शुक्रवार, जनवरी 15, 2021

भूख का इलाज

लगता है मुझे इस दुनिया की समझ होने लगी है। पहले मैं नहीं समझ पाता था कि अचानक कैसे उजाला हो जाता है और शोरगुल की आवाज़ें कानों में आने लगती हैं, फ़िर ख़ूब देर के लिए अँधेरा भी और सबकुछ एकदम शांत-शांत। अब समझ आया है कि दिन-रात इसी को कहते हैं। मेरी माँ जो मुझे जन्म दीं और कुछ दिनों तक मुझे पाल पोस कर बड़ा करके पता नहीं कहीं चली गई फ़िर कभी नहीं लौटी। वो मुझे प्यार करती थीं मगर बड़े भाई को डाँटती थी। तब सुना था कईं दफ़ा कि "बड़े होके तुम शेर बनोगे, शेर जैसे रहा भी करो" मैंने शेर नहीं देखा है शेर के बारे में सुना है बस। बड़ा भईया को शेर क्यों बनाना चाहती थीं माँ ? माँ वापस लौटी क्यों नहीं ? लौटतीं तो पूछता।

मैं बड़े शहर के छमंज़िले इमारत में रहने आ गया हूँ। शेर बनने वाला भाई और बहनें पीछे छूट गईं। वो चाचा भी मेरे जो कम बोलते थे और जो दिन के ज़्यादातर घण्टे गंदे नाले में ही पड़े रहके बिताते थे थे। माँ के चले जाने के बाद वही हमसब के लिए उम्मीद थे। मगर अब पीछे की बातों को याद करने में क्या रखा ? नईं जग़ह मुझे भा गयी है। यहाँ बालकनी है, छत भी और भी जिसकी ऊँचाई जितनी इमारत दूर-दूर तक नहीं दिखती है। माँ को चेहरा भी अब भूलने लगा हूँ। माँ लौटी क्यों नहीं ? ये सवाल मेरा पीछा कभी नहीं छोड़तीं।

हम छठी मंज़िल पर रहते हैं तो बगल की इमारत की पाँच बालकनी हमेशा मेरी नज़रों के सामने ही रहता है, उनकी छतें भी.. छतों पर क्या कुछ होता रहता है.. उसे देख-देख मैं बहुत हद तक बोर हो गया हूँ। पर जो एक बात उस छत पर घट रही होती है उसका ज़िक्र मैं करना चाहूँगा.. शायद जवाब मिल जाए कि मेरी माँ हमतक वापस क्यों नहीं लौटी ? एक काली बिल्ली जो अपने दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ उसी बगल वाली इमारत की सीढ़ियों वाले घर के टिन की छत पर अपना बसेरा बसाई हुई है। दोनों बच्चे धारीदार धब्बे अपने बदन पर लिये ख़ूब उछल-कूद मचाते हैं। शुरू शुरू में उन्हें देखकर अच्छा लगता था और मैं अपने उन दिनों को याद करके मुस्कुराता था जब मैं अपने भाई-बहनों के साथ खेला करता था। एक समय के बाद एक दिन मेरे मन में इच्छा जगी कि काश मैं इन दोनों बच्चों को खा जाता। अचानक से आए इस विचार से मैं हैरान हो गया था। मगर ये सब कुछ अभी सोचने के स्तर पर ही था। इसे हक़ीक़त में बदलना नामुमिकन ही था। एक तो उस छत पर जाना मुमकिन नहीं दूसरा उन बच्चों की माँ मुझे उनके आस-पास भटकने भी क्यों देती भला ? उनकी माँ तगड़ी थी और कभी-कभार मुझे ऐसे घूरती जैसे आँखों से ही कह रही हो "ऐ प्लूटो, इधर मत देखा करो, अपने काम से काम रखो और मेरे दिल के टुकड़े के लिए अपने मन में गंदे ख़्याल लाए तो ख़ैर नहीं तुम्हारी, समझ आई बात?" मुझे उसकी आँखें देखकर डर लगता था परंतु वो भी मुझतक नहीं पहुँच सकती थी तो मैं अपने चेहरे पर डर का भाव किसी भी कीमत पर आने नहीं देता था। ये सब कुछ महीनों तक चलता रहा साथ में ये सवाल रह रह कर मेरा पीछा भी करती रही कि मेरी माँ वापस क्यों नहीं लौटी ?

ऐसे ही दिन गुज़रते रहे। उजाला-अँधेरा का सिलसिला चलता रहा, मैं बड़ा होता रहा और वे दोनों बच्चे भी अपना उछलना-कूदना बढ़ा दिए थे। ये ख़्याल कि उन बच्चों के मांस पर केवल मेरा ही हक़ है, बहुत तेज़ी से मेरे ऊपर हावी होती जा रही थी। इमारत और उनकी माँ की बाधा हटाने की तरक़ीब सोचने लगा था मैं। जबकि मुझे मेरे पसंद का खाना भरपेट रोज़ समय से मिल ही जाता था। पर उन दोनों बच्चों के मांस में जो मज़ा होगा वो इधर कहाँ ? नाले में पड़े रहने वाला मेरा चाचा कहता भी था घर की मुर्गी दाल बराबर, अब समझ आई वो बात मेरे।

बारिश का मौसम ख़त्म होने को था और सर्दियां चढ़ने को थी। ऐसे ही एक सुनहरे दिन को मैं सुबह जल्दी ही छत पर उन दोनों बच्चों के बारे में सोचते हुए टहल रहा था। नीचे वाली बालकनी में एक औरत फ़ोन पर बात करते हुए ख़ूब ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगा रही थीं जिसकी वज़ह से मेरे सोचने में खलल पड़ रहा था, बावजूद मैं सोचने में मशगूल रहा और अगले ही पल मेरे पैरों तले छत की फर्श खिसक गई ये देखकर कि उन बिल्लियों की माँ अपने मुँह में एक कबूतर दबाए हुए शान से टिन की छत पर मुझे दिखी। तीनों क़रीब आ गए और माँ ने एक आख़िरी झटका कबूतर के गर्दन पर दिया और कबूतर की रही सही कसर निकाल दीं। दोनों बच्चों की आँखों में अज़ीब ख़ुशी मेरे इमारत से ही कोई भी देख सकता था। ये सब देखते हुए आज न चाहते हुए भी डर मेरे चेहरे पर साफ़ झलक रही थी और उन बिल्लियों की माँ कनखियों से मुझे देखती और हल्के से जीभ निकाल कर मुस्कुरा देती। मैं तेज़ी से छत पर से उतरा और कमरे में जाकर टेबल की नीचे बहुत देर तक सहमा, बैठा रहा.. वहीं नींद भी आ गई। दोपहर को जब उठा तो तेज़ भूख से बेहाल था मैं और अब तो मैंने कबूतर के मांस भी देख लिये थे तो भूख की तीव्रता में अच्छी-खासी बढ़ोतरी हो गयी थी। पेट कैसे भी भरा और जैसे तैसे ख़ुद को छत पर ले गया। तीनों जने ये पैर फैलाकर गहरी निद्रा में मगन थे। यहां वहां कबूतर के फर उड़ रहे थे। मुझे कबूतर पर दया आ रही थी जिसके नर्म गुलाबी मांस अब बिल्लियों के पाचन क्रिया में समाहित हो चुका था।

दुनिया इतनी क्रूर भी हो सकती है कि भूख के लिए निर्दोष कबूतर की जान ले ली जाए ? ऐसी बातें मेरे मन में क्यों उठ रही हैं ? जबकि मुझे मौका मिल जाए तो बिल्ली के उन दोनों बच्चों के भी परखचे उड़ा दूँगा। पर यही बात है ना.. मुझे पता है कि बिल्लियों के मांस मेरे नसीब नहीं तो मैं निर्दोष कबूतरों की पैरवी कर सकता हूँ। मानवाधिकार जैसा कुछ अख़बार में पढ़ते देखा है मैंने मालिक को।

ख़ैर, दिन बीतते गएँ और बिल्लियों की माँ हर 2-3 दिन में एक बार एक कबूतर मुंह में बड़े शान से दबाती आती और तीनों बैठ कर मज़े लेकर मुझे बीच-बीच में देखते हुए खाते जाते। मैं अफ़सोस करने के अलावे और घड़ी-घड़ी जीभ निकालने के सिवा कर ही क्या सकता था ? वे शुरुआती के बड़े मायूसी भरे दिन गुज़रे मेरे। 

मेरा छत पर जाने का रत्ती भर भी जी नहीं करता है अब मगर, मेरा मालिक मुझे जबरदस्ती छत पर रख आता है। सीढ़ियां चढ़ना तो जान गया हूँ उतरने में मौत आ जाती है। मायूस नज़रों से मरे कबूतरों के लिए मन में उठते दया भाव और बिल्ली के बच्चों के मांस खाने के उठती प्रबल इच्छा के बीच संतुलन बनाना कोई आसान काम नहीं है मेरे लिए.. पर करना पड़ता है। दिल्ली में रहने का सुख ही सबकुछ नहीं होता न.. ये निगोड़ी जीभ पर कौन लगाम लगाये ? 

वो सवाल जो मेरा पीछा नहीं छोड़ती थी, कुछ दिनों के लिए ग़ायब हो गयी मगर उस छत के दृश्य जब बार-बार एक जैसे ही होने लगे तब वो सवाल फ़िर जहन में उठ खड़ा हुआ। ये कुछ वैसा ही था कि बादल के आ जाने से हम कुछ पल के लिए सूरज की रोशनी से महरूम रहते हैं। माँ लौटी क्यों नहीं ?? ये सवाल फ़िर हावी हो गया।

ऐसे ही एक दिन बिना मन से छत पर टहल रहा था और पुरजोर कोशिश में था कि सामने की छत पर नज़र न ले जाऊँ। मगर आदतन नज़र गयी और इस बार बिल्लियों की माँ, दो कबूतर अपने मुंह में दबाई टिन की छत पर शान से बैठने के फ़िराक़ में थी। उन दो कबूतरों में एक कबूतर बड़ा और एक बहुत ही छोटा था। शायद माँ-बेटे या माँ-बेटी या ऐसे ही किसी दो कबूतर मार के लाई थी शैतान बिल्ली। 

आज ये सब देखते हुए अचानक ही मेरे मन में ख़्याल आया कि बाकी दिनों के कबूतर भी तो किसी के माँ-बाप होंगे। वे अपने बच्चों के लिए खाने की खोज में निकले होंगे और दुर्भाग्यवश इस शैतान बिल्ली के निवाले बन गएँ। इन कबूतरों के बच्चे इनका इंतज़ार करते तो होंगे कि माँ अब आयेंगी और जो कि सच ये है कि उनकी माँ कभी नहीं लौट सकती, वे सब भी मेरे जैसे एक सवाल से कभी पीछा नहीं छुड़ा पाते होंगे कि माँ लौटी क्यों नहीं ?

मेरी माँ भी नहीं लौटी। माँ शेरों की बात करती थी। शेर जैसे बनो। चाचा भी शेरों की कहानियाँ कहते थे। जिस गाँव में मेरी पैदाइश हुई वो जंगलों से घिरा हुआ था। उन जंगलों में शेर होने की संभावना को नकारा नहीं जा सकता।

..तो आज जवाब मिल गया मुझे कि मेरी माँ वापस लौटी क्यों नहीं ? पर अब मेरे पास जवाब है भी तो क्या ही फ़र्क़ पड़ता है। माँ अगर लौट आई होती तो वो हमारे साथ ही होतीं और मेरा मालिक जब मुझे दिल्ली ले आने के लिए मुझे उठाने जाता तो माँ ऐसा कभी नहीं करने देती और मैं दिल्ली के इस छमंज़िले इमारत पर बिल्लियों की मज़ेदार दावत के किस्से नहीं सुना रहा होता। 

अब मन से छत पर जाता हूँ क्योंकि मन न भी हो तो मेरी नहीं चलनी। कबूतरों के लिए दया भाव मेरे अंदर अब असीमित है। कभी-कभी सोचता हूँ कि शाकाहारी हो जाऊँ। जिस छत पर बिल्लियां हैं उधर मैं अब देखता तक नहीं। मुझे ख़ुशी होती है कि मैंने अपने विचारों और जीभ पर नियंत्रण कर लिया है। 

मेरे छत की दूसरी तरफ़ वाली छत जिसपर जाना कोई बड़ी बाधा नहीं। उस छत पर कईं महीनों से न पहनने लायक कपड़ों के भरे बोरे रखे हुए हैं। उनमें एक दिन हलचल हुई तो मैंने उसपर ग़ौर करना मुनासिब समझा, वैसे भी छत पर मैं नज़ारा लेने ही जाता हूँ। उन कपड़ों के बोरे में कुछ ज़िंदा सा दिखा जो 5-7 की संख्या में थे जो चीं-चीं-चीं की आवाज़ कर रहे थे। चूहे जैसे दिखे और अचानक ही मेरे मन से अब कबूतरों के लिए दया भाव छूमंतर हो गई। मैं इस जुग्गत में हूँ कि इस छत पर ख़ुद का जाना अब कैसे भी मुमकिन कर पाउँ। 

पता है ? "भूख का कोई इलाज़ नहीं" ये सोचते हुए मुझे उस शेर की याद आ रही है जिसने माँ को मुझ तक वापस लौटने नहीं दिया।

बुधवार, नवंबर 04, 2020

गले की ख़राश

उसके लिए बनारस एक समय पर धड़कते दिल के समान हो गया था तो वहीं बनारस उसके जीवन के लिए बची उम्र के लिए नरक बन गया।

मान्या नाम था लड़की का। इलाहाबाद जब किसी कंपीटिशन का एग्जाम देने गई थी एग्जाम तो ठीक ठाक हो गया। सेंटर से जब बाहर निकली तो गले में कुछ अजीब सा हुआ और लगी खांसने। पानी की सख़्त ज़रूरत महसूस हुई उसे और अगले ही पल विक्रम नाम के लड़के ने पानी की बोतल उसकी तरफ़ बढ़ा के अपने बैग से टिफिन निकालने लगा। मान्या को जब गले में पानी से सुकून हासिल हुई तब उसने तिरछी नज़र से ही विक्रम को देखा जो टिफिन निकाल के सड़क पार बने पार्क की तरफ़ देख रहा था। जहाँ वो चैन से बैठ कर बड़ी दीदी के हाथ के बने पराँठे और माँ के हाथों से बने आचार का लुत्फ़ लेता। मान्या ने धन्यवाद कहते हुए बोतल वापस करी और सड़क के इसी किनारे आगे बढ़ गई, विक्रम सड़क पार पार्क में ख़ुद को ले गया।

थोड़ी ही देर बाद मान्या चार समोसे खरीदकर विक्रम के सामने बेंच पर बैठी मुस्कुरा रही थी और रह रहकर गर्दन पर हाथ फेर ख़राश से बचना चाह रही थी। दो समोसे विक्रम के हिस्से गए और एक पराँठे मान्या के हिस्से तब जाकर विक्रम ने बात करने, एक दूजे को जानने की पहल करी

"नाम क्या बताया था तुमने पानी पीते वक़्त ?"
"चंपा"
"अच्छा हाँ, चंपा"
"कुछ भी ? कब बताया नाम मैंने अपना?"
"अच्छा नहीं बताया था क्या, लो अब बता दो"
"मान्या"
"अच्छा नाम है ना ?
"वो तो है"
"मेरा जानना चाहोगी?"
"नहीं जानना था पर आचार बढ़िया है, तो बता दो नाम भी"
"विक्रम"
"ठीक ही नाम है, कोई ख़ास नहीं"

दोनों ने खाना ख़त्म किया, विक्रम को चाय नहीं कॉफी बेहद पसंद और मान्या  को ठीक इसका उल्टा। दोनों ने एक-एक कप कॉफी और चाय ली और वापस पार्क में गए इस बार दोनों ने घास पर पैर फैलाकर बैठना चुना। संयोग देखिए, चाय विक्रम के हाथों में गई थी और कॉफी मान्या के हाथ में। विक्रम को ध्यान नहीं ये पर मान्या ने पहले ही ग़ौर कर लिया था। तो जल्दी से मान्या ने कॉफी जूठी करके विक्रम से कहती है- "अरे मैं तो कॉफी पी ली। पर कोई ना, ऐसा भी होना चाहिए, वैसे कॉफी अच्छी बनी है" गले की ख़राश को राहत मिली और मान्या को ये संकेत कि चाय की तुलना में कॉफी से ख़राशें जल्दी दूर होती हैं। या क्या पता विक्रम जैसा साथी साथ बैठ के चाय-कॉफी पीए तब ख़राशें जल्दी दूर हो जाती हों। मान्या को नहीं पता।

विक्रम ने भी चाय ख़त्म करी कैसे भी और दोनों ने एक साथ टाइम देखा तो नेक्स्ट पेपर के लिए ज़्यादा टाइम बचा नहीं था। दोनों ने वापस सेंटर में जाने को चुना उसके पहले विक्रम ने मान्या के लिए एक बोतल पानी खरीद दी और कहा कि एग्जाम के बाद इसके पैसे दे देना। दोनों हँसते हँसते सेंटर में घुसे और बाहर केवल विक्रम हँसता हुआ निकला। गले की दिक्कत और कान दर्द ने मान्या के दूसरे पेपर को ख़राब करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

दोनों बाहर निकले। फेसबुक पर दोस्त बने और मान्या बनारस अपने चाचा के घर के लिए निकली और विक्रम स्कूल के ज़िगरी दोस्त की शादी में जाने के लिए एयरपोर्ट निकला जहाँ से बंगलुरू के लिए उसकी फ्लाइट थी।

मान्या शुरू से ही अपने घर(चंदौली) न रहकर बनारस में ही चाचा के साथ रही। घर में बस चाचा, उनकी दो छोटी बेटियाँ, एक मिठ्ठू तोता और मान्या थी। चाची छह महीन पहले ही गंगा में नौकायन के लुत्फ़ लेने के क्रम में संतुलन बिगड़ा और सुबह सवेरे का वक़्त होने की वज़ह से सुनसान घाट पर कोई नहीं था जो बीच गंगा में कूदकर चाची को बचा पाता। तीनों बहनें चिल्लाती रहीं और चाची का जाना तय था या तय किया गया था, वो चली गईं ठीक वैसे ही जैसे शाम को सूरज ढल जाता है और बहुतों को ख़बर नहीं लगती।

मान्या शुरू से ही पढ़ने में औसत ही थी। बोलती कम सोचती ज़्यादा। कोर्स की किताबों से इतर कुछ भी पढ़ने का शौक नहीं ना ही टीवी देखने का न गाने सुनना। गमले में फूल लगाती थी और छत से नीचे गली में खेलते बच्चों को बिना हँसे देखती रहती। 5-7 दिन पर गंगा घाट चली जाती अकेले ही। लौटते वक्त लंका पर चाय पीती और घर लौट आती जहाँ बेसब्री से दोनों बहनें और तोता दरवाज़े की तरफ़ देखता रहता था।

दोनों बेटियों से ज़्यादा चाचा मान्या की ख़बर रखते, दुलारते और कहते कि इन दोनों बहनों के पीछे अपना जीवन ख़राब न करना।  मान्या की आदत थी सुबह जल्दी उठने की। सुबह जल्दी उठ पहले ख़ुद के लिए स्पेशल चाय बनाती फ़िर बाद में चाचा जी और बहनों के लिए।

मान्या जब रसायनशास्त्र से ग्रेजुएशन पूरी कर ली तब पीजी में एडमिशन लेकर कंपीटिशन की तैयारी में लग गई। चाचा जी के दोस्त अक्सर जो मान्या के हाथ की बनी चाय पीने आते थे, उन्होंने सुझाव दिया था कि टीचर के जॉब के लिए तुम नहीं बनी हो बेटी, तुम बैंक में जाओ, अफ़सर बनो। चाचा की रजामंदी मिल गयी तो मान्या तैयारी करने लगी। मान्या के गले की ख़राश वाली दिक्कत चाची के रहते ही शुरू हुई थी। लाख अब चाचा जी मान्या का ख़्याल रखते थे पर मान्या ने गले की ख़राश वाली बात चाचा जी को कभी नहीं बताई और दोनों बहनों को भी हिदायत दी थी कि चाचा जी तक ये बात न पहुँचे।

विक्रम और मान्या की फेसबुक पर बात शुरू हुई और जल्दी ही फ़ोन पर भी बातें होने लगी। दोनों को दोनों ही अच्छे लगने लगे। नए फ़लक,  नए आसमान, नई ज़मीन सबकुछ उन दोनों के लिए नए नए होने-लगने लगे। व्यक्तिगत देखे सपने दोनों ने साझा कर लिया। पंख लगे दोनों के ही और नई उड़ान दोनों के मनमाफ़िक होने लगीं। जिस उम्र में दोनों थे उसमें इन बातों का हो जाना बहुत ही सतही बातें हैं। इसे किसी भी दृष्टिकोण से तूल देने की कोई भी कोशिश करना प्रेम नामक चिड़िया के साथ धोखा है।

विक्रम के सभी रंग मान्या पर चढ़ने लगे और मान्या के भी सतरंगी रंग विक्रम पर। इस दरम्यान विक्रम दिल्ली से कईं दफ़ा मान्या से मिलने बनारस भी गया। दोनों बहनों को दोनों के बारे में सबकुछ पता था। चाचा जी को विशेष मुहूर्त में ख़ूब तैयारी के साथ बताने की मान्या ने तय कर रखा था।

मान्या के गले की ख़राशें बढ़ने लगी। कान में भी दर्द अब तेज़ होने लगा था और हर 10-12 दिन में मुँह में छाले होने लगे थे।

मान्या की माँ, मान्या जब 3 साल की थी तभी चल बसी थीं। गले के कैंसर की वज़ह से। और अनुवांशिक रूप से गले का कैंसर मान्या में भी संचिरत हो आया था और पल रहा था। मान्या ने चाचा से या किसी को भी बताई होती या डॉ से राय ली होती तो हो सकता था कि कैंसर शुरुआती दौर में पकड़ में आ जाता और इलाज संभव हो सकता था।

चाची जिस दिन डूब के मरी थी, उसके एक रोज़ पहले ही चाचा ने बुरी तरह से चाची को पीटा था जब केवल ये सब देखने वाला मान्या और मिठ्ठू तोता ही था। बीच बचाव में मान्या के गले पर चोट लगी थी तब से ही मान्या के गले की ख़राशें बढ़ने लगी थीं और उसके गले की मोटाई भी। एग्जाम वाले दिन हद से बाहर जाते दर्द के बावजूद मान्या ने न किसी को ख़बर लगने दीं ना ही डॉ से मिली। कम से उसे विक्रम से तो ये बात नहीं ही छुपानी चाहिए थी।

विक्रम जाना तो सही पर तब जब मान्या के गले का कैंसर उसके शरीर के ख़ून में मिलकर आधे से ज़्यादा शरीर तक पसर चुका था। चाचा भी जान ही गएँ। चाचा के दोस्त भी, चाचा के दोस्त भी, पड़ोसी भी। डॉ को दिखाया गया तब तक देर हो गई थी। वहीं.. चिड़िया चुग गई खेत तो अब क्या ?

दोनों छोटी बहनें कुछ समझ ही नहीं पाई। पहले माँ को अचानक ही खोया फ़िर माँ से भी प्यारी दीदी को ऐसे खोते हुए, दूर जाते हुए, दर्द से कराहते हुए देख रही थीं। विक्रम बड़ी हिम्मत जुटा के मिलने आता था मान्या से। मिलता कम देर ही था ज़्यादातर वक़्त गंगा किनारे जाता, वहाँ बैठता और कभी-कभी  रोता और मान्या के चाचा को कोसता।


समन्दर जितने दर्द को झेलकर उससे पार न पाकर एक दिन मान्या भी चली गई ठीक वैसी ही जैसे लाखों लोग गुमनामी में कैंसर की जंग हारकर दुनिया को विदा कहते हैं और क़रीबी लोगों को छोड़ कोई नहीं जानता कि कहीं कोई कैंसर की वज़ह से नहीं रहा। ठीक ठीक वैसे ही जैसे सूरज डूब जाता है चलते चलते अचानक ही और बहुतों को भनक तक नहीं लगती।

सबकुक धीरे धीरे फ़िर से पटरी पर आने लगता है, जीवन की यहीं सबसे ख़ूबबसूरत बात है। ज़िन्दगी की ट्रेन ज़्यादा देर तक नाउम्मीदी की प्लेटफॉर्म पर नहीं टिकती। चाचा पहले से ज़्यादा धार्मिक हो गएँ। पाप के फल भोगने के डर से आदमी माला जपने को विवश हो ही जाता है। पाँचों पहर की नमाज़ अदा करना ज़रूरी काम हो जाता है। 

दोनों छोटी बहनें बड़ी हो रही हैं, दुनिया से रूबरू हो रही हैं। कहीं कोई तो आसमान है जो उनके ही उड़ने के लिए उनके इन्तज़ार में है। 

विक्रम एयर फोर्स के वेस्टर्न कमांड में अफ़सर बन गया है और दुनिया की नज़र में, अपने दोस्तों, क़रीबियों की नज़र में उसके जितना ख़ुश इंसान शायद ही कोई हो। पर असलियत तो विक्रम जानता है और वो मिठ्ठू तोता जो मान्या के न रहने के बाद विक्रम के घर पर नया ठिकाना पा लिया था। 

विक्रम के घर वाले विक्रम के लिए लड़की ढूँढ रहे हैं। लकड़ी कैसी होनी चाहिए इस सिलसिले में विक्रम ने अपनी राय साफ़ रख दी है कि माँ को पसंद आ जाए उस लड़की का हाथ थाम लेगा वो पर एक शर्त के साथ कि लड़की का कोई चाचा नहीं होना चाहिए तब ही...

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शुक्रवार, अक्टूबर 30, 2020

विकल्प है ?

जो बातें आपके अंदर नहीं हैं, जिन इच्छाओं का घर आपका दिलोदिमाग कभी हो ही नहीं सकता उन इच्छाओं का जन्म भी बाज़ार आपके अंदर देर सवेर करा देगा, यक़ीन मानिए। बाजार(पूँजीवाद) की ताक़त के क्या कहने। यूँ समझिए कि जिस 20वीं सदी का इतिहास 'समाजवाद' के बिना पूरा नहीं हो सकता आज वहीं समाजवाद लाइब्रेरी की किताबों में धूल फाँक रहा है। इतिहास के शोधार्थी जब 20वीं सदी के बारे में कुछ जानना चाहेंगे तो अब मुमकिन है कि उन्हीं लाइब्रेरी के समाजवाद से भरी अलमारी के सामने रखे टेबल कुर्सी पर बैठ लैपटॉप में समाजवाद के बारे में जानेंगे। पूँजीवाद और पूँजीवादी ताकतों को हल्के में लेने की भूल दिन में एक-आध बार ही कीजिए, फ़िर तो आगे आप दिन में तो क्या महीनों तक किसी और विचारधारा की बात पूँजीवाद के बात करने के बाद ही करेंगे। तय है ये!

यहाँ न तो पूँजीवाद की महिमामंडन की जा रही है न ही उसकी आलोचना, जो जिस रूप में सामने है उसका बखान भर है और पसरती जा रही चीज़ों का फैलाव (चाहे जिस रूप में हो) का महिमामंडन क्यों न की जाए? मैं सोचता हूँ और लायक शख़्सियतों (जैसे कि मेरा छोटा भाई) से इसपर डिस्कशन करता ही हूँ, ये सवाल रखता ही हूँ कि दुनिया कैसे काम करती है ? ये सब कुछ पूर्वनियोजित है या प्रकृति ऐसा ही चाहती है ? जवाब गोल-मटोल तर्कों और उलझनों के रूप में पाता हूँ। दुनिया है, यहीं बहुत है अबतक तो :)

हम अपनी बात करें ? ग्लोबल हो चुकी दुनिया में हम कहाँ हैं ? हमारे ऊपर अभी भी कोई दवाब काम करता है तब हम हेलमेट पहन लेते हैं, सीट बेल्ट लगा लेते हैं, कोई देख रहा होता है तो हम उठकर कचरे के डिब्बे में कचरा डालकर सीना चौड़ा करके उस जगह वायस आ जाते हैं जहाँ पर कचरा पैदा किया था जबकि हो सकता था कि वो कचरा बने ही ना, अगर हम पूंजीवाद के फ़ेरा में पड़ के अपने अंदर इच्छाओं को जगाया न होता तो। होने-जाने को कुछ भी हो सकता है। हाँ, तो हम कहाँ ठहरते हैं बाकी दुनिया के सामने ? वहीं दुनिया जिसमें जर्मनी भी है, जिसको ज़्यादातर लोग याद करते हैं तब हिटलर ही सामने आता है। हिटलर का पक्ष नहीं ले रहा हूँ, ये कह रहा हूँ कि द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात मित्र देशों ने ख़ासकर दी ग्रेट ब्रिटेन ने जर्मनी की राजधानी बर्लिन शहर में एक भी ऐसी इमारत नहीं छोड़ी थी जो ठीक हाल में खड़ी हो। और आज आप जर्मनी को देख लीजिए, वो कहाँ है हम कहाँ है और आगे अभी कहाँ को जा रहे हैं। हिटलर की बात आई तो कह दूँ कि कहीं पढ़ा था किसी आर्टिकल में कि हिटलर तीसरी दुनिया के देशों के लिए ईश्वर से कम नहीं। हिटलर ब्रिटेन के हालात को खस्ताहाल नहीं करता तो अफ्रीकी देशों का तो पता नहीं हम तो क़तई 1947 में आज़ाद नहीं होते। बाकी ये छोड़िए क्या होते क्या नहीं, अब जो हैं और जो होने वाले हैं के बीच के समय को, विचारधारा को कैसे आगे किस मुक़ाम पर लेके जाना चाहते हैं उसको लेकर सोचना(?) होगा। वरना कम से कम मैं तो नहीं ही चाहूँगा कि मेरी अगली पीढ़ी जब ऐसा ही कुछ लिखे तो उसमें ये ज़िक्र करें कि मेरे इस लिखे में और उसके टाइम पीरियड में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है।

कमियों को गिना के पतली गली से निकल जाना बहुत से लिखने वाले और कथित बुद्धजीवियों का स्पेशल टैलेंट(?) है। मैं सही(?) करने के कुछ सुझाव दूँगा यहाँ तो उससे ये कदापि न मान लिया जाए कि मैं अघोषित रूप से ख़ुद को बुद्धिजीवी कहलवाना चाह रहा हूँ, बाकी तो आप जानते ही हैं सब।

एक सुझाव तो इस उदाहरण से ही समझिए-
एक पढ़ा लिखा आदमी कभी भी रोड के बीच में (या उस जगह जहाँ किसी के लिए वो बाधा बने) खड़ा होकर के किसी से बात नहीं करने लगेगा। ज़रूर पहले वो सड़क के किनारे जाकर ही अपने ज़रूरी काम करेगा और इस तरह ट्रैफिक की समस्या कुछ हद तक सुलझ सकती है। और हाँ, बुद्धि पढ़ने लिखने से ज़रूर आती है पर बुद्धिमान होने के लिए पढ़ाई-लिखाई अनिवार्य घटक नहीं है। ऐसे बेशुमार लोग हैं जिन्हें पढ़ने-लिखने का कभी अवसर नहीं मिला तब भी वो साइंटिफिक टेम्परामेंट से लबालब भरे होते हैं। गाँव में किसी किसान से मिलिए जो शिद्दत से खेती करते हुए जीवन यापन कर रहा हो, पता चल जाएगा।

दूसरा सुझाव जो कि काम का नहीं है, छोड़ सकते हैं-
हम उस समय काल में हैं जहाँ दूसरों के लिए सोचना पाप है, सच में पाप है। और दूसरों के लिए न सोचने वाली बीमारी बहुत तेज़ी से फैली है। फ़िर इन लोगों (जिनमें मैं भी हो सकता हूँ) ने जो वातावरण का निर्माण किया है उसमें वो लोग भी कोई काम के नहीं जो दूसरों का भला चाहते हैं जो दूसरों के लिए सोचते हैं। ऐसे लोग कम नहीं हैं पर हमने उन्हें मजबूर किया है कि भाई ये क्या शौक़ पाल रहे हो दूसरों के लिए सोचना। पगलेट हो का ? अपना जीयो, बच्चे का ऊपरी तौर पर थोड़ा सोच लो और निकलो जल्दी से, इस जगह से।

तीसरा सुझाव पर्यावरण को लेकर है-
हम मनुष्य वैसे तो बहुत ही कम समय के लिए पृथ्वी पर आते हैं। मजे करो और निकलो, आने वाली पीढ़ी जो भुगतेगी वो ही जाने समझे/झेले, हमको क्या ? हमारी गुजरी हुई पीढ़ी ने हमारे लिए सोचा था क्या ? जैसे को तैसा
और ये भी समझिए कि राइट विंग की सरकारें हर जगह आती जा रहीं हैं। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, हमारा भारत महान तो इन राइट विंग विचारधारा वाली सरकारों की प्रायोरिटीज़ में पर्यावरण बहुत बाद में आता है, आता है यहीं सुकून की बात नहीं है क्या, मुस्कुराइए ज़रा :)
पर्यावरण को लेकर हम क्या कर सकते हैं ये आप जानिए। अपने फूल से खिलते बच्चों के, छोटे भाई-बहन के चेहरे देख के जानिए कि क्या कर सकते हैं।

चौथा सुझाव राज्य और जनता को लेकर-
गाँधी का रामराज्य के चरम को लें या फ़िर मार्क्सवाद के चरम सीमा 'साम्यवाद' को लें (समाजवाद का अगला और अंतिम चरण है साम्यवाद, समाजवाद ही आधे रस्ते में दम तोड़ दिया तो साम्यवाद तो अभी दूर की कौड़ी  है) तो गाँधी और मार्क्स का मानना था कि राज्य का होना ही दुर्भाग्य है। राज्य  का लोप हो जाना चाहिए मतलब कि जनता ख़ुद ही ख़ुद को शासित करे। और समाजवाद में तो धर्म की सार्वजनिक अनुपस्थिति की बात कही गई है जबकि साम्यवाद में धर्म का मनुष्य के मानस पटल से ही विलुप्त हो जाने की बात कही गई है। तो देख रहे हैं ना.. मार्क्स ग़लत नहीं बोले हैं कि धर्म, अफ़ीम का काम करता है।

जनता पहले है राज्य बाद में। जनता ठीक हो जाए तो न पुलिस की ज़रूरत है ना पुलिस के लिए भर्ती निकालने की। फ़िर भर्ती घोटाले भी नहीं होंगे। पर वहीं है ना.. हम अभी एक लड़का लड़की को अकेले में साथ बैठे देख लें(भले ही वो भाई- बहन ही क्यों न हो) तो क्या-क्या सोचने लगते हैं वो बताने की ज़रूरत है मुझे ? हाहाहा... तो ऐसे सोच वाले समाज में मैं साम्यवाद जैसी व्यवस्था लाने की, अमल करने की सोच रहा, सुझाव दे रहा हूँ। फ़िर से मुस्कुराइए ज़रा :)

बाकी तो सब ठीक ही है। अक्टूबर बीतने को है, नवम्बर दीवाली-छठ में और दिसम्बर सूरज को दिख जाने के इन्तज़ार में बिता देंगे। नए साल पर उम्मीद कर करेंगे कि करोना को देश निकाला मिले। उम्मीद करना ठीक ठीक वैसा ही है कि गमले में मिट्टी डाले बिना उसमें बीज डाल देना और सपने देखना कि फूल-फल आएँगे ही एक दिन। और किसी किसी के आ भी जाते हैं, यक़ीन कीजिए। करना ही पड़ेगा, आपके पास और कोई विकल्प है ? 

एक विकल्प है कि मेरे इस पूरे लिखे को मेरा व्यक्तिगत मसला मान लीजिए और फटाक से भूल जाइए, आप आके पूरा पढ़ लिये और क्या चाहिए मुझे, एक लिखने वाले को। है कि नहीं ?


:)

रविवार, सितंबर 13, 2020

गुरु गुण लिखा न जाय...

कबीर कहते हैं- सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय। सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय।। अर्थात पूरी पृथ्वी को कागज, सभी जंगल को कलम, सातों समुद्रों को स्याही बनाकर लिखने पर भी गुरु के गुण नहीं लिखे जा सकते।
      

  एक माँ, जो स्कूल से बेटे की शिकायत भरे ख़त को बदल के पढ़ देती हैं कि आपका बेटा बहुत ही क़ाबिल है, इसे घर पर ही रखिए। वहीं बेटा जब ख़त की असलियत तक पहुँचता है तो दंग रह जाता ये पढ़कर कि स्कूल वाले उसे मंदबुद्धि मानते और स्कूल के लायक नहीं समझते... आगे वहीं बेटा थॉमस एल्वा एडीसन बनता है जिनके नाम 1093 खोजों के पेटेंट दर्ज़ है।
      

  एक पिता जो अपने बेटे के लिए स्कूल को ख़त लिख के कहता है- "मेरे बेटे को दिखा सको तो दिखाना, किताबों में छिपा खज़ाना, उसे ये बताना कि बुरे आदमी के पास भी अच्छा हृदय होता है। आप उसे बताना मत भूलियेगा कि उदासी को किस तरह प्रसन्नता में बदला जा सकता है और उसे ये भी बताना कि कभी रोने का मन करे तो रोने में शर्म बिल्कुल ना करे।" उस पिता का नाम अब्राहम लिंकन है।
      

  'पिता के पत्र पुत्री के नाम' 1928 से अगले 3 साल तक जवाहर लाल नेहरू अपनी 11-12 साल की बेटी इंदिरा को अलग-अलग जेलों से ख़त लिखते रहें और नन्हीं सी जान को दुनिया के बारे में बड़ी ही बारीक़ी से हर पहलू को छूते हुए, दुनियादारी से रूबरू कराते रहें।
       

 मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'बड़े भाई साहब' से वो सीखा जा सकता है जो कोई महाग्रंथ नहीं सीखा सकता कभी!
      

  किशोर दा, उनसे सीखा जा सकता है- हर हाल में जीवन का आनंद लेना। कोई जब उनके लिए ये कहता- "एकदम बच्चों जैसे थे किशोर। छोटी छोटी बातों से बहुत ख़ुश हो जाते थे। कभी कभी बारिश को देख इतना ख़ुश हो जाते मानो पहली बार देख रहे हों।" और ये भी कि "महान लोग समय के साथ-साथ और महान होते जाते हैं, क्योंकि आप यह अनुभव करते हैं कि वो कैसे काम करते हैं। यही चीज़ किशोर कुमार के साथ भी हुई।"
     

  शिवमंगल सिंह सुमन जी की कविता 'वरदान माँगूँगा नहीं' बहुतों में से एक मेरे लिए भी जीवन के समंदर में भटक चुके जहाज़ के लिए प्रकाश स्तंभ साबित हुई- "क्‍या हार में क्‍या जीत में किंचित नहीं भयभीत मैं, संघर्ष पथ पर जो मिले, यह भी सही वह भी सही.. वरदान माँगूँगा नहीं।"


परिस्थितियाँ हमें उन अनुभवों से रूबरू कराती हैं जिन तक पहुँचने में हमें कईं साल लग जाए.. बिहार में जन्म लेने के बाद बचपन के कुछ ही हिस्से जी पाया था कि नाना जी का फ़रमान ज़ारी हो गया- जाओ राजस्थान जाओ..यहाँ रहे तो बिगड़(?) जाओगे! और मैं चला गया राजस्थान(नसीराबाद, अजमेर) 12 साल की उम्र में, जहाँ मुझे संजय अंकल जी जैसे शख़्स मिले जो बिहार के ही बेगूसराय जिले से हैं. उनकी बातें कभी सिगरेट पीते हुए मेरे मन में दर्ज़ की जातीं तो कभी तंबाकू रगड़ते हुए कहते तो कभी टेस्ट मैच देखते हुए कभी चेस खेलते हुए. एक बात जो मेरे मन में टँगी हैं उनकी- "उम्मीद नहीं रखनी चाहिए किसी से भी, दुःख की वज़ह है ये." आज मैं जिस किसी भी स्तर पर शतरंज खेल लेता हूँ इसके पीछे संजय अंकल जी ही हैं. उस वक़्त वो कभी कभी ज़बरदस्ती शतरंज खेलने के लिए कहते क्योंकि उन्हें कोई और खेलने लिए मिलता नहीं था जैसे आज मुझे नहीं मिलता तब समझ आता है कि इस वक़्त मुझे भी कोई मन्टू मिले तो मैं भी उसके साथ ज़बरदस्ती खेलूँगा...  हाहाहा...

             श्रीराम जी गुरु जी, शुरुआत में आदर्श विद्या मंदिर के स्कूल में दाख़िले की वज़ह से आप जानते भी होंगे कि इन स्कूलों में सर को गुरु जी और मैडम को दीदी कहना होता है. यहाँ तक कि अपने से बड़े सहपाठी को भैया और दीदी कहना अनिवार्य होता है। कुछ भी करने से पहले संस्कृत का एक एक मंत्र तय है उस काम के लिए। श्रीराम जी गुरु जी, उनको लेकर ये लिखते हुए भावुक हो रहा हूँ। इतना जानिए कि "किसी पर हर तरीक़े से जब भरोसा किया जाता हैं ना तब वो शख़्स क्या कुछ करने के क़ाबिल नहीं बन जाता।" बस ऐसा ही कुछ भरोसा श्रीराम जी गुरु जी का मुझपर था!

भय का सकारात्मक पहलू क्या और किस हद तक हो सकता है ये नाना जी से सीखा और अभी भी सीख रहा हूँ। 

नानी, जो मेरी माँ से भी पहले माँ है, उनके होने से ही मैं हूँ... और क्या कहूँ ?

कुछ दोस्त, नहीं नहीं कुछ तो नहीं कहा जा सकता, बहुत सारे हैं.. जिनमें लड़के लड़कियों की बराबर अनुपात तो नहीं पर आस पास के अनुपात में ज़रूर है और दोस्तों की अहमियत के बारे में क्या लिखना ? दोस्तों का जीवन में होना ही नेमत है, इनायतें हैं :)

छोटा भाई, रवि, जिसके लिए मैं कहता भी हूँ और सोचता भी हूँ कि इसे बड़ा होना चाहिए था। पर कोई नहीं! रवि, सिनेमा से जुड़े विषयों में ख़ुद का भविष्य देखता है, देख रहा है। तो स्वतः ही एक ऐसी ज़िम्मेदारी(?) मेरे कंधे पर आ जाती है कि रवि सिनेमा से जुड़ा हुआ कोई भी सवाल कभी भी पूछ ले तो मैं बताने के क़ाबिल रहूँ, ज़्यादातर बारी कामयाब रहता हूँ, ऐसा मेरा मानना है.. हाहाहा

दीदी, मधु दीदी.. जिनके रेडियो पर विविध भारती सुनने या कोई कोई फ़िल्म को रेडियो पर सुनने की आदत ने, मुझ अबोध बालक(?) के दिलोदिमाग पर ऐसी लकीरें खींची कि ताउम्र गीत-संगीत-सिनेमा से मैं ख़ुद को अलग रखने की सोच भी नहीं सकता.. और सोचना है भी नहीं।

छोटी बहनें- सब्बू, सोनी, स्नेहा। इनका होना जैसे बचपन के उन पलों को फ़िर से जीने जैसा है जिन पलों को उस वक़्त में शायद परिस्थितियों ने चाहा नहीं था..या जो कुछ भी।

माँ-पापा ❤

सोशल मीडिया के हमराही- टेक्नोलॉजी दोधारी तलवार है, आप इसका इस्तेमाल कर प्लूटो तक जा सकते हैं और इसी का इस्तेमाल कर गर्त(?) में आसानी से जा सकते हैं, आपके हाथ में हैं। चुनाव का सारा मामला हमारे हाथ में ही होता है, कभी कभार वो चुनाव किसी दूसरे के मन के रास्ते से हमतक आने लगता है पर रहता चुनाव अपना ही। जो कोई भी शख़्स सोशल मीडिया के दरवाज़े से मेरी ज़िंदगी(?) में दाख़िल हुए या जिनको मैंने कहा आगे होके कि आप आ जाइए, उन सबका तहेदिल से शुक्रिया... कईयों को उनके नाम की किताबें दे चुका हूँ, कईं ऐसे हैं जो मिलेंगे तो किताबें दे दूँगा 💃

साहित्य- इसके दायरे में मैं सबकुछ को मानता हूँ, सबकुछ। सआदत हसन मंटो का लिखा भी और छोटे छोटे बच्चों का खिलखिला के हँसना भी। माँ का ये कहना भी कि "दही-भूजा खा ले।" साहित्य न होता तो जीवन क्या होता... डूबोया मुझको होने ने, कुछ न होता तो ख़ुदा होता _/\_

...और आख़िर में रोजर विलियम्स की कही बात- "दुनिया का सबसे बड़ा अपराध है अपनी क्षमता का विकास न कर पाना।"

        ...और भी बहुत जने, जिनसे सीखने को बहुत कुछ मिला और बहुत कुछ मिलना अभी बाक़ी है, लेकिन उन्हें गुरु(?) का दर्ज़ा देना अभी जल्दबाज़ी होगी। 

और इस बात की गाँठ- "..तेरे अंदर एक समंदर, क्यों ढूँढे तब्के-तब्के"


       कबीर के ही दोहे से ख़त्म करते हैं इसे- "मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर। अब देवे को क्या रहा, यो कथि कहहिं कबीर।। अर्थात यदि अपना मन तूने (गुरु) किसी को दे दिया तो जानो सब दे दिया, क्योंकि मन के साथ ही शरीर है, वह अपने आप समर्पित हो गया। अब देने को रहा ही क्या है।


:)



गुनगुना लीजिए :)


आते-जाते, ख़ूबसूरत, आवारा सड़कों पे

कभी-कभी इत्तेफ़ाक़ से...


आते-जाते, खूबसूरत, आवारा सड़कों पे

कभी-कभी इत्तफ़ाक़ से कितने अनजान लोग मिल जाते हैं


उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं

उनमें से कुछ लोग भूल जाते हैं, कुछ याद रह जाते हैं...


मन :)

शनिवार, सितंबर 05, 2020

फ्रेंड रिक्वेस्ट

पहली नज़र का प्यार कहा जा सकता है। यश राज बैनर की फिल्मों की देन थी कि खेलने कूदने खाने की उम्र में प्यार-मोहब्बत की बातें। वहीं नदी, पहाड़, बारिश, झरने, छत, मैदान, पेड़ के नीचे हीरो-हीरोइन गाना बजाना और आँखें चार करना। नितिन का भी कुछ यूँ ही था ज्योति के साथ।

दोनों क्लास के टॉपर थे पर नितिन जानबूझ कर सवाल ग़लत कर आता और ज्योति को टॉप होने देता। राहुल 4th, नितिन के लिए 'रांझणा' के मुरारी जैसा। 4th इसलिए कि क्लास में चार राहुल थे। कहने के लिए राहुल और नितिन पक्के जिगरी। एक को काटो तो दूसरे से खून निकलता टाइप।

राहुल जानता था कि नितिन ज्योति के लिए मरा जा रहा है। ज्योति भी जानती थी। क्लास में सभी जानते थे। श्वेता जो ज्योति की जिगरी थी, इस प्रेम-कहानी की विलेन बनी जैसे यश राज बैनर की फिल्मों में लड़की का पिता विलेन बनता है। मोहब्बत पर बने गाने को ज्योति से जोड़कर गाया जाने लगा।

राहुल छोटी से छोटी उम्मीद की किरण खोज लाता कि भाई वो भी चाहती है। नितिन के पर उगे, वो श्वेता की नज़रों से बचकर ज्योति के साथ उड़ने के सपने देखता। उसने ज्योति से उसकी फोटो माँगी पर ज्योति ने मना कर दिया। कई दिन ऐसा चलता रहा तब राहुल के दबाव से वो मुक़ाम आया जो हर प्यार में आता ही है।

एक दिन तय हुआ कि मिशन को अंजाम दिया जाए। पेज फाड़ा गया, दिल बनाया गया, आई लव यू लिखा गया, शायरी लिखने की योजना स्थगित करके नीचे नाम में लिखा गया- नितिन। और साथ में 'यस' और 'नो' ? भी लिखा गया। पर ये सब राहुल की हैंडराइटिंग में लिखा गया और चुपके से ज्योति के बैग में रख दिया गया।

पढ़े जाने के पहले तक नितिन-राहुल के दिल में धुकधुकी शुरू। ज्योति ने अकेले में पढ़ा और बिना कुछ बोले, बिना फाड़े प्रेमपत्र खिड़की से बाहर फेंक दिया। पर ज्योति की चुप्पी ने नितिन की धुकधुकी को और बढ़ा दिया। श्वेता सोचती रही माज़रा क्या है।

राहुल नितिन को बधाई देने लगा। ज्योति मॉनिटर होने के नाते क्लास चुप कराने लगी। हिंदी वाले मास्टर साब पढ़ाने कम अपना रोना रोने के लिए आ गए। मौसम बदल गया अचानक। वॉयलिन बजने की आवाज़ सिर्फ़ नितिन को सुनाई देने लगी।

कईं दिनों तक नितिन इशारों में ज्योति से पूछता रहा 'यस' और 'नो' ? कभी ब्लैकबोर्ड पर लिख आता, कभी उसकी कॉपी में, कभी बेंच पर, कभी खेलते टाइम ग्राउंड में। ज्योति देख लेती पर कहती कुछ नहीं। इसे नितिन 'यस' ही समझता और यश राज बैनर की फिल्में ख़ूब देखता और राहुल के सामने एक्टिंग करता।

एक दिन खो-खो में राहुल की टीम जीत गयी और उसने ज्योति-श्वेता को चिढाना शुरू कर दिया। इसका बदला कैसे लिया जाए इस उलझन में श्वेता, ज्योति को बिना बताए खिड़की के बाहर गयी, उठा लाई प्रेमपत्र और क्लास टीचर के सामने रख दिया। अब राहुल-नितिन के दिल में एकदम अलग टाइप की धुकधुकी शुरू हो गयी।

क्लास टीचर कतई ब्योमकेश बक्शी बन गया। 

श्वेता से पूछा- "किसने किसके लिए लिखा है ये?"

श्वेता- "नितिन ने ज्योति के लिए।"

टीचर- "नितिन इधर आओ।"

नितिन धुकधुकी लिये सर के पास गया।राहुल धुकधुकी लिये बेंच में घुसने लगा। 

टीचर- "तुमने लिखा?"

नितिन- "नहीं सर,मैंने नहीं।" 

टीचर- "नाम तो तुम्हारा हैं?"

अब बोलने की बारी ज्योति की थी। 

 ज्योति- "सर ये हैंडराइटिंग राहुल की है।"

राहुल, नितिन से ज्यादा धुकधुकी लिये गाल पर हाथ रखे सर के पास पहुँचा। 

श्वेता- "सर, हैंडराइटिंग राहुल की है पर नितिन ने ज्योति के लिए लिखवाया है।"

नितिन- "नहीं सर, मैं कुछ जानता ही नहीं।"

ज्योति एकदम चुप...

क्लास टीचर ने पहले नितिन को एक चाँटा जड़ा। राहुल की धुकधुकी दो झन्नाटेदार चाँटा पड़ने के बाद कम हुई। ज्योति, नितिन को देखती रही, श्वेता मुस्कुराई और पूरी क्लास का मनोरंजन तो हो ही रहा था।

पूरे माज़रे में नितिन बेदाग निकला। सोचता रहा यश राज बैनर की फिल्मों में ऐसी सिचुएशन को हैंडल करना बताया ही नहीं था। राहुल को मिड टर्म देने से रोक दिया गया और 3 महीने के लिए स्कूल-निकाला दे दिया गया। श्वेता और ख़ुश हो सकती थी पर 'नितिन बच गया' ये बात उसकी ख़ुशी में कटौती कर देती थी।

ज्योति जो कभी इक़रार नहीं कर पाई और देर-सवेर नितिन को 'यस' कह ही देती पर अब सोचती है कि नितिन झन्नाटेदार चाँटे नहीं खा सकता तो आगे क्या ही कर सकता है उसके लिए। नितिन अब यश राज बैनर के बजाय अनुराग कश्यप की फिल्में देखता है। सवाल भी ग़लत करके नहीं आता।

श्वेता सोचती है कि 3 महीने कब बीतें कि राहुल को सॉरी बोला जाए। 


अगले साल बोर्ड के एग्जाम में नितिन और ज्योति दोनों जिले के मेरिट लिस्ट में आए। अख़बार में दोनों की फोटो छपी और इस तरह नितिन के पास ज्योति की फोटो आ गई। जिसे वो कभी-कभार देख लेता है अब। दुआ कर लेता है...जगजीत सिंह को ख़ूब सुनता है!

बाद के दिनों में नितिन की लाइफ में जितनी भी लड़कियाँ आयीं, सब में नितिन, ज्योति को खोजता रहा। इस मलाल के साथ जीता रहा कि उसदिन सच बोल के झन्नाटेदार चाँटा खा लेता, 3 महीने के लिए स्कूल निकाला झेल लेता तो शायद!  ज्योति साथ होती..शायद! 

अब इस बात को अरसा हो गया।

 ...और अब किसी एक का एक के पास फेसबुक पर फ्रेंड रिक्वेस्ट पेंडिंग है।


:)