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शनिवार, सितंबर 05, 2020

फ्रेंड रिक्वेस्ट

पहली नज़र का प्यार कहा जा सकता है। यश राज बैनर की फिल्मों की देन थी कि खेलने कूदने खाने की उम्र में प्यार-मोहब्बत की बातें। वहीं नदी, पहाड़, बारिश, झरने, छत, मैदान, पेड़ के नीचे हीरो-हीरोइन गाना बजाना और आँखें चार करना। नितिन का भी कुछ यूँ ही था ज्योति के साथ।

दोनों क्लास के टॉपर थे पर नितिन जानबूझ कर सवाल ग़लत कर आता और ज्योति को टॉप होने देता। राहुल 4th, नितिन के लिए 'रांझणा' के मुरारी जैसा। 4th इसलिए कि क्लास में चार राहुल थे। कहने के लिए राहुल और नितिन पक्के जिगरी। एक को काटो तो दूसरे से खून निकलता टाइप।

राहुल जानता था कि नितिन ज्योति के लिए मरा जा रहा है। ज्योति भी जानती थी। क्लास में सभी जानते थे। श्वेता जो ज्योति की जिगरी थी, इस प्रेम-कहानी की विलेन बनी जैसे यश राज बैनर की फिल्मों में लड़की का पिता विलेन बनता है। मोहब्बत पर बने गाने को ज्योति से जोड़कर गाया जाने लगा।

राहुल छोटी से छोटी उम्मीद की किरण खोज लाता कि भाई वो भी चाहती है। नितिन के पर उगे, वो श्वेता की नज़रों से बचकर ज्योति के साथ उड़ने के सपने देखता। उसने ज्योति से उसकी फोटो माँगी पर ज्योति ने मना कर दिया। कई दिन ऐसा चलता रहा तब राहुल के दबाव से वो मुक़ाम आया जो हर प्यार में आता ही है।

एक दिन तय हुआ कि मिशन को अंजाम दिया जाए। पेज फाड़ा गया, दिल बनाया गया, आई लव यू लिखा गया, शायरी लिखने की योजना स्थगित करके नीचे नाम में लिखा गया- नितिन। और साथ में 'यस' और 'नो' ? भी लिखा गया। पर ये सब राहुल की हैंडराइटिंग में लिखा गया और चुपके से ज्योति के बैग में रख दिया गया।

पढ़े जाने के पहले तक नितिन-राहुल के दिल में धुकधुकी शुरू। ज्योति ने अकेले में पढ़ा और बिना कुछ बोले, बिना फाड़े प्रेमपत्र खिड़की से बाहर फेंक दिया। पर ज्योति की चुप्पी ने नितिन की धुकधुकी को और बढ़ा दिया। श्वेता सोचती रही माज़रा क्या है।

राहुल नितिन को बधाई देने लगा। ज्योति मॉनिटर होने के नाते क्लास चुप कराने लगी। हिंदी वाले मास्टर साब पढ़ाने कम अपना रोना रोने के लिए आ गए। मौसम बदल गया अचानक। वॉयलिन बजने की आवाज़ सिर्फ़ नितिन को सुनाई देने लगी।

कईं दिनों तक नितिन इशारों में ज्योति से पूछता रहा 'यस' और 'नो' ? कभी ब्लैकबोर्ड पर लिख आता, कभी उसकी कॉपी में, कभी बेंच पर, कभी खेलते टाइम ग्राउंड में। ज्योति देख लेती पर कहती कुछ नहीं। इसे नितिन 'यस' ही समझता और यश राज बैनर की फिल्में ख़ूब देखता और राहुल के सामने एक्टिंग करता।

एक दिन खो-खो में राहुल की टीम जीत गयी और उसने ज्योति-श्वेता को चिढाना शुरू कर दिया। इसका बदला कैसे लिया जाए इस उलझन में श्वेता, ज्योति को बिना बताए खिड़की के बाहर गयी, उठा लाई प्रेमपत्र और क्लास टीचर के सामने रख दिया। अब राहुल-नितिन के दिल में एकदम अलग टाइप की धुकधुकी शुरू हो गयी।

क्लास टीचर कतई ब्योमकेश बक्शी बन गया। 

श्वेता से पूछा- "किसने किसके लिए लिखा है ये?"

श्वेता- "नितिन ने ज्योति के लिए।"

टीचर- "नितिन इधर आओ।"

नितिन धुकधुकी लिये सर के पास गया।राहुल धुकधुकी लिये बेंच में घुसने लगा। 

टीचर- "तुमने लिखा?"

नितिन- "नहीं सर,मैंने नहीं।" 

टीचर- "नाम तो तुम्हारा हैं?"

अब बोलने की बारी ज्योति की थी। 

 ज्योति- "सर ये हैंडराइटिंग राहुल की है।"

राहुल, नितिन से ज्यादा धुकधुकी लिये गाल पर हाथ रखे सर के पास पहुँचा। 

श्वेता- "सर, हैंडराइटिंग राहुल की है पर नितिन ने ज्योति के लिए लिखवाया है।"

नितिन- "नहीं सर, मैं कुछ जानता ही नहीं।"

ज्योति एकदम चुप...

क्लास टीचर ने पहले नितिन को एक चाँटा जड़ा। राहुल की धुकधुकी दो झन्नाटेदार चाँटा पड़ने के बाद कम हुई। ज्योति, नितिन को देखती रही, श्वेता मुस्कुराई और पूरी क्लास का मनोरंजन तो हो ही रहा था।

पूरे माज़रे में नितिन बेदाग निकला। सोचता रहा यश राज बैनर की फिल्मों में ऐसी सिचुएशन को हैंडल करना बताया ही नहीं था। राहुल को मिड टर्म देने से रोक दिया गया और 3 महीने के लिए स्कूल-निकाला दे दिया गया। श्वेता और ख़ुश हो सकती थी पर 'नितिन बच गया' ये बात उसकी ख़ुशी में कटौती कर देती थी।

ज्योति जो कभी इक़रार नहीं कर पाई और देर-सवेर नितिन को 'यस' कह ही देती पर अब सोचती है कि नितिन झन्नाटेदार चाँटे नहीं खा सकता तो आगे क्या ही कर सकता है उसके लिए। नितिन अब यश राज बैनर के बजाय अनुराग कश्यप की फिल्में देखता है। सवाल भी ग़लत करके नहीं आता।

श्वेता सोचती है कि 3 महीने कब बीतें कि राहुल को सॉरी बोला जाए। 


अगले साल बोर्ड के एग्जाम में नितिन और ज्योति दोनों जिले के मेरिट लिस्ट में आए। अख़बार में दोनों की फोटो छपी और इस तरह नितिन के पास ज्योति की फोटो आ गई। जिसे वो कभी-कभार देख लेता है अब। दुआ कर लेता है...जगजीत सिंह को ख़ूब सुनता है!

बाद के दिनों में नितिन की लाइफ में जितनी भी लड़कियाँ आयीं, सब में नितिन, ज्योति को खोजता रहा। इस मलाल के साथ जीता रहा कि उसदिन सच बोल के झन्नाटेदार चाँटा खा लेता, 3 महीने के लिए स्कूल निकाला झेल लेता तो शायद!  ज्योति साथ होती..शायद! 

अब इस बात को अरसा हो गया।

 ...और अब किसी एक का एक के पास फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग है।


:)

बुधवार, जनवरी 30, 2019

चंदन और वो जीभ वाली लड़की

एक लड़का था और ये एक कहानी है तो लड़के का नाम रख देते हैं, मोहन ? मदन ? सावन ? चंदन ? हाँ चंदन ठीक है, कुछ-कुछ 'गुनाहों के देवता' के 'चंदर' से मिलता है ये चंदन।

तो चंदन लड़का था, उम्र 22 साल, रंग-हल्का साँवला और मुस्कुराता तो वो हल्कापन भी ग़ायब हो जाता। गाने नहीं सुनता था और गली के कुत्तों से डरता था। पूर्णिमा के दिन चाँद पर जाने की ख़्वाहिश रखता था और अमावस के दिन माँ के लाख कहने पर खाना नहीं खाता था।

अज़ीब था न चंदन ? पर उसके इस रवैये के लिए ज़िम्मेदार थी वो एक लड़की जो उसके स्कूल के दिनों में 7वीं क्लास में मिली थी।चंदन उसे पसंद करता और लड़की उसे चोरी-चोरी देखती। खो-खो खेलते वक़्त लड़की हमेशा चंदन के अपोजिट टीम में रहना पसंद करती और हर बार जीतने के बाद चंदन को सर के पीछे मारती और जीभ निकाल के कहती
"हार गया फ़िर तू, मेरा दिल कैसे संभलेगा तेरे से ?"
चंदन कहता
"जीभ अंदर कर, सर देख रहे हैं"
लड़की कहती
"फट्टू"
चंदन कहता
"__________"

8th में जब दोनों थे तब चंदन ने अपने उस दोस्त से चिट्ठी लिखवाई जिसकी लिखावट के लिए लड़की जान छिड़कती थी और चिठ्ठी में लिखवाया कि

"I love you, तुम्हारे हाँ के इंतज़ार में ~ चंदन"

और चिठ्ठी को उस जीभ वाली लड़की के बैग में डाल आया।उस दिन खो-खो में पहली बार चंदन वाली टीम जीत गई और लड़की को जीभ निकालने का मौका न मिला।

और फ़िर कभी लड़की को जीभ निकालने का मौका मिला ही नहीं। चंदन को अगले दिन क्लास में पता चला कि बीते दिन को शाम में लड़की का पैर फिसल गया और वो छत से नीचे गिर के अपनी जीभ के साथ ग़ुम हो गयी हमेशा के लिए।

चंदन अब गाने सुनने लगा, लड़की को पंकज उदास के गाने पसन्द थे, चंदन पंकज उदास की ग़ज़लों को सुनने लगा और गली के कुत्तों का डर उसके मन से जाता रहा। पूर्णिमा के दिन घर से बाहर नहीं निकलता और अमावस को रात भर छत पर आसमान को निहारता और सोचता कि लड़की ने स्कूल से जाके बैग देखा होगा कि नहीं।

चंदन, बड़ा होता गया, कॉलेज में जा पहुँचा, मुस्कुराते वक़्त जो उसका साँवलापन कम हो जाता था, इस एक अदा पर लड़कियाँ फिदा हो जाती थी। पर चंदन के लिए ये अभिशाप था। चंदन हर लड़की में उसी जीभ वाली लड़की को ढूँढता, किसी नई लड़की के साथ दो दिन बिताता और जीभ वाली लड़की को हर लड़की में ढूँढता और तीसरे दिन जानबूझ के चंदन उस लड़की से लड़ाई करके उसे अपनी ज़िंदगी से बेदख़ल कर देता। रात को उस दिन पंकज उदास को सुनता और कविताएँ लिखकर उस पन्ने को जला देता। आधे-अधूरे चाँद को गालियाँ देता और उस रात पलंग के नीचे सो जाता।

कॉलेज कम्पलीट होने के बाद, चंदन शिमला रहने चला गया था, उसकी माँ ने कहा था कि हनुमान जी के पास ज़रूर जाना जो कि शिमला में  "जाखो जी" के नाम से प्रसिद्ध है। चंदन बेमन से गया भी और जाखो जी के मंदिर में उसे वह जीभ वाली लड़की दिख गयी। जीभ वाली लड़की ने भी देर तक चंदन को देखा और फ़िर दोनों साथ में ही, बिना एक भी लफ्ज़ बोले, हाथों में हाथ दिए, पहाड़ से नीचे उतरे और उस रेस्टोरेंट में गए जहाँ चंदन की माँ और पिता पहली बार मिले थे।

चंदन को दो दिन चाहिए था उस नई लड़की में जीभ वाली लड़की को खोजने के लिए, पर 11 दिन बीत गए और चंदन परेशान रहने लगा कि ये सचमुच वही जीभ वाली लड़की तो नहीं है, मैं इससे लड़ाई क्यों नहीं करके इसे अपनी ज़िंदगी से बेदख़ल कर रहा हूँ ?

चंदन की परेशानी उसकी माँ समझ गयी और चंदन से कहा कि बात कराना उस लड़की से। लड़की ने चंदन की माँ से बात की और चंदन के माथे को चूम लिया। उस शाम को चंदन ने पहली बार सिगरेट पीने का फ़ैसला किया और ये पहली बात थी उसकी अब तक की ज़िंदगी की जो उसने अपनी माँ को नहीं बताया।

सिगरेट पीने लगा ख़ूब पीने लगा, जितना वो लड़की जीभ वाली लड़की के जैसे बनती जा रही थी, चंदन सिगरेट के और क़रीब जा रहा था। पंकज उदास को अब जगजीत सिंह और चंदन दास की ग़ज़लों ने पीछे छोड़ दिया। अब चंदन पन्ने को लेकर उसपर एकटक देखता कुछ लिखता नहीं और जलाकर उससे सिगरेट सुलगा लेता।

लड़की एक सुनहरे दिन को पूरा ही जीभ वाली लड़की में तब्दील हो गई और चंदन पूरा ही मानसिक संतुलन खो बैठा। सिगरेट जलाने और पीने तक के दरम्यान ही वो होश में रहता और बाकी टाइम पागलों जैसी हरकतें करता, भिखारियों के साथ खो-खो खेलता और उनसे हारकर उन्हें ही जीभ दिखाता। सड़क पर "I love you तुम्हारे हाँ के इंतज़ार में ~चंदन" लिखता रहता और ट्रैफिक पुलिस वालों की गालियाँ सुन के पूर्णिमा की रात में वहीं गालियाँ चाँद को देता और जीभ वाली नई लड़की को भी।

जीभ वाली नई लड़की, चंदन की माँ से बात करती और उन्हें आश्वस्त करती कि चंदन ठीक है और समय से दवाई ले लेता है, नींद भरपूर आती है उसे और अब मुस्कुराता है तो उसका साँवलापन ज़्यादा कम हो जाता है।

माँ, रामायण का पाठ दिन में ज़्यादा समय तक करने लगी और लड़की को ठीक से समझाया कि वो चंदन को उस रेस्टोरेंट के क़रीब कभी न जाने दे जहाँ पहली बार वो चंदन के नेकदिल पिता से मिली थी। लड़की ने कभी भी चंदन को उस रास्ते पर नहीं जाने देती जिस रास्ते पर वो रेस्टोरेंट था।

एक रात को लड़की की आँख जल्दी लग गयी और उसने देखा कि चंदन सुकून से सो रहा है तब बेफ़िक्र होके वो भी सो गई।
अगली सुबह उठी तो चंदन ग़ायब। वो भागते हुए उसी रास्ते पर गयी जहाँ रेस्टोरेंट था, दूर से उसे भीड़  और अपनी धड़कन थमती नज़र आई। पास जाकर देखा तो चंदन औंधे मुँह गिरा पड़ा था और सर के पीछे का हिस्सा फट गया था, जहाँ कभी जीभ वाली लड़की खो-खो में चंदन को हराने के बाद मार देती थी। चंदन के एक हाथ में सिगरेट और दूसरे हाथ में चाँद के लिए गालियाँ लिखी थी और साथ में

"I love you तुम्हारे हाँ के इंतज़ार में~चंदन"

चौथे मंजिल से कूदा था चंदन जबकि उसे याद है कि जीभ वाली लड़की दूसरी मंजिल से गिरी थी ग़लती से।

जीभ वाली नई लड़की, 10 मंजिल के अपार्टमेंट में अपनी बड़ी दीदी के साथ रहती थी। चंदन की माँ 'रामायण' ख़त्म कर लेंगी तो 'गीता' शुरू करेगी।

चंदन के नेकदिल पिता चंदन के नाम से खो-खो खेल में रुचि रखने वाली केवल लड़कियों के लिए अकेडमी खोलेंगे।

चंदन दास और जगजीत सिंह की ग़ज़लें, पंकज उदास की ग़ज़लों से मुक़ाबला करती रहेंगी हमेशा

"और आहिस्ता
कीजिए बातें
धड़कने कोई सुन रहा होगा...

लफ़्ज़ गिरने न पाए होंठों से
वक़्त के हाथ इनको चुन लेंगे
कान रखते हैं ये दरों-दीवार
राज की सारी बात सुन लेंगे

और आहिस्ता...कीजिए बातें"

:)

रविवार, सितंबर 28, 2014

यही ज़िन्दगी है

ज़िन्दगी !
अजनबी राहें
दो राही
हाथ पकड़
साथ-साथ चलना
पर
अंधेरों के दस्तक देते ही
हाथ की पकड़ ढीला होते जाना
यहीं ज़िन्दगी है?

एक नदी
दो किनारा
कोई तिनका नहीं
दोनों एक-दूजे के लिए मांझी
पर
लहर के दस्तक देते ही
दोनों इस उम्मीद में कि
कोई तो आगे होके हाथ थामेगा
दोनों हांफने लगे
किनारा भी दूर..बहुत दूर है
यहीं ज़िन्दगी है?

लड़के ने कहा
एक दिन
लड़की से
"दोस्ती करोगे मुझसे"
वे दोनों चुपचाप चलते रहे
साथ-साथ
कहाँ?पता नहीं
यकायक
ढलता सूरज
दोनों से कहता है
"घर पर इंतजार हो रहा है तुम्हारा"
 यहीं ज़िन्दगी है?

लड़की ने कहा
एक दिन
लड़के से
"किसी के दिल टूटने की वजह
 मैं नहीं बनना चाहती
 पर हम जब-तक चाहेंगे
 तब-तक 'दोस्त' बने रहेंगे"
 यहीं ज़िन्दगी है?

फिर
लड़के ने
उसी रात
सपने में
लड़की से ये बोलता पाया
"देखो
ऐसा भी वक़्त जीवन में आता है,
जब अच्छा-खासा दोस्त भी दुश्मन बन जाता है
और
जब दोस्त दुश्मन बन जाये
तो
इन्सान को अर्श से फर्श पर आने में
वक़्त नहीं लगता"
यही ज़िन्दगी है?

लड़का सोचता है
उसे ताउम्र 'दोस्त' बन
उस लड़की के साथ रहना है
लड़की को पढना है
कि
आखिर किस भाषा में लिखी गई थी
वह लड़की !
यहीं ज़िन्दगी है?

लड़का सोचता है
कि
उसके सारे ख्वाहिशों को
लड़की
पंख तो दे नहीं सकती
फिर सोचता है
वो ख्वाहिशें सिर्फ उसके ज़ेहन की नहीं
लड़की भी तो आधे की हक़दार थी
बेखबर आवारा
वो लड़का
यहीं ज़िन्दगी है?

वह लड़का
पता नहीं
क्या-क्या सोचता गया
उलझता गया
लड़की बिखरती गई उसमें
साथ में वह खुद भी
पर
किसी मोड़ से
लौटकर वापस आ गया
लड़का शयद !
ख़ुद से मिल गया है वो शायद !
एक दिन
उगता हुआ सूरज
मुस्कुराकर
कहता है लड़के से
"घर पर अब इंतजार नहीं हो रहा तुम्हारा"
यहीं ज़िन्दगी है?



सामने दूर..बहुत दूर ही सही,
एक मंजिल तो है
एक नाव के लिए,
एक ही मांझी,तो है
मांझी नहीं तो
ख़ुद वो तो है ही
ख़ुद को किसी भी राह पर
ले जाकर
भटक कर
थक कर
फिर
लौट जाना
पर
अपने अन्दर के इन्सान को
जिंदा रखना
जी हाँ !
यहीं ज़िन्दगी है...

                                                                         - मन


बुधवार, दिसंबर 05, 2012

एक 'कल' के लिए...

कुछ बाकि है अभी भी,
कुछ कसक पूरे होने की...
जिसका इंतजार है,
हर बेजुबां तमन्ना को...
जहाँ खत्म हों बुझी-बुझी सी सुबह,
और तलाश है उस दिन की...

हर सुबह की उम्मीद में,
यूँ स्याह रातों का बीतना...
अधूरे सपनों की चुभन से, 
यूँ नींद,आँखों में भरना...
कि ये साजिश है वक्त की,
या खेल उन धुँधले लकीरों की...

कुछ वक्त की जोर से हुए पूरे,
कुछ ख्वाब रह गए अधूरे...
जहाँ खोकर आए हैं खुद को,
मुझे छोड़,खबर है सबको...
फ़िकर अब भी है,
उन अधूरे ख्वाबों की...
जिसके होने से मुझे इंतजार है,
एक सुनहरे कल की...

अब गम को पिघलना पड़ेगा ही,
राहें होंगी सीधी भी...
कि इंतजार है 
किसी मंजिल को,
एक-ना-एक दिन अपनी भी...

                           - "मन"

गुरुवार, अक्टूबर 11, 2012

एक उल्टी प्रेम-कहानी


वो लड़का हर बार की तरह इस बार भी उस लड़की से मिल रहा था...जैसे ये दोनों पहले अनगिनत बार मिल चुके थे...और गवाह...ये फिजाएँ...बहती हवा...वक्त...इनकी मुस्कुराहट...पेड़-पौधे...चहचहाती चिडियाएँ थी...
पर इस बार वक्त ने सबकुछ बदल दिया था...केवल इन दोनों को ही छोड़कर...
फिजाएँ खामोश थी...हवाएँ कुछ रुखी-रुखी से बेमन बहे जा रही थी...हिलते-डुलते पत्ते यूँ बेजान पड़े थे जैसे,इन्हें कोई मतलब ही नहीं है किसी से...वक्त रुक सा गया था...चिड़ियों का चहचहाना कही गुम था इनके ख़ामोशी के आगे...उन दोनों की चेहरे की हँसी,इन हवाओं के साथ कहीं दूर बह गई थी...और अगर हवाओं का रुख पलट भी जाए तो इनकी हँसी इनकी मुस्कुराहट बनने को किसी भी हाल में तैयार ना थी...दूर-दूर तक सूना पसरा था...और उनकी दिल की बातें बिन जुबां के सहारे लिए उनकी आँखें बता रही थी...
लड़की थोड़ी सहमी नज़र आती है...लड़का थोड़ा बेबस...दोनों आमने-सामने आते हैं...लड़का,लड़की की हाथ पकड़ता है...लड़की और सहम जाती है...लकड़ा हाथ छोड़ देता है...फिर लड़की थोड़ी दूर होकर खड़ी हों जाती है...लड़का और पास जाने की हिम्मत को दबा लेता है...फिर लड़के की आवाज,खामोशी का तोडती है वह लड़की की आँखों में देखते हुए पूछता है..."हमनें साथ में एक-एक पल बिताने की कसमें खाई थी और अब तुम जा रही हों छोड़ के मुझे...मेरे जिंदगी के उन कुछ रिश्तों में तुम थी जो मुझे अपना कहती थी,फिर अलविदा कैसे कह दिया...???" लड़की की नज़रे झुक जाती है...लड़का वैसे ही रहता है,जवाब सुनने के इंतजार में...
पर उस लड़के को शायद पता नही कि कुछ सवालों के जवाब,जुबां कभी नही दे सकती और ख़ामोशी सबकुछ कह जाती है...
फिर वो लड़की उस लड़के को छोड़ के जाने लगती है...मुड़ के भी नही देखती है...और लड़के कि हसरत भरी निगाहें...कुछ पानी की बूंदों का सहारा लेकर उसके गालों पर आने लगती है...वह एकटक देखता जाता है...उस लड़की को जाते हुए...अपने सामने से...अपने जिंदगी से...अपने वजूद से...अपने सजाए ख्वाब से...
फिर वो लड़का नीचे गिर जाता है................
और फिर अचानक उसकी नींद खुलती है...यह सबकुछ एक सपना था...घड़ी सुबह के पांच बजने का इशारा कर रही होती है...वो सपना उसे कुछ देर तक सोचने को मजबूर करती है...फिर वह अपने काम में लग जाता है...पर रह-रह के वह उसी सपने के बारे में सोचता है...यह उसके साथ कभी हुआ ही नही...फिर क्यूँ ये सपना, हकीकत में उसका पीछा नही छोड़ रही है...फिर वो सोचता है कि शायद आगे जाकर ऐसा कुछ हों...क्यूंकि ऐसा कहते है कि भोर का देखा हुआ सपना सच हों जाता है...लेकिन उसके लिए पहले उस लड़के को एक लड़की की जरुरत है...जो उसे इतना प्यार करें कि उसे छोड़ने का दर्द कुछ इस तरह से बयां हों सकें....

मंगलवार, अक्टूबर 09, 2012

सपने और पानी की बूँदें



सपने-जो आँखों में पनाह लिए...नाउम्मीदी से उम्मीदी तक...एक धागे का काम करती है...जिससे जिंदगी को जीने का एक जरिया मिलता है...और इसी के बदौलत अब-तक की जिंदगी मिली है....

पानी की बूँदें-बिन सावन आए...बगैर बादल के...घुमड़-घुमड़ के इन गालों पर चले आते हैं...ये जताने कि ये हमारे अपने हैं...कोई साथ दे या ना दे...हर खुशी...हर गम में...ये साथ खड़े होते हैं....

पर इन दोनों में समानता यह है कि...इनको पनाह मिलती है...आँखों में...जहाँ कोई किसी से कम नही...सपनों पर हमारा वश नही...और...ये पानी की बूँदें कभी खत्म होने का नाम ही नही लेती...इन दोनों का आना तय है...चाहें हर गम के बाद आए...या...हर खुशी के पहले....इन दोनों का होना उतना ही जरुरी है...जितना कि...एक-एक साँस है...इस छोटी-सी,खूबसूरत जिंदगी के लिए....

पर कभी-कभी यूँ भी होता है कि ये सपने...इन पानी की बूंदों को...आँखों से बेदखल करके...फ़िराक में रहती है अपना खुद का आशियाना बनाने में....पता नही क्यूँ????...पर उन सपनों को समझ में नही आता कि...सागर भी कम पड़ जाए इन कुछ बूंदों के आगे...और बूंदों को शायद ये पता नही कि...इन सपनों की कोई सीमा ही नही है....
                                                                                     
                                                                                                  - "मन"

गुरुवार, अक्टूबर 04, 2012

"ये जो हैं...सपने "

सपने...ये जो हैं सपने...
झूठे ही सही पर सच के करीब होते हैं
हर खुशी को समेटे नैनों तले,
गहरे जज्बात लिए होते हैं |
कुछ फर्क नही पड़ता,
आँखें खुली या बंद हों
इनका आना तय है
वजह चाहें हों ना हों |
ये आँखों में हैं बसते,
और हम इनसे जुदा नही...
कोई भी सपना यूँ ही,
बेमतलब तो नही आ सकता?
इनमें छुपी होती है,
हमारी सच्चाई...
बीते हुए कल की दास्तान...
और आने वाले कल की झलक...
कुछ सपने छोड़ जाते हैं
गहरे भँवर में फंसा के...
जहाँ सोचने पर मजबूर होना पड़ता है,
कहीं सच ना हों जाए ये सपने...
और कुछ आते हैं
उम्मीद का दामन पकड़े,
और हम चाहते हैं कि काश !
सच हो जाए ये सपने...
बेतरतीब आते हैं ये सपने...
बड़े अजीब होते हैं ये सपने...
और कभी-कभी इन्हें पूरा
करने की शर्त,
हमें ले जाती है बहुत दूर
जहाँ मिलता है सिर्फ दर्द का सहारा |
सभी आँखें इन्हें देखती है,हक भी है,
पर कितनों को स्वीकार है उन फासलों को
मिटाने में जो सपने और उसके सच्चाई के बीच हैं???
शायद इसीलिए कुछ सपने
बस रह जाते हैं बनकर एक और सपने...
                                     
                                     - "मन"