मंगलवार, जनवरी 27, 2026

श्राप


[जनवरी 2021, दिल्ली]

प्रिय _______!

कहाँ हो तुम ? ठीक हो ना... ये तो फॉर्मेलिटी है। ऊपरी तौर पर व्यक्त की गई मेरी खोखली चिंता। तुम जहाँ भी हो जैसी हो उस परिस्थिति को झेलो.. उसमें फँसने में तुमने भी तो कभी दिलचस्पी दिखाई थी, नहीं ? तो मन ख़ुश नहीं रहता होगा तो भी ख़ुद को धोखे में रखो और ख़ुश दिखो

तुम तुम हो मैं मैं हूँ। 20वीं सदी में हमें दुनिया के तमाम लोगों को छोड़कर एक दूजे से ही मोहब्बत हुई। हुई क्या ? तुम्हारा तुम जानो, मेरा मैं जानता हूँ। पता है ? मेरी जो चीज़ें पूरी तरह खो चुकी हैं, ये वे चीज़ें हैं जिन्हें मैंने जब खोया तो वे किसी और को मिली भी नहीं थीं..

गुज़र रहे लम्हों की तस्वीर आगे जाकर पीछे देखने पर ज़्यादा स्पष्ट दिखाई देती हैं। तो देखो, याद करो.. हमने प्यार ही किया था क्या ? मैं कविता-कहानी के लिए कच्चे माल की तलाश में था तुम अपने पहले प्रेम को भूल जाने के भरसक प्रयास में थी। तुम अपने पहले प्रेमी को भूल नहीं पाई इसलिए मुझे

ढेर सारा कच्चा माल मिल गया। तुम पर पहले प्रेम की बातें, छुअन, मलाल ये सब हावी नहीं होता तो मैं भी प्यार कर लेता, कच्चा माल कहीं और ढूंढ़ता। पर सबकुछ का तय है ना.. हम कुछ नहीं करते हैं.. हमें आगे जाकर चाय पीते हुए, सूरज को डूबते हुए, मन्नू भंडारी की कहानी पढ़ते हुए पीछे देखते हैं

और मैं मुस्कुराता हूँ कि मैं सफ़ल रहा तुम असफ़ल। पर तुम्हें भूलना क्यों नहीं आता है ? माना पहला प्रेम क़तई भूलने की चीज़ नहीं मगर मन के गहरे अतल में तो छुपा ही सकती हो, ये हुनर सीखो.. नहीं तो तुम्हारा अंत शायद अख़बार के तीसरे पन्ने के किसी कोने में छपी उस ख़बर में

ख़बर में हो जिसे कोई नहीं पढ़ता। यही सच्चाई है। हम सच नहीं स्वीकार करते और चमत्कार होने की उम्मीद लिये ऐसी लड़ाई में कूद जाते हैं जहाँ हार तय है। हार मान लेना हर बार डरपोक होने की कसौटी नहीं होती, पागल लड़की!

पता है ? अगर हम 15 मिनट बिना हिले-डुले बैठे या लेटे रहें तो सो जायेंगे

पढ़ती हो कि नहीं ? पढ़ा करो.. जब किसी और का सुख पढ़ोगी तो दुनिया पर और भरोसा कर पाओगी, उस दुनिया पर जिसमें मेरे जैसे लोग नहीं रहते। किसी का दुःख पढ़ोगी तो तुम्हारा दुःख कम प्रतीत होगा। पढ़ा करो.. व्यस्त रखो ख़ुद को... जो बेड़ियाँ हमें बहुत कसकर जकड़ती है ना ये वहीं बेड़ियाँ हैं

जिन्हें हमने कभी तोड़ दिया होता है। निराशा लाज़मी है। इसे स्वीकार करो। लाज़मी से याद आया आज कैफ़ी आज़मी साब का जन्मदिन भी है। इनके बारे में जानो, इनकी 'औरत' नज़्म पढ़ो। आज सकरात भी है। हमारे इधर 'खिचड़ी' कहते हैं इसे। आज सूर्य देव उत्तरायण में प्रवेश कर जायेंगे, सब अच्छा होगा अब

सब अच्छा होना चाहिए... मेरे पास शब्दों में देने लायक ही उम्मीद है कि अपने दुर्भाग्य के बारे में कभी निरीहता से मत देखो, क्योंकि तुम्हारे दुर्भाग्य के लिए थोड़े-थोड़े से सभी ज़िम्मेदार हैं।

चलो अब ख़त्म करता हूँ, ख़ुश रहो और मुझे थोड़ा-थोड़ा भूलती रहो

चाय ठंडी हो रही है। प्लूटो को भी चाय पीनी है मगर उसे देता नहीं हूँ तबतक जबतक कि उसकी इंतज़ार और व्याकुलता से भरी आँखों को देखकर मुझे किसी कविता-कहानी के लिए कोई कच्चा माल न मिल जाए। आज दिल्ली में घना कुहरा है, आज मुझे बहुत कुछ पढ़ना भी है, बहुत सारी फ़िल्में भी देखनी है :)


:)

सोमवार, जनवरी 05, 2026

चार जनवरी

 
              

                                     
               

                   
               

                     
               

                     
               

                   
               

                     
               

                                           
                


                   
               


चार जनवरी

मेरी उपस्थिति से
ऊबने वाली चीज़ों के पास विकल्प का अभाव
मुझे गुमान में रखती है कि मैं अच्छा कर रहा हूं- 
फ़िल्में देखता हूं
रोटी बना लेता हूं
पढ़ता हूं
जूते ढीले बांधता हूं
धूप में बैठकर मां के बारे में सोचता हूं
समय से सोकर, समय से उठता हूं
बोलने के क्रम में 
सोचने तक की सब्र से ख़ुद को भरना चाहता हूं
क्योंकि
फूलों और लोगों की भीड़ से लदी
घूम रही है अब भी धरती।
दुनिया की नज़र में आई मेरी
तमाम अच्छाइयों के बावजूद
मैं जी गया एक साल और
और मेरे प्रतीक्षा न करने पर भी
आने वाले कई और साल
जीता जाऊंगा ऐसे ही.. 
जैसे ठिठुरन के दिनों में चार जनवरी आ जाता है
जैसे फूल खिलते हैं,
जैसे दुनिया भर की माएं दुःख छिपाती हैं
जैसे लोगों की भीड़ बढ़ती है, 
और उनकी अच्छाइयां भी उनके बुराइयों के आसमान तले..

🙂

गुरुवार, जनवरी 01, 2026

जूते अच्छे हैं.



                

साल की शुरुआत कारू की खातिरदारी से हुई। कल रात रोते हुए मेन गेट तक आ गया था। तो कल रात और आज दिनभर इसे अपने पास ही रख लिया। दिनभर धूप में छत पर मेरे आगे-पीछे करता रहा और शाम को जैसे ही इसको मेन गेट खुला दिखा, फटाक से अपने भाई बहनों के पास चला गया। ख़ुद ही आया था, ख़ुद ही लौट गया। यही होना चाहिए। चीज़ें, लोग, शऊर ये सब जबरदस्ती आए तो टिकती नहीं हैं। कारू को पेट भर खाना ज़रूर मिला पर सुकून तो उसे अपने भाई-बहन के साथ ही आएगा न। 

               


2026
 आ गया। साल ऐसे ही आते और बीत जाते हैं। जैसे हमें सूरज निकलते और डूबते दिखाई देता है। समय क्या है ? जावेद अख़्तर साब की एक नज़्म हैं- वक़्त क्या है ?

ये वक़्त क्या है
ये क्या है आख़िर कि जो मुसलसल गुज़र रहा है
ये जब न गुज़रा था
तब कहाँ था
कहीं तो होगा
गुज़र गया है
तो अब कहाँ है
कहीं तो होगा
कहाँ से आया किधर गया है
ये कब से कब तक का सिलसिला है

ये वक़्त क्या है ?

उनकी ही आवाज़ में पूरी नज़्म सुनिए


              

आसमान के एक तरफ़ से सूरज डूब रहा था और दूसरी ओर से चांद निकल गया था। इस हद तक समय की पाबंदी से बंधने के लिए हम इंसानों से क्या गिरवी रखा जा सकता है ? मालूम क्या ?

                        
               


आज इधर 12-15 दिनों के बाद सूर्यदेव के दर्शन हुए हैं। आज सबकी छतों पर कपड़े ही कपड़े दिख रहे थे। अब शायद मौसम साफ हो जाए और ठंड कम। शाम को सोचा कि कहीं तो घूम आया जाए। नए जूते लिये हैं तो आज ही पहन के देखा जाए। तो बाइक उठाया और गांधी मैदान चला गया। नए साल के पहले दिन को यादगार बनाने के लिए भीड़ जमा थी। बच्चे, मर्द, औरतें, लड़के-लड़कियां, रोज़ दौड़ने वाले, क्रिकेट खेलने वाले.. और छोटे-मोटे दुकानदार सब। मैं निपट अकेला, इस पार से उस पार इधर-उधर देखते हुए, चलते हुए गया और वापस आ गया। और लाख टके की ज्ञान से रूबरू हुआ कि "जूते अच्छे हैं, कंफर्टेबल हैं, हल्के हैं और ऐसे ही होने चाहिए।"

              


वापसी में शहर (मरीन ड्राइव) होते हुए लौटा। सोचा कुछ खा भी लेता हूं। पहली बार पापड़ी चाट खाया। अच्छा था। और मीठे में मालपुआ। दुकानदार को पैसे दिए और सलाह भी कि मालपूए गरम करके रखो भई।

               


तो शायद पहली बार, नए साल की शुरुआत अकेले रहते हुए हुई है। मम्मी-पापा गांव, भाई-बहन सब दिल्ली-मुम्बई. हां, आज बड़ी दीदी का भूटान से इंस्टाग्राम पर वीडियो कॉल आया था।

अभी शाम को रवि (बनारस वाला) ने काशीनाथ बाबा वाला एक वीडियो भेजा। उसमें इलाहाबाद यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर साब कबीर का एक गाना गा रहे हैं और क्या ही शानदार सुर-ताल में गा रहे हैं। मन शांत और ख़ुश हो गया एकदम से। 


नए साल पर रेजोल्यूशन लेने का चलन है। हालांकि कुछ भी करने के लिए नए साल का इंतज़ार क्यों करना। फिर भी..इस साल किताबों को और ज़्यादा वक़्त देना है, सेलफोन को कम। सुनना ज़्यादा है, बोलना कम, गुस्से पर तो हद कंट्रोल करना होगा।

अगले छह महीने में इन 13 किताबों को पढ़ जाना है। देखते हैं, हो पाता है या नहीं

                

..तो शुरू किया जाए

                 


🙂

रविवार, दिसंबर 07, 2025

गाड़ी खींचो रे...


हम जीवन में आगे बढ़ते जाते हैं और जीवन हम में अनुभव समोते हुए हमसे आगे बढ़ रहा होता है। चलते-चलते कहीं किसी जगह मील का पत्थर (नौकरी, किसी अज़ीज़ से अलगाव, किसी से जुड़ाव, शादी, कभी कुछ, कभी कुछ..) लग जाता है पर हमारा चलना रुकता नहीं है। 


जिस पल हम जीवन से मिले अनुभवों की बारीकियों पर गौर करते हैं लगता है अब ये स्वभाव स्थाई रह जाने वाला है, जो चाहिए वो संतुष्टि का भाव मिल गया है पर समय बीतता है और हमें इस सबक से भी सामना होता है कि अरे ये तो क्षणिक था जो भी था। इंसान प्रेरणा के बल पर बहुत कुछ को स्थाई मानने लगता है। प्रेरणा की बत्ती गुल होने के बाद किया गया काम, सोचा गया जीवन ही कुल जमा कमाई होती है जो परत दर परत जमा होते-होते किसी दिन संतुष्टि का भाव लाता है फिर एक मील का पत्थर लगता है। जीवन ऐसे ही बढ़ता है और ख़त्म हो जाता है।

"हमें कैसे याद रखा जाएगा ? कोई याद भी रखेगा या नहीं ?" का मोह ही है जो दुनिया से जोड़े रखता है, विरक्ति की भाव को दूर भगाता रहता है। 

दादा को गुजरे 50 साल होने जा रहे। बामुश्किल, किसी जमीन या उनके द्वारा बनाए गांव वाले घर की बात आती है तो उनका ज़िक्र होता है। छत वाले कमरे में उनका पहना गया टंगे कोट को देखकर उनकी याद आती है। बीते समय की बात होती है तो पापा याद करते हैं कि "बाबू के टाइम पर...ऐसे... वैसे..." पर कभी-कभी ही...

मतलब कि 50 साल में ही आदमी को भूला दिया जाता है? वो भी तब जब दादा की वज़ह से ही हमारी यह पारिवारिक पीढ़ी सुख(?) भोग रही है। 50 साल तो बहुत ही कम समय है। नहीं ?

नज़रिए की बात है और नज़रिया समय के साथ बदलता है। सुबह आदमी कोई और होता है शाम को कुछ और बन जाता है। कभी-कभी तो आदमी की फितरत समय की भी मोहताज नहीं होती।

लाखों सेल्फ हेल्प किताबें और अब पॉडकास्ट का समन्दर, जीवन की गाड़ी कैसे आगे बढ़ेगी, सब कोई बांच रहा है। सब कोई सीख रहा है, सबकी गाड़ी अटकी पड़ी है। सब में आगे बढ़ने का दिखावा तो है ही।


...और जिनको जीवन ने इतना सोचने तक की सहूलियत नहीं दी है कि उनका जीवन कैसे बीत रहा है ? उनके लिए भी तो यही जीवन है, उनके मोह का क्या ? उन्हें भूल जाने वाले और बहुत जल्दी भूल जाने वालों की फेहरिस्त तो लंबी हो जाएगी। 


फ्रांसीसी लेखक आंद्रे जिद ने कहा था- "जो कुछ भी कहा जाना था, वो पहले ही कहा जा चुका है। लेकिन चूंकि कोई सुन नहीं रहा था, इसलिए हर बात को फ़िर से कहा जाना ज़रूरी है।"

...तो आप सुन रहे हैं ना ? हाहा.
                  
:)

बुधवार, फ़रवरी 07, 2024

माफ़ीनामा सहित..

सरलीकरण करना, कुछेक केस स्टडी, कुछ उदाहरण के आधार पर बहुत बड़ा निष्कर्ष निकाल लेना जिसका सच से बहुत गहरे स्तर तक कोई लेना देना नहीं। तुम्हारी तरह ही किसी और का जीवन भी है या होता है तो वो आता ही क्यों इस धरती पर ? सोचे कभी ? इसलिए इस सरलीकरण से बचिए कि मेरा जीवन ऐसा है तो मेरे समूह के लोगों की ज़िंदगी (सहेली/बहन/प्रेमी की माँ/उसकी बहन) भी ऐसी होगी या हो सकती है। नहीं भई, बिल्कुल ऐसा नहीं है, तुमने अपना रायता अपने दम पर फैलाया है समेटो भी ख़ुद (उस रायता को खा के, या उसमें डूब के) बाकियों की ज़िंदगी भले तुमसे नरक ( जिंदगी नरक कभी थी ही नही चुनाव हमारा होता है....) क्यों न हो, तुम अपना देखो केवल। तुम्हारी अपनी ज़िंदगी की लगी पड़ी है और तुम चले हो सरलीकरण करके दूसरों के जीवन में और रायता फैलाने, अच्छी बात नहीं है ये। बुझाया ?

उन विचारों में जिनमें आपका गहरा विश्वास हो चला है पर आपको लगता कि उस विचार से दुनिया को फायदा तो नहीं होने वाला तो उसे अपने कुछ ग्राम के दिमाग में ही रखिए अपना गिनी पिग आप ख़ुद बनिए अपने पर अप्लाई कीजिए अपना रायता और फैलाइये या समेटीए, आपका जीवन, आपका नरक, आपकी मर्जी..

किसी और के जीवन के बारे में चाय-कॉफी पीते हुए कुछ भी कह देना/मान लेना, गुटखा खा के कहीं भी थूक देने से भी ज्यादा आसान है। अपनी ज़िंदगी संवारिए पहले, कैसे संवरेगा ये आप जानिए, मैं इतना जानता हूँ कि जीवन के किसी भी मोड़ पर किसी भी पहलू में सुधार की गुंजाइश रहती है वो अलग बात है कि किसी किसी का रायता इस लेवल तक फैला है कि उससे वो रायता कम से कम इस जीवन में तो नहीं ही साफ होगा, तो मानिए कि उसके प्रारब्ध ही ऐसे हैं।


हालांकि मैं भी ये किसी लड़की/किसी की बहन/किसी की प्रेमिका/किसी की माँ पर आक्षेप ही लगा रहा हूँ, पर इस कृत्य को इस तरह से जस्टिफाइ कर रहा कि उन कुछ लड़कियों/औरतों की सोच के दायरे में मेरी माँ, बहन, नानी, प्रेमिका(?) भी आती हैं जिन्हें ऊपर वाले की कृपा से इतना स्पेस मिला हुआ है कि वो अपने मन का काम कर सकें, सपने देख सकें और उन सपनों को पूरा करने के लिए वो मेहनत/जज़्बा दिखा सकते हैं/दिखाते हैं, बजाय अपने से निम्न जीवन/नरक को भोगने वालों के लिए दीवार खड़ी करने के...