7 मार्च 2015

होली..डूबता सूरज !

सर्दी के उतरते और गर्मी के चढ़ते मौसम में गेहूँ से अटे पड़े खेतों के किसी एक पगडंडी पर ख़ुद को सँभालते हुए डूबते सूरज को देखना..देर तक...ईंट की चिमनी से निकलता काला धुआं,सूरज को मुंह चिढ़ाते पूरब की ओर जाते हुए जिधर से बच्चों के खेलने की आवाजें आ रही हैं...

कल होली थी..हाँ ! होली, जिसमें बस बनावटी रंग शेष रह गया है।बचपन की होली अब नहीं है,धीरे-धीरे सब ख़त्म हो रहा है।शहर में तो बस एक छुट्टी का दिन है और गाँव में भी कहने लायक कुछ बचा नहीं।सारी परम्पराए और मायने अब केवल यादों में है।हमसब नहीं,जिम्मेदार वक़्त है शायद!

ढ़ोल-ढफली-झाल-मंजीरे की जगह अब कानफोड़ू और बेहूदगी की आखिरी हद तक की भोजपुरी गीतों ने ले लिया है।नशा करने की लत अपने चरम सीमा पर..पर 'बुरा न मानो होली है' सब जायज़...छोटे बच्चे को सबकुछ दीखता है? वक़्त बताएगा...

अबीर और रंग से ढकी हुई,शिकायतें सबके चेहरे पर दर्ज़ है।एक-दूसरे को सब पढ़ सकते हैं।पूछना कोई नहीं चाहता।गाँव के बड़े-बुजुर्ग जो उम्र की आखिरी दहलीज़ पर हैं,माथे पर अबीर का बोझ लिये कुर्सी पर बैठे उबड़-खाबड़ सड़क पर आते-जाते हर एक को पढ़ रहे हैं...पिछले साल की तरह इस साल भी,हाथ कुछ नहीं लगता मलाल के...

जो बाहर कमाने गये हैं वो अब होली पर गाँव नहीं आते,उनके घर-परिवार के लिए पैसे आ जाते हैं...बाज़ार जाइए और होली खरीद लाइए !

किस तरफ़ रहना पसंद करेंगे? पीछे छूट गए समय की तरफ़,जिसपर धूल की कईँ परत बैठती जा रही है सुकून से या कानफोड़ू भोजपुरी गीतों की तरफ़ ? (दोनों जायज़ है)

एक और रास्ता(?) है... मेरी तरफ़,हर दिन की तरह कल का दिन भी वैसे ही डायरी में दर्ज़ होते हुए गुजरा-सुबह की चाय में चीनी कम और चायपत्ती ज्यादा,अदरक और काली मिर्च स्वादानुसार,माँ के हाथ का खाना,मोबाइल के छोटे स्पीकर से धीमी आवाज़ में गाने सुनना,किसी कहानी के किरदार को ज़ेहन में उतारते हुए सो जाना,शाम को गाँव से दूर चिमनी के नीचे से डूबते सूरज को देखना..देर तक...

                                                              - मन

16 टिप्‍पणियां:

  1. Shor-sharabe,Nashakhori aur Be-arth rishton kee dikhawati garmi se kahin zyada rang bikhere tumhaari Holi ne ...HOLI MUBARAK!

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  2. हर त्यौहार की कहानी एक सी ही आज ... पर क्या हमारी सोच ... हमारी पैसे की भूख ने नहीं ये सब पैदा किया ... बनावटी बनाया ... जब हाँ तो भुगतना भी तो हमें ही है ...

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    1. भुगतना तो हमें ही है... सही !

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  3. समय तो बीतना ही है, चाहे उल्लास गँवाकर बीते चाहे उत्सव मनाकर ...

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  4. समय के साथ बहुत कुछ बदला हैं .... पर हमें खुद से पूछना चाहिए हम कितने बदले हैं
    http://savanxxx.blogspot.in

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  5. यथार्थ लिखा है मन आपने। आपका ब्लॉग कुछ समय से पढ़ रही हूँ आपकी सोच और अलहदा लेखन शैली दोनों ही प्रभावित करने वाली हैं। बधाई
    जानती हूँ आपका समय अमूल्य है पर एक बार dj के ब्लॉग्स एक लेखनी मेरी भी और नारी का नारी को नारी के लिए का अवलोकन भी करलें ब्लॉग जगत में नए नए कदम रखने वाले हम जैसे तथाकथित लेखकों भी आपके मार्गदर्शन की आवश्यकता है
    http://lekhaniblog.blogspot.in/ एक लेखनी मेरी भी
    http://lekhaniblogdj.blogspot.in/ नारी का नारी को नारी के लिए

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  6. आप के ब्लॉग की जितनी भी तारीफ की जाए कम है आज पेपर में आपके आर्टिकल को देखा में मुझे बहुत अच्छा लगा मैं भी अपने ब्लॉग पर काम रहा है हु जो की मनोरंजन से सम्बंधित है शायद आपको पसंद आये http://guruofmovie.blogspot.in

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  7. होली को कभी ज्यादा उत्साह से नहीं मना पाया। इसलिए बस ये इक दिन ही रह गया है मेरे लिए परिवार से मुलाकात का। बाकी वक़्त के साथ गाँव के बदलते परिवेश का जो खाका आपने खींचा है वो जीवंत लगा। लेखन ज़ारी रखिए अब तो दीपावली आ गई है..

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    1. :)
      स्वागत है आपका..
      लिखेंगे जरूर !
      धन्यवाद...

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  8. समय निरंतर परिवर्तन शील है। वक्‍त के साथ सब कुछ बदल जाता है।

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  9. . बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  10. this thing is seen by many of us but you writing all of this is just making us realise what we are losing.
    great

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आपका कुछ भी लिखना,अच्छा लगता है इसीलिए...
कैसे भी लिखिए,किसी भी भाषा में लिखिए- अब पढ़ लिए हैं,लिखना तो पड़ेगा...:)