23 सितंबर 2014

राष्ट्रकवि दिनकर~अपने समय का सूर्य हूँ मैं...

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की आज 106वीं जयंती हैं। उन्हें अलविदा कहे हुए 40 साल से अधिक का वक़्त बीत चूका है मगर उनकी रचनाएं आज भी उनके 'चाहने वालों' की जुबां पर बनी हुई हैं।इनका जन्म बिहार के बेगुसराय(तत्कालीन मुंगेर)जिले के सिमरिया गाँव में हुआ था। यह गाँव मिथिला-भूमि का एक तीर्थ स्थल भी माना जाता है जो दो नदियों से घिरा हुआ है। गंगा नदी पर निर्मित राजेंद्र सेतु का उत्तरी किनारा सिमरिया गाँव के साथ लगता है। रामधारी सिंह पिता बाबु राव सिंह व माता मनरूप देवी की दूसरी संतान थे। किसान परिवार से सम्बंधित दिनकर अभी एक साल के थे तब पिता जी अलविदा कह गये,माँ आर्थिक हालात से जूझते हुए बेटों को पाला और पढाया।कम उम्र में ही विवाह हुआ और इनकी हमसफ़र ने पढाई तथा साहित्य साधना में पूरा सहयोग दिया।

दिनकर कहते हैं
                     
               "मैं न तो सुख में जन्मा था,न सुख में पलकर बढ़ा हूँ किन्तु मुझे साहित्य का काम करना है और यह विश्वास मेरे भीतर छुटपन से ही पैदा हो गया था। इसलिए ग्रेजुएट होकर जब मैं परिवार में रोटी अर्जित करने में लग गया तब भी,मेरी साहित्य की साधना चलती रही"


'युवक' पत्र जिसे रामवृक्ष बेनीपुरी निकालते थे में दिनकर की रचनाएं प्रकाशित हुई 'अमिताभ' नाम से।1928 में मैट्रिक पास की,1930 में गाँधी जी के 'नमक सत्याग्रह' में भागीदारी की किन्तु अपने पारिवारिक जीवन के दायित्वों के कारण बीए करने के लिए पढाई जारी रखनी पड़ी। बीए पास करने के बाद उन्होंने 55₹ मासिक पर एक स्कूल में हेडमास्टर की नौकरी शुरू की पर एक जमींदार द्वारा संचालित इस स्कूल में अंग्रेजीयत का बोलबाला और साम्राज्यवादी हस्तक्षेप के रहते उसे छोड़ 1934 में सब रजिस्ट्रार की नौकरी हासिल की और 1943 तक इस पद पर रहें। आज़ादी के बाद उन्हें प्रचार विभाग का डीप्टी-डायरेक्टर बना दिया गया।नौकरी से ऊबे हुए दिनकर ने 1950 में इस्तीफा दे दिया,इसके बाद बिहार सरकार ने मुज्जफरपुर के पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज में हिंदी के विभागाध्यक्ष के पद पर नियुक्त किया।1952 में इस पद को त्याग कर राज्यसभा के सदस्य बने,इसके बाद भागलपुर विश्वविद्यालय में उप कुलपति रहे।1965 से 1971 तक भारत सरकार के हिंदी सलाहकार रहें।


1928 में 'प्रण-भंग' उनकी पहली प्रकाशित रचना मानी जाती है जो अब मौजूद नहीं है।1959 में उन्हें पद्मभूषण मिला।उनके काव्य संग्रह 'उर्वशी' के लिए 1972 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजे गये।'संस्कृति के चार अध्याय' के लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला था।उनकी रचनाओं को कईं विदेशी भाषाओं में अनुदित होने का गौरव प्राप्त है,उनकी 'संस्कृति के चार अध्याय' को जापानी भाषा में अनुवाद किया गया है।उनकी प्रमुख कृति है 'उर्वशी' 'रश्मिरथी' 'संस्कृति के चार अध्याय' 'चक्रव्यूह' 'हुंकार' 'आत्मजयी' 'कुरुक्षेत्र' 'वाजश्रवा' 'परशुराम की प्रतीक्षा'
"कलम आज उनकी जय बोल" "आशा का दीपक" "हिमालय" "चाँद का कुरता" "नेता" दिनकर साहब की ये पांच छंद-कविता में उनके साहित्य के पांच रंग को आसानी से देखा जा सकता है।

हरिवंश राय बच्चन ने कहा था ~

        "दिनकर जी को एक नहीं गद्य-पद्य-भाषा-हिंदी सेवा के लिए अलग-अलग चार ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया जाना चाहिए"


('महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रिय हिंदी विश्वविद्यालय' जो की महाराष्ट्र के वर्धा में स्थित है। इस विश्वविद्यालय का अभिक्रम www.hindisamay.com ~ 'हिन्दी साहित्य सबके लिए' पर आप राष्ट्रकवि दिनकर को पढ़ सकते हैं)


'आज भी अछूता है दिनकर का गाँव'
पत्रकार सुरेश चौहान लिखते हैं ~
              
          "दिनकर का यह गाँव(सिमरिया),जहाँ दसवीं पास करने के बाद लड़के व लड़कियों को जिला मुख्यालय की ओर टकटकी लगाना पड़ता है। जहाँ प्रसव के लिए निजी अस्पतालों पर ही निर्भर होना पड़ता है। जहाँ बिजली के लिए लोगों को बरौनी थर्मल के राख से चेहरा और फेफड़ा काला होता जा रहा है। जहाँ रह-रह कर कल-कल करती गंगा उफान और दहाड़ मारती हो। जहाँ हर वक़्त किसानों की जमीन पर ईंट चिमनियों के धुएं दूर आसमान तक बाजारवाद का पोषक बन मंडरा रहे हों। ऐसी स्थिति में आज भी सिमरिया के लोगों के समक्ष यह जटिल प्रश्न है कि आखिर कैसे होगा आदर्श ग्राम सिमरिया"


दिनकर की जयंती हो या पुण्यतिथि हर बार राष्ट्रकवि के आशियाने को राष्ट्रिय स्मारक के रूप में सजाने-सँवारने के कवायद की घोषणा की जाती रही हैं और यह घोषणा विगत तीन दशक से की जा रही है।घोषणाओं का यह सिलसिला 1 नवम्बर 1986 से चल पड़ा।
      
       "तुमने दिया राष्ट्र को जीवन,राष्ट्र तुम्हें क्या देगा।
      अपनी आग तेज रखने को,नाम तुम्हारा लेगा।।

ये पंक्तियाँ दिनकर ने महात्मा गाँधी जी के लिए लिखी थी पर आज के समय में दिनकर पर ही ये पंक्तियाँ चरितार्थ हो रही है। दिनकर ने जिस समाज और राष्ट्र की कल्पना अपनी कविताओं में उकेरने की कोशिश की थी'वो वक़्त की परत में दबती जा रही है या यूँ कहें कि आज के पीढ़ी को उनकी साहित्य साधना केवल पढ़कर उन्हें याद कर उनके जन्मतिथि या पुण्यतिथि पर कोई कार्यक्रम आयोजित कर पल्ला झाड़ लेना चाहती हो !

रामधारी सिंह दिनकर ने "मंदिर और राजभवन" नाम से लगभग दो पन्नो में एक लेख लिखा है। उसके कुछ अंश ~
           
मंदिर है उपासना का स्थल,जहाँ मनुष्य अपने-आपको ढूंढ़ता है।
राजभवन है दंड-विधान का आवास,जहाँ मनुष्यों को शांत रहने का पाठ पढाया जाता है।
मंदिर कहता है,"आओं,हमारी गोद में आते समय आवरण की क्या आवश्यकता?पारस और लोहे के बीच कागज का एक टुकड़ा भी नहीं रहना चाहिए;अन्यथा लोहा ही रह जायेगा।"
और राजभवन कहता है,"हम और तुम समान नहीं हैं। हम प्रताप की पोशाक पहने हुए हैं तुम अधीनता की चादर लपेटे आओं क्योंकि हम शासक हैं और तुम शासित,हम तुम्हें गोद में नहीं बिठा सकते,अधिक से अधिक अपनी कुर्सी के पास स्थान दे सकते हैं"
मंदिर कहता है,"लोग संसार में लिप्त है,वासना के रोगों से पीड़ित हैं,हम उन्हें संसार से विरक्त करेंगे जिससे दंड विधान की जरुरत ही नहीं रह जाय।"
राजभवन कहता है,"लोग संसार में अनुरक्त है और जबतक वे अनुरक्त हैं तब तक उनपर पहरा देने के लिए एक सत्ता की जरुरत है। वह सत्ता हम हैं।"
    
    मंदिर कहता है "हम मनुष्य को सुधारेंगे"
    राजभवन कहता है "हम मनुष्यों पर शासित करेंगे"

गाँधी जी अहिंसा सिखाते-सिखाते स्वयं हिंसा के शिकार हो गये।मंदिर गिर गया और राजभवन का दंड-विधान अपनी जन्मपत्री में अपना भविष्य देख रहा है।
गाँधी जी के मृत्यु के साथ संसार की एक पुरातन समस्या,मनुष्य-जाति का एक प्राचीन प्रश्न फिर अपनी विकरालता के साथ हमारे सामने आया है"

आज के समय में राजभवन भी जरुरी है और मंदिर भी ! 2 अक्टूबर आने ही वाला है !
बलिदान एवं वीरता का राग अलापने वाले,अन्याय एवं अत्याचार के विरुद्ध क्रांति का भीषण शंखनाद करने वाले तथा कर्तव्य एवं प्रेरणा का दिव्यलोक वितरित करने वाले राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर 24 अप्रैल 1974 को अलविदा कह गयें !
      
      "कहाँ सिमरिया घाट,कहाँ दिल्ली का दूर नगर है
      मानचित्र पर ढूंढों कविवर कहाँ तुम्हारा घर है...

बिहार की मिट्टी की सोंधी गंध में प्रस्फुटित हो-दिल्ली तक खुशबुओं को बिखरने वाले लब्ध प्रतिष्ठ कवि दिनकर अपने भव्य व्यक्तित्व,सादा जीवन एवं उच्चादर्स के लिए प्रसिद्ध रहे हैं।

दिनकर ने एक जगह स्वयं के बारे में लिखा है 

"मर्त्य मानव की विजय का तुर्य हूँ मैं,उर्वशी अपने समय का सूर्य हूँ मैं"

आज वहीँ सूर्य,वहीँ दिनकर,बिहार सरकार,साहित्य अकादमी और साहित्यिक संस्थाओं,गंगा को बचाने वाले लोग,रिफायनरी प्रशासन की उदासीनता का दंश झेल रहे हैं। आखिर क्यों कोई दिनकर के लिए करे-धरे?दिनकर तो राष्ट्र के लिए जिया।एक राष्ट्र उन्हें क्या दे सकता है?जब-जब सत्ता के लोगों को दिनकर की जरुरत पढ़ती है,वे दिनकर का नाम लेते रहते हैं...दिनकर को और क्या चाहिए...

उनका गाँव(?)सिमरिया उनकी जयंती के मौके पर हर साल उनकी याद में कार्यक्रम आयोजित करता है।इस बार भी वहां दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन है।

राष्ट्रकवि दिनकर~"अपने समय का सूर्य हूँ मैं..."
                         
                                                                                                                                                               - मन

*साभार~अख़बार

6 टिप्‍पणियां:

  1. साझा करने के लिए धन्यवाद, उनकी रचनाएं हमेशा हमें उनकी याद दिलाती रहेंगी

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  2. दिनकर जी के बारे में विस्तार से जानकारी देने के लिए आपका व्यक्त करता हु

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  3. Tumne vah sab padhwa diya, jo abhi tak main nahin padh saka tha.Ab lagta hai ki yah janna zaruri tha. Dhanyawad!

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