11 सितंबर 2012

जीने की कसम खाई है अब...

उलझते सपने,सुलझे अब
पलकों तले,कुछ ख्वाब ढले अब |
भीड़ से अलग दिखें और
उस पार जाने का,कोई धुन चढ़े अब |
कुछ खोने से लेकर पाने की चाहत तक
मंजिल की ओर बढते जाए अब |

कुछ पाना है,कुछ कर दिखाना है,
कोई आस लगाए,घर बैठा है अब |

अब तो,
जीने के सहारे से गुजारिश है कि,
सब छोड़ गए,तू न छोड़ जाना अब |

रास्ते खत्म नही होते,जिंदगी के सफर में,
मंजिल तो वहीँ है,जहाँ ख्वाहिशें थमे अब |

जिंदगी की राहें सीधी हैं,गिले-शिकवे तो उन्हें हैं,
जिनकी चाल ही टेढ़ीं है अब |

ऐ रुख ज़रा पलट और,
कह दे उन मुश्किल हालातों से कि
मैंने हर हाल में जीने की कसम खाई है अब |

                                       - "मन"

21 टिप्‍पणियां:

  1. kamaal kar diya behtareen rachana...mann jeene ka ye ek salika he jo kuchh shabdon me tumne bata diya..

    sundar or saarthak kavita.

    Ehsaas...

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  2. मैंने हर हाल में जीने की कसम खाई है अब |

    हमेशा यही सोच रखना...जीवन में सदा आगे बढ़ो...शुभकामनाएँ !!

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  3. बहुत सुन्दर मन्टू....
    तुम्हारी तस्वीर और तुम्हारे नाम से लगता है कि कोई बच्चा है...मगर तुम्हारी रचनाएँ कहती हैं कि कोई बहुत अनुभवी इंसान है...जिसने दुनिया देख रखी है..लगता है एक बरस में ४-४ बरस जी गए हो तुम....
    अनंत शुभकामनाये तुम्हें और तुम्हारी लेखनी को...
    अनु

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    1. :)शायद यह काव्य-लीला का चमत्कार हो |
      आपकी यहाँ उपस्थिति मात्र,मेरे लिखने के जज्बे को और बढाती है |
      बहुत-बहुत आभार..|

      सादर |

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  4. बहुत सुन्दर मैंगो मन
    मै अनुजी की बातों से एकदम सहमत हूँ......
    अनंत बधाई.......

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    1. शुक्रिया भईया...|
      बस आप लोगों की दुआ,मेरे लेखनी के लिए दवा साबित हो...और कुछ नही |

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  5. सोच को यही उड़ान चाहिए--कुछ पाना है कुछ कर दिखाना है ....

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  6. ऐ रुख ज़रा पलट और,
    कह दे उन मुश्किल हालातों से कि
    मैंने हर हाल में जीने की कसम खाई है अब ...

    जिसने मुश्किल हालात में जीना सीख लिए ... आधी जंग फतह कर ली ...
    ये ज़ज्बा जरूरी है जीवन में ...
    अच्छा लिखा है बहुत ...

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