16 सितंबर 2012

बेहिसाब याद आती है,माँ..!

पता नहीं कौन सी ऊँगली थामे,
मुझे चलना सिखाया होगा,माँ..!
अब हर ऊँगली को देखता हूँ तो
बेहिसाब...
याद आती है,माँ..!
तुम्हारे मुस्कुराहट के सहारे आज
हर कोशिश है खुश रहने की
तुम्हारे गोद,तुम्हारे आँचल में आने की
पर जितना कि तुमसे दूर हूँ
उतना ही पास चला आता हूँ,माँ..!
आज हर साँस के साथ,
बेहिसाब...
याद आती है,माँ..!
तुम्हारे सपनों की फ़िकर ना होती तो
आज तुमसे यूँ दूर ना होता,
लोरी के बिना यूँ रात ना कटती,
डांट के बिना यूँ दिन ना गुजरता,
फिजाएं यूँ खामोश ना होती,
इस तरह से बेसहारा ना होता,
चेहरे पर यूँ तुम्हारा महसूस ना झलकता,
और यूँ ही तुम्हारी याद ना आती,माँ..!
आज जीने से भी ज्यादा,कई उलझनें हैं,
हर उलझन के दर पर
बेहिसाब...
याद आती है,माँ..!

वह माँ,जिसके बिना...
मेरी जिंदगी का हर एक दिन अधूरा है,
उस माँ को सलाम...!

                     - "मन"

23 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत प्यारी कविता लिखी है माँ के लिए...
    थोड़ी भावुक हो गई हूँ...बहुत सुंदर !!

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  2. सच माँ का प्यार - दुलार , डाँट - डपट की कितनी कीमती होती है इन सबका का अहसास तभी होता है जब हम माँ से दूर होते हैं हर मुसीबत वक्त में सिर्फ वो ही हमें आगे बदने की हिम्मत देती है और उस अहसास को तुमने बहुत खूबसूरती से व्यक्त किया बहुत २ बधाई |

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  3. वाह...मैंगो मैन साहब
    मान गए आपको...
    लाजवाब बढ़िया

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  4. गहरे जज्बात रख दिये हैं खोल के

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  5. बहुत सुन्दर और प्यारी ममतामयी प्रस्तुति...
    :-)

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  6. सबसे पहले तो "मन" को बधाई....ये शब्द न्याय करता है तुम्हारी रचनाओं के साथ.
    और आज तुम्हारी रचना ने पलकों के कोर गीले कर दिए....
    सुन्दर अभिव्यक्ति.
    सस्नेह
    अनु

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  7. माँएं कभी दूर कहाँ होती हैं हमसे...
    हम उनका एक हिस्सा ही तो हैं...
    हम जहाँ हैं वहाँ वो हैं...
    पर फिर भी कभी-कभी मन भावुक तो हो ही जाता है...
    घर से दूर हूँ इसलिए आपके दर्द को समझ सकता हूँ...

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    1. जी सही कहा...और जब घर से दूर हों तो इस बंधन के प्यार में और मजबूती आ जाती है |

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  8. सच में माँ तो माँ ही होती है..... अच्छी कविता

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  9. माँ पे आज तक जो कुछ भी लिखा गया है .. सब कुछ कम ही लगता है ... उसकी हस्ती इनसब से कहीं आगे है ...
    सुन्दर रचना है माँ को समर्पित ...

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  10. बेहतरीन भाव खूबसूरत, भावुक कर दिया दोस्त.
    शब्द कम पड़ जायेंगे, कलम थक जायेगी, माँ की गाथा न कोई लिख पाया है न लिख पायेगा.
    माँ तो माँ होती है,
    सब की जाँ होती है.....

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    1. आपसे पूर्ण सहमत हूँ....माँ के बारे में जितना लिखा जाए उतना कम |

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  11. माँ तो ह्रदय का स्पंदन है.. भावुक, सुन्दर कविता.

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  12. निशब्द ,
    घर से दूर हूँ ,
    इसीलिए आपकी कविता को पढ़ नहीं महसूस कर रहा था |
    बहुत खूब |

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  13. आपकी रचना ने मर्म को छु लिया ,जितना कहा जाए उतना कम लगेगा

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आपका कुछ भी लिखना,अच्छा लगता है इसीलिए...
कैसे भी लिखिए,किसी भी भाषा में लिखिए- अब पढ़ लिए हैं,लिखना तो पड़ेगा...:)