादा असुरक्षित। पृथ्वी पर अरबों सालों के बाद अनुकूलतम परिस्थितियों का जमावड़ा होता गया तब कहीं जाके हमारा अस्तित्व सामने आया। अब आगे उन परिस्थितियों में कुछ भी बदलाव हो तो सबसे पहले हम मनुष्य विलुप्त हो जाएँगे धरती से, हो ही रहे हैं। जीवाणु ही हैं जो कि सबसे पहले आए और सबसे बाद तक टिके रहेंगे।


कल दूर के एक क़रीबी ने मैसेज किया कि उसे 'छपाक' फ़िल्म कहाँ मिलेगी? मैंने ढूँढा नहीं मिली बाद में हॉटस्टार पर दिख गयी। मैंने भी ये फ़िल्म नहीं देखी थी तो देख ली और मेघना गुलज़ार की फ़िल्म होने के नाते इसे इतने दिन तक अनदेखा रखा भी नहीं जा सकता था। हम लड़के लोग लाख कविता कहानी लिख ले, पर ये अंदाज़ा लगाना भी मुमकिन नहीं है कि इस देश की लड़कियाँ किन परिस्थितियों में जीती हुई आ रही हैं। और न जाने कितनी ही जी रही हैं उन्हीं परिस्थितियों में, नहीं लगा सकते हम लड़के लोग अंदाज़ा, हाँ, दावा कर सकते हैं कि हमें एहसास है और लिख सकते हैं एक से बढ़कर एक बेहतरीन कविता और कहानी!


माँ आज ज़्यादा काम करके थक गई थीं, तो आज रोटी बनाने की ज़िम्मेदारी मेरी। लगभग 7-8 महीने बाद बनाई होगी और मजाल कि कोई कह दे कि 7-8 महीने बाद रोटी बनाने में हाथ आज़माया। पापा तुलना करते हुए कहते हैं- "तुम तो रवि से भी बढ़िया रोटी बना लेते हो।"
आज फुटबॉल में हमारी टीम 2-1 से हार गई। मैच 2-2 से ड्रा पर ख़त्म होता पर विपक्षी टीम के गोलकीपर की चालाकी से 2-1 पर ही खेल ख़त्म हुआ।

निदा फ़ाज़ली फ़िराक़ साहब के लिए लिखते हैं- "ग़ालिब और मीर के बाद अगर कोई तीसरा नाम लिया जा सकता है, वह उर्दू शायरी में फ़िराक़ का नाम होगा।" उन्होंने वही लिखा जो भोगा और जिया और निराला के शहर इलाहाबाद के इतिहास में दर्ज़ होने से पहले कह गएँ- "आने वाली नस्लें तुम पर रश्क (गर्व) करेंगी हम अस्रो (समकालीन) जब उनको यह ख़्याल आएगा, तुमने फ़िराक़ को देखा था।"

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29 अगस्त 2020 :)


बीते हुए समय का अभी के समय पर कितना ज़ोरदार ये एक तमाचा है कि अब ख़त नहीं लिखे जाते। वैसे तो आदत में शुमार है कि जब किसी से पहली दफ़ा मिलता हूँ तो उस मिलने वाले शख्स को एक किताब गिफ़्ट करता हूँ। अब से सोचा है कि ज़रूरतमंद और शौकीन लोगों को उनके कहने पर बाई पोस्ट किताबें भेज दिया करूँगा। दिल्ली जाकर इसपर अमल करता हूँ।

गुलज़ार साहब को क्यों लिखना पड़ा -

किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होतीं
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती हैं कंप्यूटर के पर्दों पर
बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें...
...मगर वो जो किताबों में मिला करते थे
सूखे फूल और महके हुए रक्के
किताबें माँगने, गिरने-उठाने के बहाने
रिश्ते बनते थे, उनका क्या होगा?
वो 'शायद' अब नहीं होंगे...

गुलज़ार साहब के इस 'शायद' को खारिज कर देने के मकसद से पिछले दिनों ट्विटर के एक दोस्त को सत्या व्यास की '84' और अनुराधा बेनीवाल की 'आज़ादी मेरा ब्रांड' भेजी है। अनुराधा जी इस किताब की अगली कड़ी लिख रही हैं, सोच रहा हूँ वो छपे तब तक 'आज़ादी मेरा ब्रांड' की तीसरी दफ़ा पढ़ लूँ। बाकी, अनुराधा जी से वर्ल्ड बुक फेयर-2019 में चेस में हराने का वादा किया था। देखना है कि लंदन जाके हराऊँ उन्हें या दिल्ली में... देखते हैं। :)

इस एक बात को आप बेशक मान लीजिए कि एक अच्छा फुटबॉलर गणित में कभी कमज़ोर नहीं हो सकता। मैं खुद के 10th और 12th में आए गणित के मार्क्स को देखकर खुद ही खुद को आज सर्टिफिकेट दे रहा हूँ कि "मन्टू, तू एक अच्छा फुटबॉलर है।" हाहाहा
आज 1-1 से मैच ड्रॉ हो गया, आज का खेल बढ़िया हुआ!

अगस्त बीतने को है और माँ की नज़र में भादो। सितंबर को अगस्त से भी ज़्यादा ख़ुशनुमा बनाना है। 'एक' का साथ चाहिए होगा और उसका साथ मिलेगा ही, इसका यक़ीन है मुझे और उम्मीद भी... "Sunflower" :)

कृपया धीरे चलिए...
या
चलना आहिस्ते इश्क़ नया है...
या
जीवन गुलज़ार है...
या
मेस्सी महान गणितज्ञ है...
29 अगस्त 2020, 22:10 :)

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1 सितंबर 2020, 22:33 :)


ख़ुशनुमा अगस्त बेशुमार यादें देकर बीत गया, सितंबर शुरू हो गया है, कुछ दिनों में अक्टूबर आ जाना है, फ़िर सर्दियाँ ही सर्दियाँ और चाय ही चाय फ़िर नया साल और फ़िर 2021 को भी बीत जाना है। औरों का तो पता नहीं पर मैं ऐसा सोचता हूँ जैसे कि जब 2011 में था तो सोचा कि जो सपने देखे हैं वो 2015 तक इतना क़ाबिल हो गया रहूँगा कि उन सपनों को हक़ीक़त में जी रहा होऊँ कहीं। ऐसे ही 2015 में सोचा कि 2019 तक मैं ख़ुद को कहाँ देखता हूँ, वैसे ही आज सोचा है और माँ से उसी सिलसिले में बात भी हुई कि 2022 के जून-जुलाई में मैं ख़ुद को कहाँ देख रहा हूँ। 2022 के जून-जुलाई में, देखते हैं :)

आज माँ को गुलज़ार की फ़िल्म "अँगूर" दिखाई। मेरी पसंदीदा फ़िल्म है इसलिए भी और इसलिए भी कि फ़िल्म में मुख्य किरदार निभा रहे पति-पत्नी, संजीव कुमार-मौसमी चटर्जी का नाम अशोक और सुधा है। माँ का नाम सुधा है और पापा जी का नाम अशोक। मैंने कहा- देख माँ, इसमें पत्नी का नाम सुधा है और उनके पति का नाम अशोक जैसे आपके पति का नाम अशोक है। माँ कहती हैं- "अच्छा, बउओं एक दिन तोहरो आई" मतलब एक दिन मेरी पत्नी भी आयेगी 😂😂 🙈

आज फुटबॉल में कम ही खेलने वाले पहुँचे। 7-7 खिलाड़ियों से मैच हुआ, इस वजह से ख़ूब दौड़ना पड़ गया। मैच जब 0-0 से बेनतीजा रहा तब ग्राउंड से ही फ़ोन लगा के माँ को चाय के लिए मना करके कहा कि आज चाय नहीं आज नीबू-चीनी-पानी घोल के इंतज़ार करो आँगन में। घर आके जब नीबू-चीनी-पानी पी रहा था तब माँ कहती हैं- "देखबऊ, देखबऊ के अपना मेहरारु के फ़ोन करके आर्डर देत बाड़े कि ना" मतलब देखूँगी कि पत्नी को ऐसे फ़ोन पर आर्डर देता है कि नहीं 😂

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ लिखते हैं- "एक ज़माना हुआ जब ग़ालिब ने लिखा था कि जो आँख क़तरे में दज़ला(इराक़ की एक नदी) नहीं देख सकती, दीद-ए-बीना(देखने वाली दृष्टि) नहीं बच्चों का खेल है।

एक बूँद में नदी तक देख लेने की क़ाबिलियत और उससे आगे जाके उसी बूँद में समंदर को देख लेने की भी क़ाबिलियत। ये बात लिख के समझने में आसान है, मुद्दा महसूस करने का है जैसे ग़ालिब ने किया होगा और ग़ालिब के जैसे बहुतों ने।
आज प्रबोध अंकल जी से बात हुई। जयपुर में भी आज दिनभर बादल उमड़ते रहें जैसे यहाँ गाँव में। रात को हल्की बारिश हुई थी 11-12 बजे के बीच, हल्की ही हुई थी तेज़ होती तो चाय बना लेता 😂 अंकल जी की नई का विमोचन है, दिल्ली रह रहा होता तो जाता ही। उनकी अगली किताब के कुछ पन्नों पर मैं दर्ज़ होने वाला हूँ 🏃 अंकल जी कहते हैं "जल्दी से आओ जयपुर, तुम्हारी अगली किताब छपने का रास्ता क्लियर हो।"

...देखते हैं, क्या कुछ है आगे :)
                  
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कोरोना का भयावह समय के बावजूद
मेरा 2020 और 2021 सबसे अच्छे साल रहे अब तक के जीवन के.. 

ख़ूब पढ़ा, ख़ूब घूमा, मां के साथ ख़ूब समय बिताया
ख़ूब सिनेमा देखा, ख़ूब प्यार किया, ख़ूब कविता लिखा
ख़ूब खेला, ख़ूब सोया.. ख़ूब खाया.. जो मन में आया किया.. 

अच्छा ये पढ़ते हुए आप सोचे कि नहीं एक बार कि ये 'ख़ूब' का मतलब क्या होता है.. haha.. एक ही शब्द या काम को बार बार कहना या दोहराना या करना, उसे थोड़े देर के लिए अर्थहीन बना देता है. थोड़ी देर के लिए ही सही, हम मनुष्यों में से बहुत से अर्थहीन हो चुके हैं, मालूम क्या ?

ख़ैर 

गुरुवार, मार्च 26, 2026

धुरंधर, हौंसला, ईंधन, बलिदान. धर साहब.

हाँ, तो मोतिहारी थे तो धुरंधर का पहला पार्ट देखने गए थे सैफ़ भाई के साथ। और अच्छा अनुभव रहा था. सैफ़ भाई के साथ देखने चले तो गए फ़िल्म पर जब फिल्म का थीम ध्यान आया तो मेरे अंदर का पूर्वाग्रही मन जाग गया, सोचने लगा कि यार सैफ भाई को साथ में लेके कम से कम ये फिल्म देखने नहीं जाना था.. ख़ैर गए हम दोनों और सैफ़ को फ़िल्म अच्छी लगी, कुछेक जगह जहां सरकार के फैसलों को सही बताया गया है उन्हें छोड़कर. पाकिस्तान वाले मुद्दे पर सैफ़ का कुछ भी कमेंट नहीं आया क्योंकि शायद ऐसा कुछ पाकिस्तान या इस्लाम को लेके उल्टा सीधा टॉपिक कमेंट के लिए फ़िल्म में था भी नहीं. और मैंने सैफ़ को कह भी दिया था कि भाई सच जो है वो है, उससे इनकार नहीं किया जाना चाहिए.

खैर..

ख़ासकर इतनी लंबी फ़िल्म पहला पार्ट (3 घंटे 34 मिनट) होने के बावजूद दूसरे हाफ में बोर न होना फ़िल्म की काबिलियत बताती है क्योंकि लंबी फ़िल्म में सेकंड हाफ ही मायने रखता है। ख़ैर, फ़िल्म ने क्या जादू किया ये अलग से बताने की ज़रूरत नहीं.

धुरंधर पार्ट 1.

और अब आज, धुरंधर 2.

और इसका दूसरा पार्ट जो 3 घंटे 49 मिनट की है और अच्छी है क्योंकि क्योंकि क्योंकि.. जाओ ख़ुद देखो और जान जाओ..

सुबह दीप्तांशु भईया का ट्वीट आया कि 
"धुरंधर-2 देखनी थी, पर वक़्त से चार घंटे कैसे चुराया जाए?"
मैंने कहा
"वही वही.. ट्विटर के लिए मेरे पास 12 घंटे हैं 🫣
पर धुरंधर 2 के लिए टाइम नहीं निकाल पा रहा."
भईया कहते हैं- "Shiddat lao..ho jayega"

तो शिद्दत लाया गया और आज ही देख लेने का सोचा गया, 
शिद्दत फ़िल्म भी अच्छी है, मंटू शिद्दत फ़िल्म की बात यहां नहीं करनी है.. ओके ओके.



सबसे पहले इस पूरे सिनेरियो के कर्ता धर्ता आदित्य धर की बात करते हैं. यह कहानी है उस लड़के की, जिसका जुनून क्रिकेट (बॉलिंग) था।

1983 में दिल्ली में एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे आदित्य धर और उनकी मां दिल्ली विश्वविद्यालय में काम करती थीं।

क्रिकेट के लिए दीवाने आदित्य धर को जब अंडर 19 क्रिकेट वर्ल्ड कप के लिए टीम में नहीं चुना गया तब इन्होंने फ़िल्म लाइन में जाना चुना. और देख लो सफ़र अब..

"काबुल एक्सप्रेस" फ़िल्म 2006, वही जॉन अब्राहम वाली, के गाने पता है किसने लिखे हैं ? आदित्य धर ही. इनकी पहली शॉर्ट फिल्म "बूंद" जिसके स्क्रिप्ट और डायलॉग धर साब लिखे, को राष्ट्रीय अवार्ड मिला।

प्रियदर्शन निर्देशित अजय देवगन-अक्षय खन्ना की फिल्म 'आक्रोश' (2010) के डायलॉग भी आदित्य धर ने लिखे।

प्रियदर्शन कहते हैं, "भाषा पर आदित्य की पकड़ शानदार थी और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी."

और फ़िल्म के डायलॉग सुनिए तो आप प्रियदर्शन की बात से 100% एग्री करेंगे.

अब सबसे बड़े ट्विस्ट पर आते हैं जहां से आदित्य धर की लाइफ 180° शिफ्ट हो गई.

करन जौहर की कोई फ़िल्म डायरेक्ट करने वाले थे आदित्य, उसमें हीरो होना था फ़वाद ख़ान को.. फ़िल्म शुरू होने से पहले उरी की घटना हो गई और फ़िल्म हमेशा के लिए बंद हो गई.. यही से उरी फ़िल्म के लिए आदित्य धर दिलोजान से जुट गए.. और देखिए उरी फ़िल्म का कमाल. अगर उरी फ़िल्म नहीं देखे हैं तो देखिए भई..

फ़िर आर्टिकल 370, बारामूला को आदित्य धर ने ही लिखा है 
 और और और अब धुरंधर 🫡


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फ़िल्म अच्छी है..थिएटर में जाके अनुभव कीजिए. पहला पार्ट नेटफ्लिक्स पर आ ही गया है तो न देखने वाले पहला पार्ट देख लीजिए.. और दूसरे पार्ट के लिए पहले तो समय निकालिए इसके लिए.. थिएटर में ही देखिए.



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अब उस मुद्दे पर आते हैं जो इस फिल्म को लेकर या आदित्य धर के लिए उछाला जाता है कि प्रोपेगेंडा फैलाते हैं.. सरकार का पक्ष, सिनेमाई लिबर्टी के साथ कुछ मुद्दों को बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं।

आदित्य धर इसको लेकर कहते हैं - 

"जो लोग इसे प्रोपेगेंडा कहते हैं, उनकी मुझे कोई परवाह नहीं. सच कहूं तो मुझे वास्तव में उनकी चिंता नहीं है. क्योंकि असली बात यह है कि मैं जानता हूं यह कहां से आ रहा है, और भारतीय दर्शक बहुत ही समझदार हैं. जब वे फ़िल्म देखते हैं, उन्हें आसानी से समझ में आ जाता है कि कौन सी फ़िल्म प्रोपेगेंडा है और कौन सी फ़िल्म की नीयत सही है. और मेरी फ़िल्म के साथ, जब तक मैं निर्माता या निर्देशक रहूंगा, उसकी नीयत इरादा हमेशा सही रहेगा. जिस दिन मेरी नीयत ठीक नहीं होगी मैं फ़िल्में बनाना बंद कर दूंगा."

बाकी मुझे भी ये लगता है कि ये आरोप बहुत हद तक निराधार है। अमेरिका और ब्रिटेन वाले दशकों से अपने देश के जासूसों की कहानी दिखाते चले आ रहे हैं उनके लिए तो कभी किसी ने नहीं कहा होगा कि ये सरकार का पक्ष दिखा रहे या प्रोपेगेंडा फैला रहे.


छोटे भाई (आदित्य राज), दिल्ली विश्वविद्यालय से PhD कर रहा, उसके रिसर्च का टॉपिक है - हिन्दी सिनेमा में ऐतिहासिक चरित्रों के चित्रांकन में निर्देशकीय सृजनात्मकता.

...तो सिनेमा पूरी तरह से निर्देशक का माध्यम है, इसे ऐसे समझिए कि जिस तरह मां शुरू से अपने बच्चे को पाल पोसकर उसे बड़ा करती है वैसा ही एक निर्देशक भी अपनी फ़िल्मों के साथ बर्ताव करता है। उसे इतनी छूट मिलनी चाहिए कि वो जो चाह रहा है उसे वो पर्दे पर बेहिचक दिखा सके.. और इस प्रोसेस में हम दर्शक को इतना भरोसा करना होगा कि वो निर्देशक भी इंसान है, उसके अंदर भी इंसानियत है. नहीं है ऐसा ? बाकी देखने वाले पर छोड़िए न भाई..इतना क्यों लोड लेना. आयं ?

🫡🫡

26 मार्च 2026. ❣️.

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कल, 6 दिसंबर 2020 को ट्विटर पर मेरा लिखा एक थ्रेड मिला..आज कल रामनवमी भी है तो कृपया पढ़ा जाए इसे -

"ये सबसे बड़ी दिक्कत है। ख़ासकर नार्थ इंडिया में जिस किसी को पनीर की सब्जी खाने को भी न मिलता हो पर वो एंड्रॉइड फोन और 1.5gb लेकर घूम रहा। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी का कोर मेम्बरशिप लेकर घूम रहा है। जिस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके वो जान सकता था कि उसके और उसके बच्चे के लिए दाल खाना कितना ज़रूरी हो सकता है वो बन्दा उसी एंड्रॉयड फ़ोन से ये जानता है कि किसके फ्रिज में किसका माँस रखा है। किसने किधर लव जिहाद किया है और मथुरा के किस मंदिर को तोड़कर मस्जिद बनाया गया है। और हर दरगाह में शिव मंदिर होता ही है, जिसे इन ख़ास तबकों ने नेस्तनाबूद कर दिया है.

इनका सनातन धर्म संकट में आ गया है और ये दो कौड़ी के लोग अपने धर्म की रक्षा के लिए अब हथियार उठाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे लोग हमारे बीच में ही हैं। मैं अपनी कहता हूँ मेरे नाना जी और दोनों मामा जी सेम ऐसे ही हो गए हैं 2014 के बाद से। मेरे पापा हो सकते थे पर मैंने और छोटे भाई ने उनके उठते हर एक ऐसे विचार को तर्क के साथ खारिज़ किया है। ऐसे लोग ग़लत नहीं हैं, ग़लत कुछ लोग हैं जो इन्हें ग़ुमराह कर रहे कि भाई जय श्री राम नहीं बोला तो रातों को नींद नहीं आएगी और वो सामने वाला नादान जय श्री राम बोलने लगता है जबकि उसको दाल खाना चाहिए, उसके बच्चे की संगति कैसी है ये देखनी चाहिए।

जय श्री राम बोलना ग़लत नहीं है। मेरी सुबह की शुरुआत श्री राम के भजन से ही होती है। राम मेरे जीवन में उतने तक ही हैं जितने से मेरे अंदर का रावण डरा रहे। धर्म नितांत, ख़ुद के बेडरूम के जैसे व्यक्तिगत मामला है। मेरा बेटा कल को इस्लाम/ईसाई क़बूल कर लेगा तो एक पिता के नाते मुझे शिकायत होगी मगर एक नागरिक की हैसियत से मुझे उसके विचार और धार्मिक झुकाव की इज़्ज़त करनी चाहिए।

धर्म को अपने घर तक ही रखिए और ये भरोसा रखिए कि आपका धर्म इत्ता कमज़ोर नहीं कि कोई आकर उसे दबा देगा या उसकी जड़ें हिला देगा। सबसे ज़रूरी बात कि ऐसे धार्मिक अँधे लोग जो हमारे आस पास थोक मात्रा में कुकुरमुत्ते माफ़िक़ उग आए हैं। इनको बिल्कुल साइड कीजिए अपने जीवन से.. धार्मिक विश्वास और धार्मिक अंधता में इन गदहों को ज़रा सा भी फ़र्क़ नहीं मालूम। यही ट्विटर पर पल रहे ढेर सारे, कितने तो पढ़ेंगे इसे और मन में दलील देंगे कि मन्टू पागल फ़िर शुरू है। इस टाइप के लोगों का इलाज बहुत ही आसान है। बस सब्र करना होगा। इन सब नमूनों के जो बच्चे होंगे या जो बच्चे इनके बड़े हो रहे हैं वो सब भी जवान होके इन्हीं के बताए नक्शेकदम पर चलेंगे तब बुढ़ापे में इन नमूनों को एहसास होगा कि जय श्री राम से ज़्यादा दाल खिलाना ज़रूरी था।

धर्म को बढ़ावा देना, उपासना करना क़तई ग़लत नहीं है पर किसी दूसरे धर्म की कमियाँ गिनाकर.. दूसरे धर्म से अंतर करके आप अपने मन में अपने धर्म के लिए जो इमारत खड़ी कर रहे हैं उसको लुढ़कने में 2 sec भी नहीं लगने.. बाकी तो समझदार पूरी दुनिया है ही.. है कि नहीं ?"

इसी थ्रेड के नीचे तब की एक मुस्लिम लड़की दोस्त का रिप्लाई आया हुआ है- अगर ऐसी पोस्ट हम लिखेंगे तो कमेंट आएगा "तुम्हें कोई दिक्कत है तो निकल जाओ पाकिस्तान" 



तो तो तो...

इसका फ़िल्म से कुछ लेना देना है क्या Mantuuu? हां.. फ़िल्म में एक जगह रणवीर की पत्नी को पता चल जाता कि हम्ज़ा(रणवीर) हिंदुस्तानी है तब वह अपनी पत्नी से कहता है कि हमें तुम्हारे मुल्क से कोई दुश्मनी नहीं है हमें दिक्कत है इसमें रहने वाले दहशतगर्दों से.. जो भारत को नहीं देखना चाहते.


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रणवीर की एक्टिंग 🖤
जमील वाला ट्विस्ट 🤝
अर्जुन रामपाल के कैरेक्टर का पिता, जहांगीर 😆
फ़िल्म का स्क्रीनप्ले ✨
बैकग्राउंड म्यूजिक 💯
पुराने गाने को नए अंदाज में 🌻
आखिरी वाला सीन जब रणवीर घर लौटता है 🫂

और सबसे बढ़कर आदित्य धर 🫡

[मंटू, धर साब की इतनी तारीफ़ मत कर, अभी वो रिटायर नहीं हुए हैं, आगे जाके अभी उनके भी कुछ ग़लत कर देने की गुंजाइश है]

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तो अब अपनी बात कर लूं ? तो ऊपर किसकी बात कर रहा था बे ?
Ok.

ख़ैर.. दीप्तांशु भईया की बात से ही इस पोस्ट को ख़त्म किया जाए.

आज दीप्तांशु भईया ट्विटर पर लिखे भी कि

मरना तो इस जहां में कोई हादसा नहीं, 
इस दौर-ए-नागवार में जीना कमाल है! ~ ग़ुलाम हसन.

तो वही.. मर जाना कोई बड़ी बात नहीं है Mantuuu..
मरने से पहले ऐसे ही जीते रहो.. तब बात बने... अभी दोपहर तक आए हो जीवन में, शाम तक ध्यान रखना, घर लौट भी जाना है. बिना जाने कि अगले ही दिन क्या होने वाला है जो भी आए, जो भी न आए... उसको भरपूर जियो.. क्योंकि असल बात जीने की ही है. असल बात जीवन जीने की है.

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सोमवार, मार्च 23, 2026

मारिया रिल्के, गुलाब और गांव रारोन.

रेनर मारिया रिल्के लिखते हैं जब कि

"अपने हृदय की हर उस बात के प्रति धैर्य रखें जो अभी अनसुलझी है। उन अनकहे सवालों से ही प्रेम करने की कोशिश करें, ठीक वैसे ही जैसे वे कोई 'बंद कमरे' हों या किसी 'विदेशी भाषा' में लिखी गई रहस्यमयी किताबें।
अभी जवाबों की तलाश न करें। वे आपको अभी मिल भी नहीं सकते, क्योंकि अभी आप उन्हें 'जी' नहीं पाएंगे। और असल बात तो सब कुछ जीने की ही है।इस वक्त, आप बस उन सवालों को जीएं। शायद भविष्य के किसी अनजाने दिन, आपको पता भी न चले और आप धीरे-धीरे खुद को उन जवाबों के भीतर सांस लेते हुए पाएंगे।"

तो रेनर मारिया रिल्के (1875–1926) केवल एक कवि नहीं, बल्कि आधुनिक साहित्य के सबसे रहस्यमयी और प्रभावशाली दार्शनिकों में से एक थे। इनकी माँ ने अपनी एक बेटी को खो दिया था। उस दुख में उन्होंने रिल्के के बचपन के शुरुआती पांच वर्षों तक उन्हें एक लड़की की तरह पाला। उन्हें लड़कियों के कपड़े पहनाए जाते थे।

रिल्के का मानना था कि सच्ची रचनात्मकता केवल 'एकांत' (Solitude) में ही जन्म ले सकती है। उन्होंने अपना अधिकांश जीवन अकेले यात्रा करते हुए या मित्रों के महलों और किलों में रहकर बिताया। 
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ज्ञान केवल शब्दों में नहीं होता, कुछ सच्चाइयाँ केवल अनुभव के माध्यम से ही समझ आती हैं। नहीं ? हमारे आपके मानने से क्या होता है ? मेरे मानने से लेकिन सबकुछ होता है। मेरी दुनिया में मेरा सबकुछ है, मेरे ईश्वर भी।

नवम्बर 2020 में लिखी हुई मेरी एक कविता जैसा कुछ मिला ट्विटर पर.. पढ़ना चाहेंगे.. नहीं ? Hehe.. नहीं पढ़ने का ऑप्शन है आपके पास ?


कविता में 'कविता' उतनी ही रहे
उदास लड़की में खिलखिलाने की संभावना उतनी ही रहे
जीवन से मायूसी उतनी ही दूर रहे
सिरहाने से किसी पसंदीदा किताब की वफ़ा उतनी ही रहे
ख़रगोश में बिल्ली से और बिल्ली में कुत्ते से बच जाने की हुनर उतनी ही रहे..
..जितनी कि सर्दियों की चाय में अदरक रहती है।
फिजिकल मैप में नीले रंग की ज़रूरत
रसोई में खिड़की की ज़रूरत
गर्मी में शाम और सर्दी में दोपहर की ज़रूरत
उदास तन्हा खाली आसमान में चाँद की ज़रूरत
दिल्ली में चाँदनी चौक की ज़रूरत
अफ़्रीका में टिम्बकटू की ज़रूरत..
...जितने ज़रूरी मसले ही जीवन की आपाधापी में खो जाते हैं!
दो लड़कियाँ झाँकती हैं परदे के किनारे से
सड़क के उस पार जाते नौजवान लड़के को जैसे
जैसे मंदिर के जलते दिए की लौ देखते हुए
बच्चे की कान में मस्जिद से उठती अजान की आवाज समा जाती है
जैसे माँ में बची रहती है 'माँ', चाहूँगा मैं भी 
कि तुम्हारी हँसी में भी उतना ही 'तुम्हारापन' बचा रहे
एक लड़की जब मिली मुझसे तो वो लड़ रही थी अपने स्वप्नों के लिए
जबकि 29 साल की उम्र में लड़कियाँ क्या करती हैं किसे नहीं पता ?
तब जाना मैंने कि दुनिया में कुछ चीज़ें बहुत पवित्र होती हैं
मसलन नदियों का बहना, फूलों का खिलना, हवा का चलना
चाय का कप में जा टिकना और स्वप्न के लिए लड़ना.
पिता जब मुझे टाफियाँ देते थे और बहुत सोचकर कुछ पैसे भी
तब माँ ओझल होकर देख रही होती थीं
पिता की आँख में उमड़ आए संकोच भरे प्यार को.
"तुमने ही बिगाड़ा है इसे" की जब उलाहना देते हुए
पिता, पृथ्वी रूपी माँ के लिए गर्मी के सूरज जैसा बनें तब
मुझे स्वाद मिला उन टाफियों के

हम्ममम...

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तो
रेनर मारिया रिल्के हैरानी की बात यह है कि दुनिया को जीवन जीने का तरीका सिखाने वाले का अपना कोई स्थायी घर नहीं था। वे पूरी ज़िंदगी एक बंजारे की तरह रहे। वे यूरोप के अलग-अलग शहरों-पेरिस, म्यूनिख, वेनिस और स्विट्जरलैंड के किलों में अतिथि बनकर रहे।

रिल्के की मृत्यु की कहानी भी उनकी कविताओं जैसी ही अजीब और दुखद है। कहा जाता है कि एक बार एक महिला मित्र के लिए गुलाब चुनते समय उनके हाथ में एक काँटा चुभ गया। उस मामूली घाव से उन्हें संक्रमण हो गया, जो बाद में 'ल्यूकेमिया' के रूप में सामने आया और उनकी मृत्यु का कारण बना। उनके चाहने वाले कहते हैं कि रिल्के को उनके पसंदीदा फूल 'गुलाब' ने ही ले लिया।

अपनी मृत्यु से पहले उन्होंने ख़ुद अपनी समाधि के लिए ये पंक्तियाँ लिखी थीं, जो आज भी उनकी कब्र पर पर लिखी हुई है-

Rose, oh reiner Widerspruch, Lust, Niemandes Schlaf zu sein unter so viel Lidern.
(गुलाब, ओ शुद्ध अंतर्विरोध, इतनी सारी पलकों के नीचे किसी की नींद न होने का आनंद।)


हम्ममम....
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गर्मी आ गई है तो मेरा ज़्यादातर महीने गंजा रहना तय है। कुछ दिन पहले ही गंजा होने का सोचा था, किसी ने मना किया तो मान गया.. फिर भी मन में था कि नहीं नहीं Mantuuu गंजा हो जा.. कोई और क्या कह रहा इससे तुझे क्या मतलब ?
कल बाल कटवाने गया तब तक डिसाइड नहीं था कि गंजा होना है या बाल कटवाना है.

कुर्सी पर बैठे बैठे कानों तक टीवी पर चल रही फ़िल्म की आवाज़ आई, अल्लू अर्जुन-पूजा हेगड़े की कोई फ़िल्म चल रही थी, पिता बोलता है कि कुछ रिश्ते किराए के मकान जैसे होते आप कितना भी सजा के रखो उसे, एकदिन आयेगा जब उसे खाली करना होगा.

तो मैंने सोचा कि Mantuuuye गंजा मत हो.. ऐसे ही दौड़ दौड़ के इतना पतला कर लिया है ख़ुद को कि दिन भर में 2-3 लोग टोक दे रहे कि तबियत ख़राब हो गई थी क्या। गंजे सिर में तू 15 से भी कम का लगेगा..मत हो और बारिश हुई है ठंड बढ़ी है.. सर पर फसल रहने दे.. ये सब ख़ुद को मनाया जा रहा था कि गंजा होना या ना होना तेरा ही फैसला है किसी के कहने से तू रुक नहीं गया है 🫣



मेरे लिए दुनिया का सबसे वाहियात काम बाल कटवाना है और 
मेरे मन का न होने पर किसी और कहा मानना
पर इस बार मेरा ही मन हुआ कि गंजा होना टाल मंटू..
अब क्या पता मेरा मन हुआ या मेरा मन बनाया गया.. जो भी.


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तो रेनर मारिया रिल्के साब ये बताओ कि

शुरू के 5 साल लड़की बन के बिताए इसका असर तुम्हारे बाकी के 46 साल के जीवन पर कितना पड़ा ? कैसे पड़ा ? क्यों पड़ा ? पड़ा या तुमने पड़ने दिया ?

इसका जवाब शायद न मिले पर इनके कब्र पर जाना होगा एक बार..
वही वही वही... कहां ? स्विट्जरलैंड के वैलिस कैंटन में स्थित रारोन नामक एक छोटे से गांव में जाना होगा Mantuuu. Ok. चले जाएंगे, कोई बड़ी बात नहीं है ये.

   

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🙂.

रविवार, फ़रवरी 15, 2026

O'Romeo झूमियों !

देखिए भई, मेरे पसंदीदा निर्देशकों में विशाल भारद्वाज शामिल हैं तो उनकी फ़िल्मों में रह गई कमियों पर ध्यान न जाना बहुत हद तक लाज़िमी है। पूर्वाग्रही (prejudice) माइंड ऐसे ही काम करता है। तो तो कहना यही है कि तभी आगे पढ़िए/देखिए.. नहीं तो और करने को कितना कुछ काम होगा ही जीवन में आपके, वो कीजिए :)


तो पहली बात तो मोतिहारी शहर की कर लेते हैं। कि छोटे से शहर में ये फ़िल्म रिलीज कैसे हुई ? मुझे ध्यान है जब 2014 में हैदर फिल्म (विशाल भारद्वाज की अबतक की सबसे पसंदीदा मेरी फ़िल्म) आई थी तब मैंने सोचा था कि इसे देखने मुज़फ्फरपुर (यहां से 80km दूर) चला जाऊँ, नहीं जा पाया और अफ़सोस अब तक है कि हैदर जैसी फ़िल्म थिएटर में न देख पाया, ख़ैर।

संजय कॉम्प्लेक्स, पिछले कुछ साल पहले ही ओपन हुआ है और पहली फ़िल्म मैंने इसमें जवान देखी थी। और अंदर बाहर से देखकर लगता ही नहीं कि मोतिहारी शहर में ऐसा कुछ एक्जिस्ट कर सकता है वो भी तब जब ज़्यादा  पैसे के टिकट न लगते हों। पर अच्छी बात है। है ये यहां और ठीक है, हम जैसे फ़िल्मी कीड़ों के लिए। डॉल्बी एटमॉस साउंड सिस्टम है भाई और क्या चाहिए ?

                            

अब तक इसमें जवान, आर्टिकल 370, कांतारा 2, तेरे इश्क़ में, धुरंधर और अब ओ रोमियो देख चुका हूँ।
          

         


        

मैं हूँ.. शाम को ऐसे दिखा.... haha और दोपहर में ऐसे- 

         


       


      

           

फ़िल्म पर क्या ही बात करें, अच्छी है फ़िल्म... समय है, मूड कर रहा तो देख आइए।

सिनेमेटोग्राफी अच्छी है, जो कि विशाल भारद्वाज की फ़िल्मों में होती है। 

एक चीज़ जो खटकी कि सुपारी देकर मरवाने वाले पेशे में मारने वाला इंसान इतना अंदर घुस नहीं जाता टारगेट के और इतनी हिंसा केवल दिखाने के लिए दिखाई गई है। मारने वाला चुपके से मार के जान हथेली पर रख पतली गली से निकल लेता है, ढिंढोरा नहीं पीटता लेकिन वही ना, फ़िल्म है भई।

कुछ सीन्स वाक़ई अच्छे उतर आए हैं पर्दे पर। जब तृप्ति डिमरी रात में नाव पर बैठी तेरे ही लिए गुनगुनाती है या फ़िर क्लाइमेक्स से पहले शाहिद और तृप्ति का साथ में लिपटकर गन शॉट वाला सीन।

और पान की दुकान गाने की शुरुआत भी

और आशिक़ बने शाहिद के सामने जब एक मोहतरमा उन्हें प्लीज करने की कोशिश करती है तब शाहिद का ज़ोर ज़ोर से रो देने वाला सीन.

अविनाश तिवारी के कैरेक्टर को स्पेन में ही रखा है, उसे इंडिया लाया जाता तो फ़िल्म आधे घंटे और खींच जाती। तब उस केस में सीट के पीछे बैठा एक बंदा गरिया ही देता फ़िल्म बनाने वाले को। इरफ़ान साहब होते तो शायद विशाल उन्हें ये अविनाश वाला रोल देते उन्हें। 

"इश्क़ का फीवर" गाने में तृप्ति और शाहिद के चेहरे का क्लोजअप शॉट 💕

जिस मैसेज को देने के लिए तमन्ना भाटिया जी फ़िल्म में हैं, वो मक़सद अच्छे से पूरा हुआ है। ज़्यादातर बारी अमूर्त बातें, कमर्शियल सिनेमा के लिए नहीं होती हैं। विशाल भारद्वाज ये चीज़ समझते होंगे पर अपनी फ़िल्म में इससे बचते हुए दिखते नहीं हैं। अब यहां ये मुद्दा उठ सकता है कि फ़िल्म को निर्देशक अपने मन के लिए बना रहा है या दर्शकों के लिए ? अपने मन के लिए बना रहा है तब तो वो कुछ भी बनाए, दिखाए, फ़िर उसे ये उम्मीद छोड़ देनी होगी कि वीकेंड पर कितनी कमाई हुई और कितने करोड़ के क्लब में शामिल हुई या नहीं।

            
          


           
इंटरवल हो गया है। फर्स्ट हाफ ok ok है। 


अब जो चीज़ मुझे जमी फ़िल्म में उसपर आते हैं.. 
ये दोनों शॉट देखिए
                
                

ये काठमांडू का दृश्य है। और लगा जैसे कि अभी मैं थियेटर से निकलूं और चल दूं काठमांडू घूमने 😆

कुल मिलाकर- विशाल भारद्वाज के फिल्मोग्राफी और संगीत के मुरीद हैं तो देखी जा सकती है फ़िल्म। शाहिद और तृप्ति डिमरी साथ में अच्छे लग रहे। ...और 'पान की दुकान' गाने में दिशा पटानी भी जँच रहीं। सेकंड हाफ ज़्यादा अच्छा है। सारे गाने सुनने लायक हैं।

गुलज़ार साब, विशाल भारद्वाज की जोड़ी के लिए 🫡

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hmmmmmm..🐢।             14 फ़रवरी 2026 🫂

...दीवाने मोहब्बत के हैं जो है उनको पहला सलाम !

😊


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