17 नवंबर 2012

कुछ तो बाकी है...

कहीं कुछ बाकी है
निशां है,अभी भी
आँखों को यकीं नही
पर
आँसू आ जाते हैं गवाही देने |
यूँ तो सांसों से शुरू हुई ज़िंदगी,
अब यादों से है चलती
साँसे तो अभी भी है,
पर ज़िंदगी पीछे झाँक रही है |
जो गुजरी है इस ज़िंदगी पर,
ना कभी बतायेंगे
बस कुछ बूँदे,घर बसाए
बैठे हैं पलकों पर |
कुछ मिलता है और
बहुत कुछ पीछे छूट जाता है
लोग बेहिसाब याद आते है...
शायद,
कभी खुद से मिलना नही चाहिए |

                                    - "मन"

11 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ मिलता है और
    बहुत कुछ पीछे छूट जाता है
    बहुत सही

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  2. बहुत कुछ पीछे छूट जाता है
    लोग बेहिसाब याद आते है...
    mango man sahab.....
    laajawaab kar gaye aap............

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  3. ये बेहिसाब याद आने वाले लोग खुद में समा जो जाते हैं...बहुत याद आते हैं ...

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  4. बहुत ही हृदयस्पर्सी शब्दसंयोजन है ।साधुवाद

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  5. बहुत सुन्दर...कोमल हृदयस्पर्शी रचना..
    सस्नेह
    अनु

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  6. कोमल हृदयस्पर्शी ...
    भावपूर्ण रचना.....

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  7. संवेदनशील प्रस्तुति - बहुत सुंदर

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  8. खुद से मिलना , इतना आसान नहीं है |
    और जो खुद से मिल लिया समझो वो खुदा से मिल लिया |

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  9. इन बूंदों को छलक जाने देना चाहिए ... तभी खुद से मिलना अआसान होता है ...
    लाजवाब ...

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