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शनिवार, सितंबर 05, 2020

फ्रेंड रिक्वेस्ट

पहली नज़र का प्यार कहा जा सकता है। यश राज बैनर की फिल्मों की देन थी कि खेलने कूदने खाने की उम्र में प्यार-मोहब्बत की बातें। वहीं नदी, पहाड़, बारिश, झरने, छत, मैदान, पेड़ के नीचे हीरो-हीरोइन गाना बजाना और आँखें चार करना। नितिन का भी कुछ यूँ ही था ज्योति के साथ।

दोनों क्लास के टॉपर थे पर नितिन जानबूझ कर सवाल ग़लत कर आता और ज्योति को टॉप होने देता। राहुल 4th, नितिन के लिए 'रांझणा' के मुरारी जैसा। 4th इसलिए कि क्लास में चार राहुल थे। कहने के लिए राहुल और नितिन पक्के जिगरी। एक को काटो तो दूसरे से खून निकलता टाइप।

राहुल जानता था कि नितिन ज्योति के लिए मरा जा रहा है। ज्योति भी जानती थी। क्लास में सभी जानते थे। श्वेता जो ज्योति की जिगरी थी, इस प्रेम-कहानी की विलेन बनी जैसे यश राज बैनर की फिल्मों में लड़की का पिता विलेन बनता है। मोहब्बत पर बने गाने को ज्योति से जोड़कर गाया जाने लगा।

राहुल छोटी से छोटी उम्मीद की किरण खोज लाता कि भाई वो भी चाहती है। नितिन के पर उगे, वो श्वेता की नज़रों से बचकर ज्योति के साथ उड़ने के सपने देखता। उसने ज्योति से उसकी फोटो माँगी पर ज्योति ने मना कर दिया। कई दिन ऐसा चलता रहा तब राहुल के दबाव से वो मुक़ाम आया जो हर प्यार में आता ही है।

एक दिन तय हुआ कि मिशन को अंजाम दिया जाए। पेज फाड़ा गया, दिल बनाया गया, आई लव यू लिखा गया, शायरी लिखने की योजना स्थगित करके नीचे नाम में लिखा गया- नितिन। और साथ में 'यस' और 'नो' ? भी लिखा गया। पर ये सब राहुल की हैंडराइटिंग में लिखा गया और चुपके से ज्योति के बैग में रख दिया गया।

पढ़े जाने के पहले तक नितिन-राहुल के दिल में धुकधुकी शुरू। ज्योति ने अकेले में पढ़ा और बिना कुछ बोले, बिना फाड़े प्रेमपत्र खिड़की से बाहर फेंक दिया। पर ज्योति की चुप्पी ने नितिन की धुकधुकी को और बढ़ा दिया। श्वेता सोचती रही माज़रा क्या है।

राहुल नितिन को बधाई देने लगा। ज्योति मॉनिटर होने के नाते क्लास चुप कराने लगी। हिंदी वाले मास्टर साब पढ़ाने कम अपना रोना रोने के लिए आ गए। मौसम बदल गया अचानक। वॉयलिन बजने की आवाज़ सिर्फ़ नितिन को सुनाई देने लगी।

कईं दिनों तक नितिन इशारों में ज्योति से पूछता रहा 'यस' और 'नो' ? कभी ब्लैकबोर्ड पर लिख आता, कभी उसकी कॉपी में, कभी बेंच पर, कभी खेलते टाइम ग्राउंड में। ज्योति देख लेती पर कहती कुछ नहीं। इसे नितिन 'यस' ही समझता और यश राज बैनर की फिल्में ख़ूब देखता और राहुल के सामने एक्टिंग करता।

एक दिन खो-खो में राहुल की टीम जीत गयी और उसने ज्योति-श्वेता को चिढाना शुरू कर दिया। इसका बदला कैसे लिया जाए इस उलझन में श्वेता, ज्योति को बिना बताए खिड़की के बाहर गयी, उठा लाई प्रेमपत्र और क्लास टीचर के सामने रख दिया। अब राहुल-नितिन के दिल में एकदम अलग टाइप की धुकधुकी शुरू हो गयी।

क्लास टीचर कतई ब्योमकेश बक्शी बन गया। 

श्वेता से पूछा- "किसने किसके लिए लिखा है ये?"

श्वेता- "नितिन ने ज्योति के लिए।"

टीचर- "नितिन इधर आओ।"

नितिन धुकधुकी लिये सर के पास गया।राहुल धुकधुकी लिये बेंच में घुसने लगा। 

टीचर- "तुमने लिखा?"

नितिन- "नहीं सर,मैंने नहीं।" 

टीचर- "नाम तो तुम्हारा हैं?"

अब बोलने की बारी ज्योति की थी। 

 ज्योति- "सर ये हैंडराइटिंग राहुल की है।"

राहुल, नितिन से ज्यादा धुकधुकी लिये गाल पर हाथ रखे सर के पास पहुँचा। 

श्वेता- "सर, हैंडराइटिंग राहुल की है पर नितिन ने ज्योति के लिए लिखवाया है।"

नितिन- "नहीं सर, मैं कुछ जानता ही नहीं।"

ज्योति एकदम चुप...

क्लास टीचर ने पहले नितिन को एक चाँटा जड़ा। राहुल की धुकधुकी दो झन्नाटेदार चाँटा पड़ने के बाद कम हुई। ज्योति, नितिन को देखती रही, श्वेता मुस्कुराई और पूरी क्लास का मनोरंजन तो हो ही रहा था।

पूरे माज़रे में नितिन बेदाग निकला। सोचता रहा यश राज बैनर की फिल्मों में ऐसी सिचुएशन को हैंडल करना बताया ही नहीं था। राहुल को मिड टर्म देने से रोक दिया गया और 3 महीने के लिए स्कूल-निकाला दे दिया गया। श्वेता और ख़ुश हो सकती थी पर 'नितिन बच गया' ये बात उसकी ख़ुशी में कटौती कर देती थी।

ज्योति जो कभी इक़रार नहीं कर पाई और देर-सवेर नितिन को 'यस' कह ही देती पर अब सोचती है कि नितिन झन्नाटेदार चाँटे नहीं खा सकता तो आगे क्या ही कर सकता है उसके लिए। नितिन अब यश राज बैनर के बजाय अनुराग कश्यप की फिल्में देखता है। सवाल भी ग़लत करके नहीं आता।

श्वेता सोचती है कि 3 महीने कब बीतें कि राहुल को सॉरी बोला जाए। 


अगले साल बोर्ड के एग्जाम में नितिन और ज्योति दोनों जिले के मेरिट लिस्ट में आए। अख़बार में दोनों की फोटो छपी और इस तरह नितिन के पास ज्योति की फोटो आ गई। जिसे वो कभी-कभार देख लेता है अब। दुआ कर लेता है...जगजीत सिंह को ख़ूब सुनता है!

बाद के दिनों में नितिन की लाइफ में जितनी भी लड़कियाँ आयीं, सब में नितिन, ज्योति को खोजता रहा। इस मलाल के साथ जीता रहा कि उसदिन सच बोल के झन्नाटेदार चाँटा खा लेता, 3 महीने के लिए स्कूल निकाला झेल लेता तो शायद!  ज्योति साथ होती..शायद! 

अब इस बात को अरसा हो गया।

 ...और अब किसी एक का एक के पास फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग है।


:)

शनिवार, सितंबर 22, 2012

तेरे बिना वो दोस्त..!



तेरे साथ...लम्बे रास्तों की फ़िकर ना थी...पर अब छोटे रास्ते...बड़े लम्बे से लगते हैं...और उन रास्तों पर...सूना पसरा है...तेरे बिना वो दोस्त..!
तेरे होने से...हर वो खुशी मिलीं...जो आज में...मेरे हर एक मुस्कुराहट की वजह है...मस्ती के हर रंग में वो चमक मिलीं...जो यक़ीनन फीकी और बेमतलब रह जाती...तेरे बिना वो दोस्त..!
वो एक-दूसरे का काम करना...कभी घर से निकलकर स्कूल ना पहुँचना...हमेशा स्कूल लेट जाना...साथ में बेंत खाना...और क्लास के बीच में ही टिफ़िन खत्म करना...कभी पापा से डाँट सुनवाना....मेरा रूठना...फिर तेरा मनाने का वो अजीबोगरीब तरीका अपनाना...वो मस्ती-मजाक...सब याद है...पर अब वो यादें हैं...तेरे बिना वो दोस्त..!
आज हर कदम पर...हर सफर पर सोचता हूँ कि...तू होता तो ये करते...तू होता तो वो करते...लेकिन बस सोचता ही हूँ...और...एक कसक के साथ मुस्कुराहट झलक रहीं होती है चेहरे पर...तेरे बिना वो दोस्त..!
पहले हर खुराफ़ाती में अपना नाम आता था...हर वो काम करना जरुरी था...जिसमें केवल हमारी खुशी हों...आज आलम ये है कि...खुराफ़ाती का मतलब ही कहीं गुम है...तेरे बिना वो दोस्त..!
पहले दिन भर...धूप में क्रिकेट खेलते थे...साइकिल से रेस लगाते थे...घर से बहुत दूर निकल जाते थे...पर अब धूप से कोई वास्ता ना रहा...कहीं पर साइकिल देखता हूँ तो...जी ललचता है...घर से अब भी दूर हूँ पर...कुछ खोया-खोया सा लगता है...तेरे बिना वो दोस्त..!
तू बहुत याद आता है...जब अकेले में हँस रहा होता हूँ...जब अकेले में रो रहा होता हूँ...जब अकेले कहीं जा रहा होता हूँ...जब अकेले कुछ खा रहा होता हूँ...जब अकेले पढ़ रहा होता हूँ...जब कुछ भी नही कर रहा होता हूँ...अब तू ना सही पर तेरा एहसास तो है...तेरे बिना वो दोस्त..!
यह चेहरा जो कभी हँसता था...आज इसको भी उदास होने की जरुरत पड़ती है...तेरे बिना वो दोस्त..!
तेरे साथ खुशी का हर पल था...गम का साया कहीं दूर-दूर तक नहीं...आज खुशी के पल गिन लेते हैं...और...गम ने दिया है साथ हर घड़ी...तेरे बिना वो दोस्त..!
अब सोचता हूँ कि...काश !...वो खुशी भरे दिन...हम साथ ना बिताते तो...आज यूँ...मन को तड़पना ना पड़ता...बिन आंसू के रोना ना पड़ता...तेरे बिना वो दोस्त..!
आज बेशक तेरे साथ नही...पर महसूस करता हूँ रोज तुझे...और नज़र उसी राह पर आश लगाए,इस ताक में है कि एक दिन तू आकर...मेरा हाथ थाम लेगा...क्यूंकि...मै कुछ भी नहीं...तेरे बिना वो दोस्त..!

                                                                                     - "मन"