19 सितंबर 2012

यादें और तकिया

आज ऐसे ही कुछ ढूंढते-ढूंढते मेरे एक पुराने फाइल में कुछ मिला,जिसमें कुछ फोटो,कुछ पहले के लेटर,कुछ खट्ठी-मीठी यादें,जिन्हें रखकर शायद मैं भूल गया था या आज में कुछ ऐसा नही हुआ जिनसे कि मैं उन यादों को फिर से याद कर सकूँ,(या शायद मेरा आज उन्हें फिर से स्वीकार नही करना चाहता हों) |
उनमें से कुछ यादें मुड़ गई थी,कुछ धुंधली पड़ गई थी तो कुछ बस फाइल का वजन बढ़ा रहीं थी और कितनी तो ऐसी थी जो अपनी तरफ देखने भी नही दे रही थी |

आज उन यादों को फिर से जीने का मौका मिला,कुछ अच्छी मिलीं जिनकी वजह से मुस्कुराया तो कुछ बुरी जो फिर से एक सबक का रूप लेकर आज में खड़ी हो गई शायद मेरे कल के बचाव के लिए |(पर दोनों हीं काम की है)

बहुत दिन से पड़े-पड़े उन यादों ने अपने-आप को अकेला महसूस कर,नमी को सोख उन्हें अपना बना लिया था सो मैंने उन्हें हटाकर अपने तकिये के नीचे रख दिया |फिर वहीँ पर कुछ सोचते-सोचते खो गया |कुछ देर बाद देखता हूँ कि तकिया गीला पड़ा है |अब ये आंसू थे जिन्हें आँखों में पनाह ना मिलीं या शायद उन यादों की नमी,कुछ कह नही सकते...:(

वक्त के साथ सबको तेजी से या धीरे-धीरे एक ना एक दिन बदल ही जाना है पर कुछ चीझें हैं ऐसी जिनपर वक्त का कोई जोर नही चलता और उनमें से एक है "यादें" |

                                                                     - "मन"

9 टिप्‍पणियां:

  1. सही बात है यादों पर किसी का जोर नहीं चलता..
    वक्त - बेवक्त आती है..
    रुलाती है हँसाती है
    कुछ भुलाने को कहती है तो..
    बहुत कुछ याद दिलाती है..
    ये यादे भी ना,,
    वक्त - बेवक्त आती है..
    :-)

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    1. सही में...ये यादे भी ना,,वक्त - बेवक्त आती है..
      आभार |

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  2. Kai baar yaaden aankhon se khaare aansuon ko nikaal lati hain, aur vahan ek ummeedon ki chamak rakh aati hain!

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  3. यादों पे किसी बस नहीं होता ...
    ये आती हैं ... रुलाती हैं ... वक्त बेवक्त आती हैं ...

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  4. कल 21/09/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  5. बहुत सुन्दर.....
    यादें 'मन' का कहा भी कहाँ सुनती हैं.....

    अनु

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  6. यादें कहाँ पीछा छोडती हैं उम्र भर..

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  7. ये यादे यादे यादे यादे भी ना,,
    वक्त - बेवक्त आती है..

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