20 मार्च 2013

एक ज़िंदगी की तरह...

कभी खुद का दीदार किए हों,
कभी समझे हों,इस जहाँ में
तुम्हारे होने का मतलब
कभी सोचे हों,
उम्मीद के कई धागे तुमसे जुड़े हैं
तुम्हारा बस होना भर ही,
किसी के लिए ज़िंदगी है...
और तुम्हें इसकी खबर तक नही |
कभी किए हों,
कुछ सुलझाने की एक पहल
खुद से उलझते जाते हों...
फिर सामने होती है एक और पहेली |
कभी कोशिश किए हों,
खुद को समझे बिना
दुनिया को समझना...
मुमकिन है पर आसान नही |
सच तो सच ही है
कोई सा तरीका अपनाकर,
समझा सकते हों खुद को
पर ये भी सच है कि
बस हम खुद को समझ जाए
और
ये उम्मीद करें कि
अंत में सबकुछ ठीक होगा,
एक फ़िल्म की तरह...
एक ज़िंदगी की तरह...

                      - "मन"

12 टिप्‍पणियां:

  1. .बहुत सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति . आभार हाय रे .!..मोदी का दिमाग ................... .महिला ब्लोगर्स के लिए एक नयी सौगात आज ही जुड़ें WOMAN ABOUT MAN

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  2. तुम्हारा बस होना भर ही,
    किसी के लिए ज़िंदगी है...
    -----------------------
    कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर के शब्दों में ----- यदि तुम जीवन से सूर्य के जाने पर रो पड़ोगे तो आँसू भरी आँखे सितारे कैसे देख सकेंगी? .

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  3. बहुत खूब ......यही मुमुक्षा चाहिए.........

    खुद को समझे बिना
    दुनिया को समझना...
    मुमकिन है पर आसान नही |.........नामुमकिन ही है ।

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  4. सच तो सच है ... सच को समझना मुश्लिल नहीं ...
    ओर सच के लिए खुद को समझना जरूरी है ... बहुत खूब ...

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  5. सुन्दर भावनात्मक प्रस्तुति... अंत भला तो सब भला... शुभकामनायें...

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (24-03-2013) के चर्चा मंच 1193 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  7. achchi rachana , badhai ho! aap bhi mere blog par ayen , aapka swagat hai.

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  8. इसके बाद में तुम्हारी ही एक पोस्ट कहती है कि कुछ सही गलत नहीं होता वैसे ही मुझे लगता है कि कुछ अच्छा या बुरा भी नहीं होता ,
    जाकी रही भावना जैसी | :)

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कैसे भी लिखिए,किसी भी भाषा में लिखिए- अब पढ़ लिए हैं,लिखना तो पड़ेगा...:)