3 जून 2013

खुदगर्ज

उन्होंने
हर बात
हर समय
हर किसी को
बताई नहीं
उन्हें
और उनकी बातों को
समझने वाले
जरुरत से कुछ कम मिलें
उन्होंने
एक कल छोड़ आया था
एक कल के इंतजार में
उन्हें
भरोसा था खुद पर
अपने करीबी से भी ज्यादा
उन्होंने
यादों को पलकों पर रखकर
जाने दिया था लोगों को
वक्त के साथ
न चाहते हुए भी
उन्हें
एक देहरी लाँघकर
जाना पड़ा था उस पार
उन्हें
कुछ न कहना बेहतर लगा
खुद की नज़र में गिरने के बजाय
शायद इसीलिए
दुनिया की नज़र में
वे खुदगर्ज कहलाएँ
क्योंकि,
उनकी फ़ितरत में था
केवल जरुरत भर के लिए
किसी की ज़िंदगी में शामिल न होना...

                                   - "मन"

11 टिप्‍पणियां:

  1. उनकी फ़ितरत में था
    केवल जरुरत भर के लिए
    किसी की ज़िंदगी में शामिल न होना...या शामिल होना???

    अच्छे भाव हैं!!!
    अनु

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  2. kabhi kabhi bhaw sugbugahat si paida kar detey hai...aisa hi kuch hai aapki rachna mein!

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  3. कुछ न कहना बेहतर लगा
    खुद की नज़र में गिरने के बजाय..
    ---------------
    .............

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  4. क्या बात बेहतरीन लिखा है

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  5. अकेलेपन की त्रासदी........बहुत सुन्दर ।

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  6. उन्हें
    कुछ न कहना बेहतर लगा
    खुद की नज़र में गिरने के बजाय
    शायद इसीलिए
    दुनिया की नज़र में
    वे खुदगर्ज कहलाएँ...
    बहुत भावपूर्ण...

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  7. आपकी इन पंक्तियों ने दिल छु लिया..
    " उन्हें
    कुछ न कहना बेहतर लगा
    खुद की नज़र में गिरने के बजाय
    शायद इसीलिए
    दुनिया की नज़र में
    वे खुदगर्ज कहलाए"
    बहुत सुंदर रचना ... बधाई

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  8. ऐसी खुदगर्ज़ी ही चाहिए.जो खुद्दारी है...खुद को दूसरों की बस ज़रूरत बना देना खुद का अपमान ही तो है!
    अच्छी कविता.

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  9. एक और लाजवाब रचना ... खुदगर्जी को अलग नज़र से देखा है ... खुद के अंदर तक झाँक के लिखी ईमानदार रचना है ...

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कैसे भी लिखिए,किसी भी भाषा में लिखिए- अब पढ़ लिए हैं,लिखना तो पड़ेगा...:)